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किज्यित्‌ प्रास्ताविक्‌

ग्रथ' को3यमनुवादों नाम तादत्ूबंझुपात्तस्यामिपरेयश्यामिधानत्य था प्रयोजनवान्पुनर्पन्यासोउत्र विवक्षित।) | पश्चाद्ादो3नुवादों हेतीयीकः प्रयोग ति सत्यपि योगल्नभ्येज्थंडरित हास्य शव्दरयार्थानतरे रूढिराधुनिकः संकेत इति वा। क्िमिद्मर्थान्वरमित्याकाडक्षायाप्ुच्यते--प्रकृतिभूतस्य कस्यचिद्‌ वाग्विन्यासस्थ परत्र बोधसंक्रान्तये प्रवृत्ता साषान्तरपदात्मिका बिंस्यप्रतिविम्ब- सावमजहती व्यवद्ाससबुपतन्ती तद्गतार्थसाकृल्यं समर्पयन्व्यनुकृतिरभुवाद तेन प्रकृती यावान्‌ याहशश्चार्थों5मिप्रेयादियहिग्मिरेव पदै। सुप्तिडन्तैरसमस्तै समस्तेस्तद्धितान्तेर्वा प्रत्याय्यतेडनुक्ृता यदि वाबांस्ताहशस्ताहग्मिरेव पढे प्रत्याय्यते वहिं चारिताथ्यमनुवादृस्य, बेतरथेति लक्षणगवेन बिग्बप्रतिबिम्बेत्या- द्विशेषशेन द्योत्यते तेनेव सन्दुर्भविशेषस्य यद्‌ भाषान्तरव्याख्यानमात्र तद्‌ व्यवच्छिद्यते अन॒वादे शिष्टव्यवहारेडपि सम्यगवधेयम्‌ | व्यवद्दारो साषासु नेक॒विधो यथातर्थ देदनीय:। व्यवहारातिक्रमो हि. दूषयति वाचम्‌ अव्यवहृता वाग इद्म्प्रथमतया प्रयुज्यभ्ञाना नाद्रियते लोक इत्यतोडनीष- त्करोब्नवादों विशेषज्ञ: किसुत यस्किन्चनज्ञ।। गय्य कवीनां निकषं वदन्ती' ति कविमणितिरवितथा स्थात्‌। प्रयोगचणानां भाषामसंज्ञानामनवाद एवं परा परीक्षेत्वविसंचादी वादः गुरवो5प्यन्न साशहूं प्रवर्तेन्ते, केव कथा शिष्याणाम ?

मन्‍ये काचिद्जिह्ा राजपद्धतिरत्र प्रस्तवनीया ययाउनन्‍्तराय॑ प्रद्नताश्छात्रा अचिरेणेवेप्सितमाप्नुयुरनुवाद्रहस्यं चाकलयेयु इममेवार्थमनसन्धाया- $नुयादकलेयमस्मामि:ः प्राणायि कया रीध्योपन्यस्तोडथोंइग्राम्यों भवति., कै! पद्रपितोउयं मधुरतर आपतति मनसः अ्रवशयोश्र, केन चर क्रमविशेषेश सन्दृब्धो मुदसावहति शिष्टस्य लोकस्थ, कथं माषान्तरेणानूद्यमान उक्त- चरो5थंस्तन्मुद्रां नाँतियातीति निदशयितुसेव भ्रद्नत्ता बयम्‌ आधुनिकाः शिष्टैर- ननुग्रृहीताः केचन वार्चा सार्गा अनास्थेया भवन्तीत्यपि दिदृर्शयिषामः एतद्थंमिह विषयप्रवेशों नाम अन्थेकदेश: प्रणीच; ततन्र विचनेतर्णा विनोदाय विनेयानां अबोधाय बहूपकारक॑सुजात॑ वेद्जातमुपन्यस्तस्‌ तदिह दिडः मात्रमुदाहरामः। तीन दिन से मेह बरस रहा है--अस्य वाक्यस्थेद- सेव संस्कृत शिष्टजुष्ठमू--( अद्य ) त्रीयि वाधराणि वर्षति देवः। शअत्नार्थे रघुवंशगतस्‌ - इयन्ति वर्षाणि ठया सहोग्रमभ्यस्यतीव अतमासिधारम-इति' वाक्य प्रमाणम्‌ | अद्य कतिपयान्यहानि नेवागच्छुति अद्य बहूनि दिनातनि

