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भूमिका

मैथिलभूसुरस्य चण्डन्र्स्य छलतिः छ्यरनाकसोऽयमेतत्‌कोविद- प्रणत स्छतिनिबन्धरनाकरान्तमेतः पथमो ग्रस्थः म्रग्थास्म्भे ग्रथकार- प्रदत्तपरिचयेनेवं ज्ञायते यथाऽस्य पितामद्यो देवादित्यो मिधिलाधिपते- रिसिंहृदेवस्य सान्धिविग्रहिक असीत्‌ तदनु तत्तनयो वौरेखर्ठकतरो- ऽख भरिता तदेव पदमलङ्कतवान्‌ तदनु वौरे-खराङ्जनिरसौ चण्डेचर- ठक्लरसदेव पिटयेतामह्नं पदं खगुगेरधिरुसो सान्धिविय्द्िकच्ण्डेखरठकरो नेपालभूपतिं विजितवान्‌ भगवतः पश्ुपतिनाथस्य नेपालराजेतरछतपूजायामङ्गस्प्रशेनं तदुपज्ञमभूत्‌ यञ्छ नेपाले खोपजौव्यथूयतें रि सिं देवस्यादयं प्रचत्वं संस्थाप्य बद्॑खाग्र- हारान्‌ ब्राद्यणसार्‌ छत अभिरामएरे विश्यालं सरो निभ्भायाच्तयां कौत्तिमरच्त्‌ गोडौय घम्भव्यवस्थापक रघनन्दनभट्भाचाय्येमादेभ्योऽयं निबन्धकारः पूव्वेलनः, तच्निद नश्च यदमौ रघनन्दनभट्राचाय्थाः खी यादटारविंश्रातिततत्वेषु बङषु स्थानेषु चण्डेखरौ यरनाकर मतसुपषजयेव्यतया द्रिंतवन्तः अन्य- चासौ लच्तणसेनसभास्ताराणं हलायुधमादानां परवर्ती यस्मादनेन खग्रसे तेषां वच्वांसि प्रमागत्वेनावतारितानि दृश्यन्ते चण्डेरः कदा मिथिलामलङ्कतवान्‌ तच्च सम्यक्‌ तत्िपित रुवावगम्यते खसियाटीक सभालुमतविज्ञोधिकायामेतद्ुन्थकततैविं वादरलाकरास्य मन्यत्‌ एकं मुडित- माक्ते तदुम्योपसं हरे ग्रभ्कर्तैरेवं परिचयो लभ्यते यथा रसगुणसुज चन स्मिते शाकव्षे, सहसि धवलपच्े वाम्मतौसिन्धृतौरे अदित तुलितसुचेरात्मना खर्शराशिं निधिरखिलगुणानासुत्तरः सोमनाथः

311 81225 ©.

खतेनेतल्ममाणितं यथाऽयं वट्शतवर्ष॑ूर््व वत्तौ खदटौय चतुद ण- शतानब्दौयः। विवादर्न्लाकरसम्पादकोऽप्येतत्रमाणसुपजौव्य वट्धिंश्‌- दधिकदाद शश्रतश्राके ग्रन्यकन्तैस्त॒लाघएरषदानमङ्गैकत्य णवमेवास्य समय- मवधारितिवान्‌। परन्तु मदौयबास्यबन्धुविनोदषिद्धाटिषिद्याविनोद- खग्डेनर कालपरिचायकं निभ्नोक्तं महाजनवचच् प्रदाय उपल्लतवान्‌ तेन चापि वचसा तदेव समर्थितम्‌ यथा--

ष्षटौय चतुविगत्यधिकचयोदशशततमे संवत्सरे दौल्लौश्वरस्य गौयासद्िन्‌तोगलगव्राह्ादूरस्य सैन्यैः संघे प्राप्य पराजितो मिधिला- धिषतिद्रिसिंहदेवो नेपालमाशितवान्‌ अस्यैव मन्त्रौ रनाकर छचरडेन्र- दक्र आसौत्‌ | (7706880 @€्५। 3642115 ` प्र5ऽप्०एङ 0 प्िलष् 2१ ॐप्र"ठपा२१४६ 419००११8.) इति

सतरामसौ चरडे्रठक्ुरो रघनन्दनभटाच्ेभ्यः साङदिशत धर्षतोऽग्रवत्तौ द्दौय चतुद श्रतान्दीयो मैधिलो शधम्भव्यवस्थापकः। हरिसिंहदेवस्य मे थिलभूपतेः सान्धिविय्रहिकश् ¦ यस्थारम्मे ग्रन्यकर्ना यत्‌ प्रलोकदयं धिरचवितं तेनेवास्य कवित्वं ग्ग्यस्य कामधेनुकाल्यतस- पारिजातानां निबन्धानामनुवत्तित्वं कचित्तभ्यो वैश च्छञ्चावघाय्येते

विश्नाणः कल्यदृच्तं क्वचन परिसरे कामधेनुं दधानः क्राप्यन्तः पारिजातं क्रचिदपि दघद्योषयादोषिसुक्तः। खौमचण्डेनघरेण स्प्रतिनिगमविदा तन्धते तेन तद्द्‌ विष्णुव्यासादि वाक्चस्छरदम्टतमयः छत्यरनाकरोऽयम्‌ यस्मिन्न किञ्चिदपि एणंसति कामधघनु- येचेषटमल्पमपि कल्पतर्न दन्ते | चत्ते गन्धमपि कच्चन पारिजात- तत्‌ सव्वेमेव विविनक्ति नयप्वौखः प्लोकदयेनास्य कवित्वं ग्रन्यस्यापि कस्यतर्प्रभ्टतिनिबन्धालुसारितवं तेभ्यः बवे शिच्छच्च सम्यक्‌ व्यज्यते

९8174 0. 3111

ग्रेऽस्मिन्‌ दाविंशतितरङ्गा विनिर्दिदाः ते कारडचंभमभिव्यज्यते तच पथम घम्भनिरूपगतरङ्ो दितौयखख परिभाषातरङ्गेऽप्लीतिपवैः परिसमाप्तः ददन्तु प्रथमं काण्डं। ततः सामान्यमासतरङ्सद्हित दादग्रमासौय द्रादश्रतरङ्गात्मकं हितौैयं काण्डं सश्यधिकयच्चग्रतपतैः समपितं हतौयच्च काण्डं मलमास संकान्ति ग्रहय प्रव्धेकवारविध्य- मावस्यात्रततिधिवेधात्मकं चत्वारिं श्रदधिकषट्णतपतैः सप्ततरङ्घैः परि- समापितम्‌

ग्रन्थस्यास्य सम्पादने यानि चत्वार््याद शं एस्तकान्य॒पलब्धानि तेषु क-चिद्ितं णुसियाटौकसोसाद्रटौतः, दितौयं ख-विदह्ितं बारवङ्- राजकोचपुखकागासात्‌, टतरौयं ग-चिद्धितच्च गव्॑मेन्टषुस्तकालयात्‌, चतुरश्च घ-चिदधितं लण्डनस्थेणडिया अपिषनामकपुस्तकालयात्‌ संग ्यैत- मासौत्‌ पएसकचतुटचेषु ग-चिदितमनेकचर खण्डितिमपि सुषिशुद्धम्‌ तच्च द्ानवव्यधिकदिश्तस्रम्मितलच्तणसंवत्छरे लिखितमिति यपरातन-+ माद शेएस्तकम्‌ कचित्‌ क्षचित्‌ मूलएस्तकपाठोऽपि निन्ने पदत्तः