(२)

नावतेते इति चोमयामिसारिकायां धूतंविद्संवादे च। वासराणीत्यादिषु द्वितीयाइत्यन्तसंथोगे कालो झछन्न वतंसानकाल्षिक्या क्रियया साकल्येनामि- व्याप्त इति तदुपपत्ति: केलिदुक्तार्थेंड न्रीण वासराणि वर्षतों देवस्येति संस्कृत साधु पश्यन्ति तन्‍न अत्रानुकृतो काका प्रधान क्रिया चोपसजेनम्‌। वर्षणं हि कृतप्रत्ययेन शन्ना कालसम्बन्धितयोक्तमिति व्यक्तमसप्रधानम्‌ | मूलहिन्दीवाक्ये तु विपययेणार्थोपन्‍्याल इति. बिम्बप्रतिबिग्बमावजमजह॒तीति पूर्वोक्त लक्षण नानन्‍्वेति

इर्द चापरमेतज्जातदीयक बिरृश्यम्‌ 'छुः महीने पूर्व एक सीषण सुकर्प आया, मद्दमद ते सारत पर एक हजार ब्ष पूर्वे आक्रमण किया तथा पिछले पक्ष में मूसल्ाघार वृष्टि हुईं! इत्यमीषां वाक्‍्यानां किंसुपेणाजसेव संस्कृतेन भरविवष्यमिति केचिदिमानीत्थं परिवतेयन्ति संस्कृदेन--इतः षण्मासात्यूव बढ्वर्द भुरकस्पत, इतो वर्षसदलात पू्ची, महमूदी मरतभ्ुवमाचक्रास इतः सप्ताइदय॑ पूथ घचारासाररबपंद्‌ देवेः अपरे इतः षंड्भ्यो मासेभ्यः पूर्व' बल्वद्‌ सरकम्पत इतो वर्षसहखात्यूचं' सहसखुदों भरतभुवमा- चक्राम इतः संप्ताहद्यात्यूतं धारासारेरच्षंद्‌ देवः | इतरे च--षरय्मासा झतीता यदा बल्नवद्‌ स्रकस्पत वर्षसहस्नमतिक्रान्त यदा महमूदी मरतभुवमा- चक्राम सपाइद्वयं गतं यदा धारासारेर्वषंद्‌ देव इत्येवमुक्तमर्थमनुवदन्ति सर्वोज्य॑ प्रकारो दुष्ट इति नाभिनन्दनीयों विदुषधामिति संग्रहेणोपपाद्याम/-- प्रकारत्रितये प्रथम प्रकारस्त्वापातवोउप्यरम्य; सुतरां जघन्यः इह' पयणमा- सानित्यादिषु यथा प्रथमाउनन्वयिनी तथा हितीया$पि | द्वितीया झ्त्यन्त- संग्रोगे विहिता, चान्न नेष्ट), तेन कृतोउ्च्र द्वितीया सूपपादा स्थात्‌ सवथा$- नबन्वित पदकदम्बकमिहोपन्यसर्तमितों वाक्यमप्रि सवति, मज्ञानुकारिता तु दूरापेता द्वितीयब्मिन्प्रकारे इतः षड्भ्यों मासेम्यः पूर्वमित्यादि यद्यपि सवथा खसस्कारवद व्याकरणानुगत च, तथापि विवश्षिताथ' नापंयतीति नषानुकृतिरनवद्या सवति इद्मत्रावद्यम-मले समयस्यको5वधिरमिप्रेत संस्कृतच्छायायां व्ववधिद्व्यं व्यक्तमुद्तिस्सवति अग्रश्च क्रियाविशेषाभिव्याप्तः काल्रोउ्त्यगान्नासो परि- च्छिन्न:। अन्र वाक्येषु त्विदमादिरथों विस्पष्ट:--सकम्पादिभ्यंतिकरे नामातीते मासपषट्कादी काले नाभूत्‌, ततः पूच कदाउसदिति सुज्ञानमस्ति वक्तुश्च नेषा विवद्षेत्ययमपि प्रकारों हेयः। तृतीयरिमन्प्रकारेडपि दोष॑ विभावयन्ति विज्ञा:। अन्न पूजन्र वाक्ये कात्मात्यो निर्दिष्ट | सं किसवधिकः किक्रियापेक्ष