अन्यानि यानि एराणसंहितादौनि मूलघुस्तकानि रख्तत्‌- सम्पादने परयोजनौयतया उपलब्धानि तानि सर्व्वाख्येव रसियाटीक- सोसादृटो एस्तकागारात्‌ मिलितानि

स्याञ्च अदेश्रेन ममेतत्‌ प्राचौनपुस्तकसम्धादनकन्तत्वं सञ्जातं परिशेषे तामेसियाटौकसोसाद्टौसभां प्रति सबङ्छमानं क्तक्ततां प्रदण्रेयामि।

ओ्रौकमलछष्णस्मतितौधैः

भाटपाड़ा, नट्चत्वारिणदधिकादादशश्रतशकभैय १० कात्तिक ,. चान्नकात्तिकस्य दशमदिवसे १८४६ पराके |

छत्यरन्ाकर-विषयद्ष्चौ

अगस्त्या घेदानम्‌ ... अभिपरोत्ता अनन्तत्रतम्‌ अनन्तटतो यात्रतम्‌ अनन्तपफलसप्तमौ ... अनोदनासप्तमौ ... अपराजिताविधिः अभिषेकः

अवियोगत्रतम्‌ अमावस्यातरङ्कः ... गर्तकार्तघम्भः ... अशून्य ग्र यनत्रतम्‌ ... अरटकाश्नाद्धम्‌ अर्द घान्यानि आदित्याभिसुखविधिः अलेख्यनागपञ्चमो आश्िनक्षवयम्‌ अषाठ्क्रत्यम्‌ इन्द्रपूजामन्लः उत्थानदादण्यी उपवासादिपर्भाषा उभयनवमो रतम्‌ ..

उभयसप्तमौत्रतम्‌

41 २९8 २३८ ८६४९ र्‌ २७९६ ९२९ २९५ २8१ २७४ 8५२ ६२ ५२ २२२ ४8७& ६& 8९8 २७२ ष्ठ ९९६ २७९ २<र ५२

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५९७ २०द्‌ ४४५

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१९ उमामाहेश्चरत्रतम्‌

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रकानङ्कपूजा चअषधिगणः कटुारकपूजा कनकपरिभाषा ... कमलसप्तमी

करं जापमन्तः

कान्तारदौपदानविधिः कामव्रतम्‌

काम्यानि कात्तिकलछत्यम्‌ कुन्तयुजा कूम्मदादगौ ... छष्णद्ाद शोत्रतम्‌ ... छष्णादधमोत्रतम्‌ .. कमपूजा

खञ्जनद शनम्‌ खङ्गपूना गजारकपूजा गौड़वाक्यम्‌ गौरौपूज्ा यहगनिणेयः ग्रडगल्ानम्‌

| चनत्राकादिपूजा

चेचमासङ्लत्यम्‌

धुः पं ^ ४९१३ १६ ६९ २५४ ९९१.९ ९.७ २४९६ १.२ ३४६९ १२ 3 - ९२२}. ५. २५४ २०० २९२ 8 २८७ १२ ३५५ ४८२ १९ २०८ द्‌ ४8८ १९ १४२ दद 8 २५२ २९७ २९४ २२९ ४०२ ६२४५ ६२९ ५२० ~)

्चयुजा कुरिकापूजा

जन्मतिधिक्लत्यम्‌ ...

जघपपरिभाषा जयन्तौसप्तमौ जलधेनुदानम्‌

(~ ज्येषलत्यम्‌

ताराराचितव्रतम्‌ ... तिथिनच्तचदेवतापुजा

चिगतिसप्तमौ

चितयप्रदासप्तमो ... दद्टोड्धरणपच्चम्म ..

. दौपपरिमाषा दुन्द्भिपूना दुर्गात्रतम्‌ दुर्गारययाचा टर्व्वामौत्रतम्‌ देवग्रदहभ्रूमाविधिः

व्रव्यगणपरिभाषा ...

घनुः्घूजा घम्भविषेषः दचपपरिभाषा नक्कयरिभाषा नच्तचद्‌ानम्‌

नच्तचपरुषत्रतम्‌ ....

नवान्नन्राच्ताभच्तय- विधिः नन्द्‌ात्रतम्‌

नरसिंददादण्ौ ...

२५५ २५२ ५8० ६र्‌ ५०५ २९९ २४८ ९७९ ४९ ५५५ ५२४ 8५८ २७द्‌ ७८ २५४ २२९ २५९ रप्र ५२६ ६५ २४५8

७७ ५७ ५९९ प्य

२० ५२८

( उष} )

षं ९२ | नागपञ्चमौ ९६ नानाद्‌ानं

| नामसप्तमोत्रतम्‌ ... ९५ | निमित्ततोघम्भः

२० ¦ नौराजनविधिः

| पञ्चरतानि

पताकायूजा

| पद्मकयोगः

२४ | पद्मनाभदादश्रौत्रतम्‌ | पविचारोदणम्‌ ... ९० | परिभाषा २० पव्वज्लव्यम्‌

| एचकामत्रतम्‌

| पौषमासल्लद्म्‌ ... ९२ | प्रकौगेल्लत्यम्‌ १८ | प्रतिनिधिपरिभाषा | प्रतिमासपूजा

१२ | प्रमाणतो घम्भः

९९ | परलतोघभ्भः

१९० | फाल्युनमासक्लव्यम्‌ | वराददादणशौ

| वरूगूना ९५ | वम्भपूना ९० | वासुदेवद्‌ानानि “." १६ | विजयदादण्यौ

| बुडधदादशोत्रतम्‌ ...

ब्रतचिन्ता .

९५. | त्रतचघम्भः ००. | तव्रतादितिधिवेधव्यवस्धा ईद ९८ | भत्तदादृशौत्रतम्‌ ."

२७द्‌ ५६० ९२४ ४१ २२२ ७१. २५8 8 4 © २७द्‌ ९९९ ६१५ ५88 ९९ द्‌ 8498 ५६० ७द्‌ ९४६ २६ ५९१५ ५९१० ३४६ २५५ ५७द्‌ २८७ २४७ €इ३२ ५४

श्रद्‌

भल्लत्यम्‌ मौद्मतपेशम्‌ भेरवोत्यत्तिः मघाचयोदणष्र मतव्छखद्ाद शोव्रतम्‌ ... मदनद्वादश्नौत्रतम्‌ ... मलिक््ञचनियंयः ... मदहाकौश्िकमन्लः महाजनपरिगश्दौत- वाक्यानि

महहिषौदनविधिः मडेशरदानानि माघल्लत्यम्‌ माघौसप्तमी मानपरिभाषा मागेमासज्ल्म्‌ .... मासपरिस्ितिः ... सू त्तिषूजाव्रतम्‌ योगौखरधरणौ- दाद्‌श्ोत्रतम्‌ रसकल्याणिनौत्रतम्‌ राघवदाद शोत्रतम्‌ . रेवन्तपुजामन्लः लच्छौपूजामन्ः

वारदानम्‌

ˆ २५४

५०९६ २८८६ २९५ ४६२ "१.२५ ५३६ २५२

९२६ ९२७ ९९४५ ९६६ ९८७ ९९७ 889 ५७१ 8 ८७ ५०९६

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विष्णश्ाङ्गरत्रतम्‌ ...

वैश्ाखतरङ्कः पाङ्धुषूजा श्कारासप्तमौ व्रतम्‌ शाकसप्तमौनतम्‌ ... णान्तिपञ्चमौत्रतम्‌ शिवचतुदेशौत्रतम्‌

शिष्परिग्दयीत- वाक्यानि

शिवर्थयाचा शौय्धेत्रतम्‌ शआवणक्त्यम्‌ वट्तिलौषिधिः षष्टो कल्यः संकान्तिनिणेयः सप्तघान्यानि

सप्तोषधिगणः ...

सर्पाभयपञ्चमौत्रतम्‌ स्वगन्ध सव्वंघातुगणः सव्वरलगणः सव्वैरसः

सान्व॑भौमदाद श्रौत्रम्‌

सौतापूजा

सिंहासनयूजा टै

खय्थदानानि

९४ २९० २९ ४८२ २६४ 4 ५९१९ २७५ ६९ ©

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स्य्येत्रतम्‌ खग्धधूजा सोमत्रतम्‌ सौभाग्यश्चयनव्रतम्‌ सोभाग्त्रतम्‌

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४१५ 88७ ४७९

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कुत्यरत्नाकरः। न्य मं गणपतये नमः

हपेव्यालोलमूकद्रवदमरघुनो वारिधाराभिषेका-

दिख्रान्ते लोचनाग्नौ विगलितभिरिजासम्भमादस्तवित्ना।

देयादनदुरो चिर्विरचितकवरोकुन्दमालानुकारा

सावः ज्रेधांसि गौरोवदनसरसिजे शाङ्रो ङ्गलोला १। वेददुमं सुक्लतसत्‌फलसुचशाख- सुक्ञासयन्रधिपयो निधिमौनमूत्तिः मूमण्डलोद्रणकश्मटकूश्मरूपो देवः शिवं दिशतु विश्ठजनोनवत्तिःः २।

यस्प्ाददहिकसुज्चलं प्रभवति रेयस्तथासुशिकं

विश्वं छतस्नसुदित्वरं समभवद्यस्य प्रभावादिदम्‌।

यस्मित्राचरिते सुवन्तिः क्तिनः कोषः अुतेर्यौ महान्‌

यः सन्धारयति त्िलोकमखिलं धश्माय तस्मे नमः.॥ २॥

(१) ठ-मौलि। (२) ५--सून्तिः | (३ स्फरन्ति

सत्यस्लाकरः |

रस्ति ओीदरसिंहदेव पतिनिःगेषविद्धेषिणां निर्माधो निधिलां प्रणासदखिलां काणांटवंशोद्धवः आशा; सिच्चति यो यशोभिरमलेः पौयूषधारोडवे"- देवः शारद शब्वरोपतिरिवाशेषश्रिय्भावुकः अस्मिन्‌ दिश्विजयोद्यते बलभरात्‌ कुनौभवद्धिः फण रन्योन्यं निविडं मिलद्भिरभितः शेषः सहखरेणए सः गच्छत्यम्बुजवान्धवे दिनपतौ प्रल्यक्पयोधैरधः सद्यः-सङ्चदनकरक वपुःसाटश्यमालम्बतः ष्मा माः खेदं भजष्वं जलधिसुपगते बान्धवे पड्जाना- मन्तः पञ्चेषुरोषव्यसनभयशचश्चक्रवाका वराकाः | खोमत्‌-कार्णटभूमौपति-सुक्वयमरेः प्रीणयनत्रय लोका- नेष प्रौदृप्रतापद्युमणिरुदयिनौं सम्पदं सन्तनोति ॥.. | एतस्याङ्तसनिविग्रहष्राात्रं पवित्रोक्लत९ चऋलोकः शरदिन्दुसुन्दर्यश्ः-सन्दोहगङ्गास्बभिः | आसोन्म चमयद्युतिप्रतिदहतामितरान्धकारोदयो देवादित्य्‌ इतिः प्रसत्रहृदयो देवहुमौ जङ्गमः

(१) ए--घारद्रवेः।

(९) ए-धराशेष- |

(३) +--अातन्वते |

(४) ^-माऽन्तः।

५) ए--एसतके षस्लोको नास्ति (६) ठए-परिजोड्त-।

(७) ^+-देवादहति सः।

छत्यरलाकरः।

महादानैसतस्तेविंभवमहितेनेन्दितिमभत्‌

कलं भृदेवानां बहविधम खस्तेम खभजाम्‌ तड़ागैरारामैः कमलमधघुपानोन्मदनद- दहिरेफखेणौनामुपक्षतमनेन कितितलम्‌ गुणाम्भोेरस्मादजनि रजनोजानिसद्धे- रिवास्भोजादहेवो द्रविण इव मन्तौशतिलकः

नवं पौयुषांशोर तमिव शततिप्रणयिनो

नयादथेः श्चाष्यादिव जगति वौरेश्ठर इति लच्छीभाजो दिजन्द्रानक्त क्तमतिर्यी महादानदानेः परादत्तोचैखु रामप्रश्तियुरवरं शासनं अ्रोतरियेभ्यः वापीं चक्रोऽखिबन्धु दहिभतनगरे निज्नितारातिदुगेः | प्रास्ादस्तेन तुङ्गो व्यरचि सुक्ततिना शदसोपानमागेः' १०॥ ष्यः सन्धि-विग्रहविधौ विविधानुभावः

, शर्ययोदयेन भिथिलाधिपराज्यभारम्‌

निमेत्सरं सुनयसञ्ितकोषजातं सप्ताङ्गसङ्कट नसन्भु तमेव चक्रो ११

प्रज्ञावतां सदसि संसदि वाकपटुनां

राज्ञां सभासु पररिषत्‌खपि.मन्तभाजाम्‌ | चित्तेऽधथिनाच्च कविताखपि सत्‌कवीनां वौरेष्ठरः स्फुरति विश्वविलासः कौत्तिः १२॥