६. 8. ,)

इति नोक्तम। उत्तरत्र क्रियोक्ता स्वातन्थ्येण, तु पूदवाक्यगवकालावधि- स्वेन। तेनोअयोर्वाक्ययोरवध्यवधिसरझधावों नादगदो भदति मूलचाकयेड- मिसन्धित्सिद्यो वकत्रेति दूरं सान्वरे छाया च॑ मूल चेथि दुरबधारं सुधौभिः

तेनापद्दाय दुष्टमेतत्प्रकारत्न्य निदुष्टमिदं प्रकारप्रयं॑ परिगृहन्तु सन्‍्तः-- ( ) अद्य पण्मासा मुर्वः कमिपताया। अदय वर्षखह् महमसूदस्य सरतखुब- समाक्रान्तवतः (अथवा सहमूदेव सरतभुव आक्रान्ताया।))। श्ेद्य सप्बाहद्दयं धारासारेइृप्टस्य देवस्थ (२)--अद्य पछ्ठे मालि बलचद्‌ सुरकस्पत श्रद्य सहस्नतमे दर्ष महजूदोी सरतभुवश्ाचक्राम। घअत्य चतुर्दशे दिवसे धाराखारै- रवर्षद्‌ देवः (१)-इत. षट्सु मासेघु बल्नब॒द्‌ भूस्फम्पत | इतो वर्षलहले महमुदो भरतभुवमाधक्राम इत सपताइइये थारासरेरवर्षद्‌ देवः इृह प्रथमे प्रकारे षय्मासाः, वसहस्लम्‌ , सधाहद्वयमित्यवीतं काल परिस्छिन्दन्ति तत्न सववन्रातीता; सन्तीत्यादे; क्रियाया शम्यमानाया: कर्तृदया प्रथमास्तानीमानि निर्दिष्ानि झुव इत्यादो षष्ठी शैषिढ़ी अति स्वस्मादह इत्यर्थमाचपष्टे- 5घिकरणबृत्तिपि तथा शिष्टप्रयोग;:---अद्य प्रस्ृत्यचनताज्लि तवाध्मि दास इति द्वितीयस्मिन्प्कारे बहु वक्तत्थम॒स्ति षष्ठे मासे इत्यादी सप्ठतमी साव- लक्षणा जेया अ्यं चिन्यासः छुन्दमालागतेव अद्य सप्तम दिवसे सैंपतिता- मिस्तपोवनवासिनीभिर्विज्ञापितो रूगवान्‌ वाल्मीकि: ( चतुर्थाद्भादो ) इति ग्रन्थेन समर्थतोी स्रवति। दृतीये खकु प्रकारे इत इति पशञ्चम्यर्थ बसि- प्रययाव्व:। पश्चमी च. यवश्राध्वकाजनिर्माण तत्र पत्चमींति वातिकेन कालमाने विद्विता। पट्सु जरासेष्वित्यादी सप्तमी त्तु काल्माव्सप्वमीति बचना- चुसारिणी अन्नास्त्ये प्रकारे शाचरसाष्यमपि अमाणमु-- प्रतीमते द्वि गांग्यादिस्यः सास्नादिमानर्थ; तस्मादितो वर्षशतेप्यस्याथस्थ सम्बन्ध आशीदेव, ततः परेण ततश्र परतरेणेत्यभादिद्ेति। प्रदारत्रितयमप्येददेषण्ीयं प्रशयने परीचते दा वाचाम्‌ |