(१) -सोपानवङ्ः | (२) परद्यभिरटं 5 एके नासि | (2) विलासिं।

1 कत्यरलाकरः।

सौ मानसुख तनयो नयचक्रचार्- चारालवालनवकल्यतरप्ररोहः | सत्सन्धि-विग्रहधुरो णष्पदावलम्ब- अण्डेश्वरो विजयते सचिवावतंसः १२॥ यद्याताचतुरङ्गिणौ भरनमहुगोलघातस्पुट- दो गीन्द्रागरशिरः-फणा-मणिपतत्‌खण्डप्रदोपांशभिः | पाताले निविडान्धकारपटल निर्मोपदृष्टप्रिया- सलौ चणलब्चलोचनफला्गायन्ति भोगिस्ियः १४ "नेपालं गरि दुगेमं भुजवलादुन्ुख्य तद्धपतोन्‌ सत्वान्‌ राघववंशजान्‌ विरिपोसुल्यःप्रतापानलै; टेवं विष्ववरप्रदं पश्पतिं संशश्य योऽप्रूजयत्‌ केषां नैष धरातसे सुतिपदं मन्तोन्द्रचण्डेष्वरः १५॥ आसीनं गिरिकन्दरास्वपि बनेव्वन्तहितं निरे गम्भौरे चिरमम्नमद्विशिखरप्राग्मारमप्याखितम्‌ | नेपाले विजितेरनेन सुतरा भोताकभिभूमिपैः विस्ब्रुल द्युमणेः कुजे भगवतः सरं जन्म तत्तत्‌ क्तम्‌ १६ ।॥ उत्‌खाते रथचक्रनेभिनिवह्दंन्तावबलानां मदा- सारः सिक्लतल्ते महायतरणकचेजे हयन्नो दिते

7 भभ 1

(१) ~+-वरोष्। (२) ^+-यालाद्चवुरङ्किणो। ` (र)^+-कलाः (४) ¢ एस्तके-उन्यलयाद्विनितम्बमम्बरमण्णि लत्वा पताकां श्वेनोतरजोभरोरनिभ्टतं भिता महाकन्दरं इगे सत्पथ ? टडमथो निर्माय दुग एुनः नेपालच्ितिपालवगेमनयङ्गङ्ग्मन्तादयम्‌

ऊसत्यरन्नाकरः

नाराचाहतदाडिमोपमपतत्‌ कुम्भी न्रङुभ्भापतत्‌ः मुक्ताजालकसुप्तमस्य नु यशोबोजं विरेजे चिरम्‌ १७॥ एतेनातिवदान्यमोलिम णिना सम्मानितेरथिभि- दंत्तामेकमनोरथाधिकमदहादानोच्छितेरुन्छरितः स्गखेखणिमसीमलोमसतनुच्छायः कल्यटुमः \प्रश्चमोतन्मकरन्दबिन्दुनिवहव्याजेन रोरुद्यते १८ "एष मेथिलमहोभुजा भुजदन्दवारितसमस्तवैरिणा | खो विधाथिनि कुलक्रमागते सभ्धिविग्रहपदटे पुरस्तः ॥१९। उन््रोलत्‌सहकारसीौरभमिलद्‌श्डोघभङ्गरिणो विप्रेभ्यः सुरपत्तनप्रणयिनो रम्भावनश्यामलाः | ग्रामाः सच्चरदापगाजलभरेरुतनिद्रनालिथिय- स्तं दत्ताः कति प्रसन्रमनसा मन्तीश्वरेणासुना २० १अरयमुदचोखनत्तरलमारुतलङ्नया घनरवावत्तमभिरामपुरेऽथ सरः दिवि शरदश्रविश्रमपटलोदरगस्फर- दरविन्दवेश्म विलसत्‌ निरुन्मसितम्‌ ९१। २१॥

(१) ए-प्रच्योतत्‌ | (२) ^+ पुस्तके अधिकमिदेप्य'। (३) 8 (--पुस्तके ठकविं ति-दाविंशतिश्लोकौ नस्तः | 0--कुसटषनेन शंखसकला भद्रलमतिना सनतरतारकाङरसमं सिमरामपुरे। . पवनजवोडताम्बुजरजःपटवासुचयं ` किरद्् दिष्यखे नवमचौ सनेव सरः ^+ एस्तके अभिकर्चिंद्‌ं पदयमश्एद्धम्‌

सस्डरल!(कर्‌, |

आपीत जलधिसत्रया चुलुकितः ्ारोदकीोऽभ्यहि मा- मापात्‌ मधुरं घटोद्वभरुने यद्यस्ति शक्तिस्तव इत्येवेद तीव वोवितुलितग्धोधिस्फुटःम्भोभरा- रावेरुद्यतहस्तिरासमहिताहङ्ारमेतत्‌ सरः २२॥ एतव्वौतिजिमौषुरोशएमभजदेवः सुधादौधितिः प्रायः शेखरतामवाप युनस्तस्मादसौ तत्‌फलम्‌ इत्येवं गलिते मनोरथभरे पङ्क "च्छटासोद्रं धत्ते निज्नितकान्तिरन्तरधिक्रं णद्ध कलङ्कः शभ २२ विश्वाणः कल्प्हत्तं कचन परिसरे कामधेनुं दधानः काप्यन्तः पारिजातं कचिदपि दधदोषयादोविभुक्तः। खौ मच्चर्डेश्वरेण स्मृतिनिगमविदा तन्यते तेन तदत्‌ विष्णुव्यासादिवाक्वस्मुरद खतमयः लल्यर लाक रोऽयम्‌ २४ यस्मिन्न किचिदपि शंसति कामधेनु- | यंते्टमल्यमपि कल्यतरने दत्ते, धत्ते गन्धमपि कञ्चन पारिजात- स्तत्सवेमेष विविनक्ति नयप्रवीणः २५ नानाशुतिस्मृतिकदम्बयुराणराशि- गौड़तिहासनिङ्करुम्बमहागमानाम्‌ तं तं विरोधमवधुय बुधेन छत्य- रल्ञाकरोऽयससमुना विहितो हिताय ॥-२६॥

(१> ^+--भरे$ग्यङ्

कत्यरलाकरः)।

खरूपफलमानेभ्यो निमित्ताच्च विधोयते अभोषटफलरद स्यात धम्यस्यादौ निरूपणम्‌ परिभाषा ततः प्रोक्ता ततो मासपरिखितिः। भरधाऽच चैतर-वेशाखौ ज्येष्ठाषाढौ ततः परम्‌ ततश्च खावणो भाद्र आश्विन; कात्तिकस्तथा। मागे; पौषश्च! माघश्च फादगुनः परिकौत्तिंतः मलमासव्यवसखापि-तरङ्गेऽस् ततः क्षतः प्रकोणेकाञ्च वाराणां ब्रतादिविधिविस्तरः॥ रविसंक्रान्यमावस्या-ग्रहणस्यितथस्तथा व्रतादितिथिवैधादिव्यवस्ितिरनन्तरम्‌ एवमागमविन्ञन खौचर्डेश्रमन्तिणा इाविंश्तिस्तरङ्ाणां छत्यरलाकरे कता लच् प्रहत्यौपयिकं धमेनिरूपणं खरूपतः। तत्र मनुः- | विद्धिः सेवितः सह्धिनित्यमद्ेषरागिभिः दथेनाम्बनुक्ञातो यो धर्मस्तं निबोधत सदविर्मंहाजनेः अदेषरागिभिनिंषिदरागदेषशृन्ये हं दयेनाभ्य- नुज्ञातोऽतिखद्वाविषयोक्घतः विश्वामितः- यमाग्य; क्रियमाणं हि शंसन्द्यागमवेदिनः। धर्मो य॑ विगदन्ति तमधस प्रचन्तते॥

(१) ९-मौषोऽय।

क्लत्यरनाकरः |

तस्मात्तां प्रूजयेत्तचन ोपवामो जितेद्धियः। विचिचेबलिभिर्भत्तया सर्व्वासु नवमोघु च॥ ब्रह्मपुराणे- एकादश्यां ततः स्त्रोभिर्दैवौ पज्या रुक्तिणो पौराणे योगिनौ काचिच्छक्तिर्नाराचण्णङ्गजा युष्पालद्कारधपान्नशराकैश्च विविधैरपि चरपूयेविविधाकारैवङ्कि-नाद्मए-तपेणेः तचापराहे वासवश्च वेश्मनो वश्रधार कः च्र्यै्मा्येश्च वस्वेश्च पूज्यो रङ्खः सुगन्धिभिः प्रदोषसमये तन पञ्चगव्य विधानवत्‌ तिलशिद्धायेकेयुक्ं ग्यद्ोला वेश्मनो वहिः देयं दिचु पय्धुचेडुष्टप्राणिनिवारणम्‌ पथ्येत्‌ तदेव पञ्चगव्यं प्रतिदिशं चिपेत्‌ ङतोपवाो दाद्‌ण्यां ततो विष्णुश्च प्रजयेत्‌ अपराहे तत्रैव कामदेवश्च पूजयेत्‌ घरस्थं विविधे्माखछि्गन्धेरुचावचेर पि ततस्तु श्नौतलं तोयं पुण्यमादाय वाग्यतेः कामदेवाय्रतः साप्यं पुष्यच्छन्ने महाघटे | अर््यादि पूजितं सम्यक्‌ प्रशरसतेटलप लवैः तस्यां राव्यं यतौतावां ततो शुप्रतरे गडे। श्रनक्काभ्यिदिते काले खाघाःः खस्तेन वारिणा

1) खाप्याः।

कछव्यर्लाकर+

सथाणाः मूले वच्छमाणएण देवता एव विन्णधन्नत्तरे

दादण्यां चेचश्क्ञास्य चेचवस्तप्रदो नरः

श्रचयं फलमाप्नोति नागलोकञ्च गच्छति.

वै्ाखमासदादण्यां रक्मदानं तथेव च।

कचोपानदयोदानात्‌ च्येष्ठे मासि दिजोन्तमाः तयेव चेति प्रयममासोक्तफलानुषङ्गः

श्ास्तौणं शयनं दला मरौणएचेद्धोगशायिनम्‌ ¦

आषादशक्रदादश्या श्वेतदरौपे मरोयते भोगग्रायिनं विष्णं ्रास्तौणै श्यनं दत्वा महौयते दति

सम्बन्धः

श्रावणे वस्तरद्‌ानेन विष्णुलोके महौयते

गोदः प्रयाति गोलोक मासि भाद्रपदे तया

ग्रोण्येदश्वशिरसमश्चं दत्वा तथाश्िने श्रश्वशिरसं दयगोवं देवम्‌

विष्एलोकमवाप्रौति कुलसुद्धरति खकम्‌

सरोमवस््दानेन काके वस्तरमाभ्रुयात्‌ !

` प्रदानं लवणणनान्तु मागं शं महाफलम्‌

रोमवस्त द्लपरो

धान्यानाञ्च तथा पौषे दारूणाञ्चाणनन्तरे

फाद्याने सव्वेगन्धानां नाच कार्यां विचारणा

१५७

१३० छव्यरनाकरः

अनन्तरे माचे दानं महाफलमित्यलुषज्यते अच यद्यपि दादश्यक्ग्वो नाति तथापि समभिव्यादाराद्रा दश्येव विव्चिता भाग्यकचरसंयुता चेचे दादौ स्यान्महा फला भाग्यक् पूव्वैफल्णुनौो उत्तर फद्णुनो वा पूर्वायां विजयं विद्यादुत्तरायां भगन्तया दति भविव्यपुराणे नच्चदेवता कथनात्‌ दस्तयुक्ता तु वेश्राखे चेष्टे खातिना तथा ! व्येष्ठया तथाषाद़ं मूलोपेता वेष्णवे वेष्णवे श्रावणे तथा भाद्रपदे मासि श्रवणेन तु संयुता आश्िने दादौ पुण्या भवत्याजकचंसंयुता आजग्टकं पूव्वेभाद्रपदा कार्तिके रेवतौयुक्ता सौम्ये छत्तिकथा तथा सौम्ये मागं पौषे स्गशिरोपेता माघे चादित्यसंयुता आदित्यं पुनवेसु फाख्युने पुव्यसदहिता दादश पावन परा। नचचयुक्ताखेतासु तया द्‌ानमुपोषितम्‌ सव्वे महाफलं ज्ञेयमनन्तं दिजसन्तमाः तया दानसुपोषितमिति- च्रच पूवव चेषर्क्तदादश्वादि दाद- शद्धा शो विहितदानफलाधिकफलत्वं मदहाफललं दाने उपोषिते अनन्तफलमिति वचनादत्यत्कषेः फले एतानि दाद ्मासशक्ञ-

कछत्यर्नाकरः |

दाद्‌ णषु प्रत्येकं दादश्दानानि तच क्च लिखितान्यपि माश न्तरद्ाद शो फलानुषङ्ायमेकचापि सङ्लयय लिखितानि एवश्च दाद एनचचयोगेनापि दाद्‌श्ादश्रौषु दादश्रदानान्यु- पोषितानि प्रत्येकं केवलतत्तदाद्रोद्‌ानफलापेच्चया अति- भ्रयितफलसाघचनानोति मन्तव्यम्‌ वराहयुराणे सत्यतपा उवाच- कोऽसौ धरण्ां सद्धं उपवासो महामुने ! कानि व्रतानि तथा एते वक्रमदंसि दुर्वासा उवाच- एवमेव सुने मासि चेच सङ्ल्य इादभौम्‌ उपोव्या रा घधेद्क्या देवदेवं जनादेनम्‌ वामनायेति वे पादौ विष्णवे कटिमच्च॑येत्‌ वासुदेवेति जटठरमुरः सम्णेकाच कण्ठं विश्वश्छते पृच्छं शिरो दै योमरूपिरे। बाह्न विश्वजिते पूृन्छौ खनाश्ना शङ्खनचक्रके श्रनेन विधिनाऽग्यच्यै देवदेवं सनातनम्‌ मराग्बद्रनोदरं कम्भ सयुग्पं पुरतो न्यसेत्‌ मागुक्तपाज सखाप्य वामनं काञ्चनं बुधः यथाश्ह्वा कतं खं सितयन्ञोपवौतिनम्‌ : कुण्डिकां खापयेत्‌ पाच कचिकां - पादुके तथा + "`" श्रच्मालाञ्च सस्थाण टषिकाञ्च विशेषतः