इईं चेद्द विवेच्य किमेत्रे प्रकाशस्छुन्दतों यत्र तन्र शक्‍या आस्थातुमुत यथास्व॑ प्रतिनियवविषया अ्रमी इति अन्‍्त्यं प्रकारद्रम तु कामतो बन्च तत्र शक्य॑ प्रयोक्तुम। उसयथोच्यमानेथं दोषः कश्नित्‌ प्रांदुःब्यात्‌ , वा किश्विदाकुतं स्थात्‌ प्रथमः प्रकारस्तु क्वचिदेंव संगत, स्पात तन्न हि काज्- विशेषस्था तिक्रान्तस्थ विशेषयी द्धत्ता क्रिया कृष्पस्ययान्तेन पष्छ्यब्वेचोच्यत इचि कालापेक्षया तस्थाः प्रव्यका भीणवा तस्माचनत्रेबदिधः क्रिंयाकात्नयोंगुंण- प्रधानसावोसिप्रेयते तत्रेवेष प्रकार झोपयिको नेतरन्न अन्न तु क्रिया

( ४)

प्राधान्येन विवक्ष्यते तिडाय चोच्यतें दन्न कालनिदृश। सपघ्तस्येच युक्त इति प्रकार- इयमन्त्यमेव तन्न साम्प्रतम्‌

इतो व्यतिरिक्तमपि प्रद्नारान्तरं सम्भवति | इतः षड्मिर्सासेः पूर्व भूरकम्पत इतो वर्षसहसेण पूर्व महम॒दी भरतभ्ुवमाचक्राम | इतः संप्ताहह्येल पूर्व घारा- सारैरव्षेद्‌ देवः अन्न वाक्ग्रेषु वर्षभहसेशणेत्यादिषु या तृतीया सा$क्रमणादि- क्रियाया; पौव्यविधिमवच्छिदत्ति सासप्चे: वर्षपवे इत्याद्यः समासा: 'प्वेसदश- समोनारथक्तह निएुणमिश्रश्लद्ण रि!ति शास्त्रेजाभ्यनुज्ञायन्त समासविधानाज्य लि्ञान्मासेन पूर्व इति वाक्ये४पि पुरवंशब्दयोगे तृतीया साध्वीत्यास्थीयते तेन मत्तो नवभिर्मासे; पूर्वो देवदत्त इति दोषश्षेशेरस्एृष्टं बचः। इद्मनत्र तत्वम्‌। प्दंशब्देन योगेःस्मच्छुब्दात्मग्रमी तेमैव योगे मासशब्दात्ततीया अवध्यर्थे पञ्चमी, अवच्छेदे तृदीयेति विसक्तिभेदः यदि मासेन पर्व इति निरस्तसमस्त- दोषः प्रकारस्तहिं पद्मि्साले: पे म्रकम्पतेत्यादि कर्थ दोषास्पदं स्थात्‌ ! अन्न पूर्वेमिति कम्पनक्रियां विशिनष्टि, मासेरति पूर्वतों क्रियाया अवच्छिनत्ति नात्र दोषस्तोक विभावयासः अग्रहत एव बाचां पन्‍था इति शिष्यान्परि- आहयासः खथा विरवधो5प्ययं प्रकारो तावडमाणकोर्टि निधिशते धावज्न शिष्टप्रयोग: समथेनां लगते

अन्न कियानप्यंशो विषयप्रवेशात्समुद्शत्य संस्कृतेनोपनिबद्धः प्ररोचये- दैष सदसद्वितेचनचणानिति। हिन्दीवाचा ततन्र _ बहवश्िन्तिता अर्थों), हिन्यां चारचिचिंदुर्षां प्रायेणेत्रि ते समुपेक्ष्येरन्निति भीरेव नोउनव्पा प्रयुडक्ते। यदि चास्मामिश्रिन्तितव्यद्सिते तस्मिस्तस्मिन्नर्थ विह्व्जनदकपातानुभद्दो$पि ने स्थात्‌, का नाम साथकताउस्मअयासस्य स्थात्‌

इदं तेउज्यर््या महाभागा;:--यदि सयाउभ्युपगते क्वचिद्र्था विसंवादुः स्थान्मदुक्तमप्रमाणमिति वाध्यथाथेमिति वा<्नुपपतन्नमिति वा बुद्धिरुदिया- सदावश्यं तसदावेद्य तत्न तत्र दोषसुद्धाव्य भुयोउजुआश्योडयश्जन इति ||