९२२

चछत्यर्नाकर्‌ः

एतेरपस्करे्क्तं प्रभाते ब्राह्मणच तम्‌ दापयेत्‌ ओौचतां विष्णुद्खरपोत्युटौ रयेत्‌ मासनान्ना तु संयुक्तं प्रादुर्भांवाभिधानकम्‌ः मरौयतामिति स्वे विधिरेष प्रकौत्तिंतः॥ श्रयते पुरा राजा य्यः एथिवोपतिः श्रपुचः स॒ तपस्तेपे युच मिच्छस्तपो धनः तस्येव कुर्व्व॑तस्िष्टिं पुत्रार्थ मुनिसत्तम , ्राजगाम हरिर्देवो दिजरूपसमन्वितः

उवाच नृपं राजन्‌ किन्ते चवसितं विति पुचाथेमिति चोवाच तं विप्रः प्रव्यवाच इ॥ दूद्मेव्र विधानन्तु कुर्‌ राजन्‌ प्रयनतः

विप्र एवसुक्का चणादन्तददिंतस्ततः॥ राजापि तच्चकाराय मन््वित्तं दिजातये | दरिद्राय खयं प्रादात्‌ ज्योतिगेर्वाय धौमते। यथाऽदितेरपुचायाः खयं पुचलमागतः भगवांस्तेन सत्येन ममा्यस्तु सुतो वरः, अनेन विधिनोक्तन तस्य युचौऽभवन्मने उग्ास्य दति ख्यातश्च चक्रवर्तौ महावलः अपुत्रो लभते पुच्ानधनो धनवान्‌ भवेत्‌ भ्रष्टराज्यो लभेद्राज्ये खतो विष्णपुर ब्रजेत्‌. ।'

एवमेबेति वच्छमाएमागे शोषेमासद्ादशोशत्ये ग्म्यां निय-

3 विधानकं)

छत्यरनाकरः। ' शर्र्‌

तात्मवान्‌, सातो देवाच्चैनं कला, श्रश्रिकाय्ये यथाविधि इत्यादि " तत्राराध्य महायोगदेवं नारायणं मरसुम्‌ इत्यन्तेन चदुक्त तच्छनेत्ययेः उपोग्येकादण्वां वामनाधेत्यच॑नोयम्‌ अन्कारादि नमोऽन्तेन चतुर्येन्तेन चाच्चैयेत्‌ प्राग्वदिति जलप्रणत्-षमाच्ल-सितचन्दनलेपितल्र तिलपाच- खगितल पञ्चरननगकिंतलानां यदहणं सयुन्प्ं धितवस्तयुग्म खदित प्रागुक्तपाचे यथाग्र्वा सौवणं सौष्य-ताचाघाराणामन्यतनने वारिप्ूणं, काञ्चनं सौव कुण्डिका कमण्डलः षिका यत्या- सन, माखनाननेत्यादि प्रादुभावाभिधानकं प्रीयतामित्यन्तख मागं गोष, दादश्रमासेषु केशव नारायण माधव गोविन्द विष्णु मधु- सदन चिविक्रम वामन ओ्रोधर इषौकेश पद्मनाभ दामोदरेति यचाक्रमं प्रत्येक नामोच्चाय्यै केशवो मद्छूपौ प्रीयतां, नारायणः कूभ्मेरूपो प्रोयतामिति क्रमेण तन्तन्मासि उदौरधेदित्य्यः ज्योतिं्माय ब्रह्मविदे वराहपुराणए एव श्र्यरसः प्रति नारद उवाच- ददानो कथययाभ्याग्ु त्रतं येन हरिः खयम्‌ वरं दच्याद्धत्तभावं चवे याति शोभनाः!) शोभना दति सम्बोधनं चकारखरसात्‌ वरदान- हरिभत्त भावौ इावपि फले वसन्ते श्क्तपचस्य दादौ या भषेत्‌ इभा तस्यामुपोग्य विधिवत्‌ स्रौकं दरिमरयेत्‌ पथ्यङ्कास्तरणं कृवा नानास्तर एसंयुतम्‌

१२९ छत्यरल्ाकरः |

तच लच्छौपति देवं रूप्यं कला निवेशयेत्‌

तस्योपरि ततः पुव्येमण्डलं कारयेदुधः।

नृत्य-वादि घोषश्च जागरन्तच कारयेत्‌

मनोभवाधेति गिरखट्यम्बकायेति वे कटिम्‌ )

कामाय बाङ्कमूलन्त्‌ क्ुखुमास्तराय चोदरम्‌

मन्मथाथेति परै पादौ हरये इति सव्वेतः।

ुष्येः सम्यूज्य देनेग्रं मलिकाजातिभिस्तया

पञ्चाच्तुर श्रादाय ईचुदण्डान्‌ सुशोभनान्‌

चतुरि न्यसेन्तस्य देवस्य प्रणतो नुप

एवं छृलला प्रभातेषु प्रदद्याद्भाद्यणय

वेद वेदाङ्ग युक्ताय सन्ूणङ्गाय धमति

राह्मण श्च ततो भोज्य व्रतमेतत्‌ समापयेत्‌

ब्रतस्वान्ते ततो विष्एभेत्ता वे भविता भ्रुवम्‌

छलायतप्प्रणामन्तु ष्टं गव्वेंण प्रुवम्‌ |

व्रतेन देवदेवेशं पति लयाऽभिमानतः।

श्रवसानेऽपहरणं गोपालेर्वो भविष्यति

परा इतानां कन्यानां देवो भत्ता भविश्यति

श्रच मल्लिकाजातोरूपकसुमयोयंद्यपि योभ्रे पयोद्ागमे

निनफर स्तथापि यथाकथच्चिदनयोरन्वयो बोद्धव्यः

दति भन्तं राद भोनतम्‌

ना 9

1) खला मत्‌

छत्यरन्नाकरः १.२४.

मद्छपुराणे- सेचने मासि सिते पक्त इादश्यां नियतव्रतः स्थापयेदत्रणं कुशं सिततण्डलपूरितम्‌ नानाफलयुत तद्दि च्‌दण्डखमन्वितम्‌ सितवस्तयुगढन्नं सितचन्दनचञ्धिंतम्‌ नानाभच्छयसमाकणं मद्दिरण्छञ्च श्रक्रितः ताश्चपाचं गुडोपेते तस्यो परि निवेशयेत्‌ नस्मादुपरि कामन्तु कदल दलसंस्ितम्‌ ुरय्याच्छ करयो पेतां रतिन्तस्य वामतः च्रय्रतोऽन्नं ततो दद्यात्‌ गोतवाद्यञ्च कारयेत्‌ तदभावे कथां ज्ुर्य्यात्‌ काम-केग्रवयो नैरः कामनान्नञा हरेरचचीं स्ञापयेह्ुङ्वारिणण ्एक्तपुष्या चततिलेरयेन्मधुद्दनम्‌ कामाय पादौ सम्यूज्य जङ्ग सौभाग्यदाय ऊरू स्मरारेति पुनमेन्मथायेति ते कटिम्‌ भक्तो रायेत्युद मनङ्गायेत्युरो हरेः मुखं पद्ममुखायेति बद्ध पञ्चशराय वे पुनः सर्व्वात्मने मौ लिमद्येन्मधु रदनम्‌ ततः प्रभाते तं कुम्भम्‌? ब्राह्मणाय निवेदयेत्‌ ° ब्राह्मणएणन्‌ भोजयेद्धक्या यथा लवणदूते। यक्तात्‌ दक्चिष्णं दद्यादिमं मन्त्रसुटौरयेत्‌ ।]

-"-* "~ ~ "~--------- ~~ ~~ -~ ~~~ ~= ~ ~~ ~~

१९ 1) इति केशवस्‌ ^ उदकुम्मम्‌ ^[ 1 पद्यं नासि; `

२२६ ज्त्यरनाकरः |

म्रोयतामच्र भगवान्‌ कामरूपौ जनादन: | दये सब्वेश्रता्ना श्रानन्दोऽभिभौ यते श्रनेन विधिना सव्वं माचि मासि समाचरेत्‌ उपवासो चयो दश्वा मचयेदिष्एमव्ययम्‌ फलसमेकञ्च सम्प्राश्य इादण्यां तले खपेत्‌ ततस्रयोदगशे मासि छतघेनुसमन्विताम्‌ शय्यां दद्यादनङ्गाच सर््वोपसकरसयुताम्‌ कालञ्च कामदिवश्च श्णक्तां गाञ्च पयखिनोम्‌ वासो भिर्दिजदाम्यत्यं पूज्य शक्मा विग्धषरेः। शरय्यागवादिक दात्‌ प्रौयताभिन्युदौरयेत्‌ होमः श्एक्ततिलेः काय्यैः कामनामालुकौत्तेनात्‌ गव्येन सर्पिषा तदत्‌ पायसेन धम्मविद्‌ विप्रभ्यो भोजनं दद्यात्‌ वित्तशाद्यविवष्िंतः। चुदण्डांस्तया दद्यात्‌ पुष्यमालाञ्च शक्तितः यः कुर्य्यादिधिनानेन मद्नदाद भ्नमिमाम्‌ मव्वेपा पविनिरुक्रः प्राप्नोति इरिसाम्यताम्‌ दृह रोके वरान्‌ पुचान्‌ सौभाग्यच्च समश्रुते यः स्मरः खतो विष्णरानन्दात्मा महेश्वरः खुखार्थोः कामङ्पेण सरे त्त जगदीश्वरम्‌ दति मदनद्ाद शोत्रतम्‌ श्रच द्वादश्यां पूजा एकपंलाश्रननं चयोदश्वामुपवासश्चतुदेश्णां पारएमिति प्रतिमासं करमः। चयोद ग्रे मासि चृतधेन्वादिः |

छ््यरलनाकरः १.३७

न्द्ध पुराण- चयोदग्नौषु सर्व्वासु कामः पूज्योऽच वा नरैः याचोत्सवश्च विधिवत्‌ कन्तयश्चाय विष्णवे चयोद्श्यान्त॒ दयिता खयं भचा प्रियेण तु श्रात्मप्ूना कन्तेव्या प्रूजनोया ग्रहे स्ियः लिङ्गपुराणे- कामेश्वर क्घण्डमधिछत्य , चेचे मासि सिते पचे जयोदश्वान्त्‌ मानवाः स्ञानं ये तच कुव्वैन्ति ते कामसदुश्ा नराः॥ अच कामसद्शनरत्वं काम्यम्‌ मदाजनपरिग्डोतवाक्यम्‌- चेच्रत्तचयो दश्यां दमनं मदनात्मकम्‌? छत्वा सम्यज्य यनेन बोजयेद्रजनेन तु ततः सन्धितः कामः युत्रपौचख्द्धिदः पूजामन्लौ- ` एयोदि भगवन्‌ काम रतिप्रौतिसदाकर 'सन्वेषान्त्‌ प्रियो भावस्वत्‌प्रसादान्धनोभव ! नमोऽस्तु परुष्यवाणय जगद्‌द्खादकारिणे मन्मथाय जगन्नेन रतिप्रोतिकराय ते॥ ्रतिश्यितयुण्वा चेयं चयोदशयो भविव्यपुराणोक्तेः शिष्टपरिग्टदौतगेवागमः- मधुमासे तु स्मरा शक्ञपक्तं चतुदेशो

नअ

7 चन्दनात्मकस्‌। 7 सव्वं प्रिया भावाः

१८

१२९ छत्यरलाकरः

ख्याता मदनभञ्ञोति सिद्धिदा सुमरोत्सवा तच ये मूलनचचे घमूलदमनोचयम्‌ निवेदयति गौरे तेषां चेाचंनाफलम्‌

शिष्टपरिग्टदोतवाक्यम्‌- चेचे मासि चतुद्‌श्यां भवेत्का ममो त्सवः जगुश्ितो क्तिभिस्तच गोतवा्चादिभिनृणणम्‌ अवते तुग्यते कामः पुचपोचसष्टद्धिदः॥

ब्ह्मपुराण- उपोग्याय चतुदःश्यां पौणमास्यां हरिं यजेत्‌ पौणमास्यां निकुम्भश्च पिभ्राचेः सद्ितो बलौ याति योद्धु पिश्राचाश्च सिकताद्ोपवासिनः१ तदथं गच्छतां तेषां मध्याङ्के तु ग्डे गडे॥ पूजा कार्य्या प्रयन्नेन नित्यं प्रत्ना यथाक्रमम्‌ पिशाचं शणएमयं छत्वा रम्य ठणएमयञ्च वा गन्येमच्धिस्तथा वस्तेरलङ्गारेमेनोहरैः भच्छेरुन्धो पिकापपे्मे सेदि खेश्च पानकैः खजातिविदहतैः पेयेने बेदयेश्च एथग्‌ विधैः च्रायुधेवि विधा कारेः कचो पानहयष्टिभिः। शका ननपूरिकायुकरैः सितिर्भच्छेशच भस्लया

श्कान्नं यवादि भसा चश्रेपुटः |

~~~ [1 न्न ------------ ~ भाय

1) पुः |

कछत्यरन्ाकरः | ९.२९.

शिक्यकुन्दानविटयपेवेद्धनद्धेख चरेण तन्त्रो वाचर्मनोक्ञेञ्च तया पान्धोपयोगिभिः। चश्मेणा वद्धनद्धेखग्मेवन्धनवद्धेः पान्धोपयो यिभिः कचो पानहा- दिभिः॥ | मध्यद्हतस्त॒ सपृज्य प्रान्ते चन्द्रोदये पुनः। पव्वेवत्‌ पूजयेन्तन्तु विन्तश्रा्विवच्जितः ततः शृतखस््यनो न्वा णन्तु विसच्छेयेत्‌ तमनुज्रजनौयन्त्‌ दितौयदिवसे सति गटहाददूरे यो यस्य पव्वेतस्तमयारहेत्‌ तमनुत्रजनोयं विसन्जंयेदि ति सम्बन्धे: पुनमग्येह प्रविश्चेव कन्तैव्यः सुमहोत्सवः गौ तवा दिचनि्घोषिजेनकोला दलेस्तया कछला णमयं सथं दुः काष्ठैः सुबेष्टितम्‌ क्र डितव्यं पुरयामनगरेषु सब्वेदा सन्लासो दष्टसर्पाणं तत्‌च्णाद्यन जायते) चिभिश्चतुभिंदि वरे: कन्तैव्यः खण्डखण्डशः पसर्पो पसपश्र मनं तच्च खण्डं गहे ग्य परजितव्यं सुपे तु रचितव्यञ्च वत्रम्‌ तथा- मन्दे चाव गुरौ कापि वारेष्वेतेषु चेरे तच्चा शमे धिकं पुण्यं स्ातश्च लभते नरः|

[नषि ~ ==> ~= „~ + 1

7 सर्पा।

१४० क्र्यरनकरः।

दानमच्यतां चाति यिद्ृणाञ्चापि तपेणम्‌ मन्दे श्रनौ विष्णः-- चेचौ विचायुता चेत्‌ स्यात्‌ तस्याञ्चिचवस्तप्रदानेन सौभाग्यं फलमाप्नोति विष्णधर्मोत्तरे- सम्प्राप्य चेचमासखय भ्रक्तां पञ्चदश नरः। विचरवस्लवुग दला सोपवासो दिजातये। ब्राह्मणं स्तपंयन्‌ विप्राः सौभाग्ये मददाप्रुयात्‌ ्न्यत्राद्यमणानां भोजनादिना तपैणएम्‌ मव्छपुराण महावराहस्य पुराणएमाहाव्यमधिकत्य - विष्णनाभिदितं युष्छं तद्ाराहमिहोच्यते मानवस्य प्रसङ्गए कल्पस्य मुनिसत्तमाः चतुर्विं शखदखाणि तत्युराएमिहोच्यति काञ्चनं गरुड कला तिलधेतुसमन्वितम्‌ पौणमास्यां मधौ दला ब्राह्मणाय ज्ुटुज्विने वरदस्य प्रदानेन पदमाप्नोति वैष्णवम्‌ मघो चेचे। ज्रह्मुपुराणे- श्राषाच्छामाश्वयुज्याञ्च पौ वयाञ्चेश्याञ्च सतव्वेद्‌ा रटहोयात्‌ गवां चौर न्वं वत्साय निक्िपेत्‌ खातः सव्वेपापेः प्रमुच्यते दल्युपक्रम्य श्रलयासे तथा चेचौ- -मिति यमः

कछत्यरलाकरः | २.४१.

क्रमप्रूजा देवौपुरण- सव्वेकामप्ररिद्यां पुजनौया यथा शिवा तथा ते कथयिष्यामि प्रण वत्स ! समासतः चे्यादौ या समाख्याता पूजा सर्व्वा्ैसाधनो ¦ तस्या भेदान्‌ प्रवच्छामि इष्टा पूत्तपसिद्भये व्यां चि च्चंगां प्रजां छत्रा लाष्रपदं लमेत्‌ दतौचायान्त्‌ वैश्राखे रो दिष्य प्रपूजयेत्‌ उदकुम्भप्रदानेन ब्रह्मलोके महौयते दरद्राद्चिदेवते क्ते पौणमास्यां तथेव पूजां छता भवेद्ह्मन्‌ विगताचघौ नरोत्तमः दृनद्राभ्निदेवते विशाखानचचे " चभ्रः परिग्रहः कार्ययो दानं देयं दिजातिषु चयाणामेकमादाय श्रशधिं देवं प्रपूजयेत्‌ श्रतरिहोचौ भवेत्‌ पूत एतदर्णाभितं फलम्‌ मूलक्चं पश्घातेन व्येष्टे देवौ प्रपूजयेत्‌ सर्वान्‌ कामानवाश्नोति भावश्द्ेन कश्येण श्राषाढ़ मासि यो देवौमाषादृच्ं प्रपूजयेत्‌ सर्वान्‌ कामानवाप्नोति देवौीलोकन्च गच्छति श्रावणे पूजयेदेवौ परतिपद्यादितः क्रमात्‌ ! ` ब्रह्ममूत्तिगताग्डच्चे पुखे भौजङ्गमेऽपि वा ॥- भोजङ्गसे अक्षेषानचते

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छत्यर्नाक्ररः |

श्रधिवाख्विधानेन पविचारोहणं भवेत्‌ , नह्माग्धुमागणेश्रस्य नागस्कन्दतलुखिता रविमातङ्गरूपा तु मङ्गला सा तदा भवेत्‌| ृषविष्णु शिवाकारा कामसद्रसमाकतिः श्रक्ररूपा प्रयष्ट्या देवो गन्धखगादिभिः। प्रथसे चाश्रमे पूजां गटद्यकम्म ्रतादि च॥ छत्रा कामानवाप्रोति बिगताघो सुनोश्वर ! | प्रोष्ठकर्णासु (?) कन्तव्या पूजा जागरणं निभि मद्येतससव विधानेन सौ नार्मणिफलं लभेत्‌ अष्टम्यां रोदि खच्वे सोपवासस्तु पूजयेत्‌ विष्एलो कमवाश्नोति सब्वेकामश्टद्धये तचैवं कारयेदेवौं वेदरूपां महोदयाम्‌ कन्यास्े रवादिषे पूजनौया यथाविधि

षे आध्िने।

भौजङ्ग तिथिमाञित्य यावचन्राकंसङ्गमम्‌ तचापि महतौ पूजा कन्तैव्या पिढदेवते क्ते पिण्डप्रदानन्तु च्येष्टपु्रौ विवच्नेयेत्‌ आहवेषु विपन्नानां जला्चिग्डगुपातिनाम्‌ चतुदेश्यां भवेत्‌ प्रजा श्रमावखान्तु कामिक कन्यास रवाविषे शक्ताष्टम्यां प्रपूनयेत्‌ ` सोपवासो निश्द्धं तु मंहाविभवविस्तरौः॥

-सुनि।

कत्यरनाकरः | १,४द्‌

पूजां समार भेदेव्ा नज वारुणेऽपि वा वारणे शतभिषानक्षचे ग्रघातः प्रकन्तंग्यो गवलाजवधस्तया वलिक्तपं सुरेन्द्रापणं कला सर्व्वान्निष्णं नयेत्‌ युद्धयाचा तु कत्ता या युरा संप्रकौत्तिता॥ शक्रोत्सवे महापुण्टे तस्मिन्‌ देवों प्रपूजयेत्‌ तुलां दौपदानेन पूना कार्यां महाफला दोपः प्रकन्तेव्यो दौ पचक्रमथापि वा। ठनैपयाचा प्रकन्तेव्या चतुद्‌श्यां कुहु सोनौवाक्ती यदा वत्स तदा काय्य महाफलम्‌ ! सव्वेेव प्रकन्तेव्यं बलिपरूजामहोव्सवम्‌ देवतानां समुत्थानं कुर्य्यात्‌ पौष्णे तु बुद्धिमान्‌| नोराजनं प्रकन्यं नृ-नाग-तुरगादिषु