यदि तबुरपि दोषों सत्कृतों नूतनार्था- ब्लसति ह॒दि बुधानां वागुपासापराणाम्‌ | यदि भवति बोधः शेक्षज्ञोकस्य कश्चिद्‌ अनु वदवकलायाः स्थात्तदा धन्‍्यता मे

विदुपामाश्रवथारुदेव। शास्री।

थ्रों नमः परमात्मने नमो भगवते पाणिनये | नमः पूर्वन्यः पथिक्ृद्धाय नमः शिश्टेम्य)

विषय प्रवेश

संसक्ृव वाक्य की रचना--प्रायः संस्कृत वाक्य में पदों का क्रम आधुनिक भारतीय माषाओं के समान ही होता है | श्रर्थात्‌- सबसे पहले कर्ता फिर कम और बाद में क्रिया। उदाहरणार्थ--राम: सीता परिशि नाय (राम ने सीता से विद्राह किया )। विशेषण उन संज्ञा शब्दों के पूव आते हैं, जिनके अर्थ को वे अवच्छिन्न करते हैं ( सीमित करते हैं ) श्रौर क्रियाविशेषण उन क्रियापदों के पहले प्रयुक्त होते हैं जिनके अर्थ को वे विशिष्ट करते हैं (>>जिनके श्रर्थ में वे प्रकारादि विशेष अथ जोड़ देते हैं ) उपर्यक्त वाक्य को विशेषणों के साथ मिलाकर इस प्रकार पढ़ा जा सकता है--द्णा श्रेशे रामो धर्मज्ञां सवंबोषिद्गुण/लझऋतां सीतां परिशणिनाय | क्रिया-

विशेषण सहित यही वाक्य इस प्रकार बन जाता है--ठुणां श्रेष्ठो रामो धर्मझां सर्वयोषिद्गुणालडकृता सीतां विधिना | (विधानतः) परिणिनाव संस्कृत भाषा के शब्द केवल सामान्यतः परन्तु विशेषतः विक्षत रूप में प्रयुक्त होते हैं। यहाँ वाक्य रचना करते हुए पदों को किसी मी क्रम से रक्खा जा सकता है वाक्यार्थ में कुछ भी भेद नहीं होता और ही बोध में विलम्ब होता है। आहर पत्रम्‌ , पात्रमाहर। पात्र लाओ। दोनों वाक्‍्यों का एक ही अथ है। एवं हम ऊपर वाले वाक्य को--रामः सीतां परिशिनाय, सीतां रामः परिशिनाय, परिणिनाय सीता राम;, परिणिनाय राम सीताम्‌, सीतां परिशिनाय राम।-- किसी भी ढंग से कह सकते हैं | इन सब वाक्यों में चाहे शब्दों का कोई भी क्रम क्‍यों हो 'राम' कर्ता सीता” कर्म और 'परिणिनाय? क्रिया ही रहते हैं ये शब्द सुप्‌ विभक्ति तिड विभक्ति के कारण भटपठ पहचाने जा सकते हैं यह क्रम अंग्रेजी आदि अविकारी भाषाओं में नहीं पाया जाता राम ने रावण को मारा, इस वाक्य के अंग्रेजी श्रनुवाद मैं पदों का न्यास क्रम विशेध से करना होगा। प्रथम राम, पश्चात्‌ क्रिवापद, ततूपश्चात्‌ “वरण'। राम! और

की की आज लि मिल दल की की की कक कि >क ..म जम आल + यह रूप में क्रियाविशेषण होता हुआ भी अर्थ की दृष्टि से क्रिया-

विशेषण ही है

( )

(रावण के स्थान का विपयय हो जाय तो अर्थ का अनर्थ हो जाय हिन्दी में भी अंग्रेजी के समान क्रिया का स्थान निश्चित है। जहाँ हिन्दी में क्रिया वाक्य के अन्त में प्रयुक्त होती है, वहाँ अंग्र जी में यह 'कर्ता' और कम” के बीच में अ्राती है। अंग्रे जी में कता ओर कम कभी भी साथ नहीं आरा सकते हिन्दी में भो कर्ता और कम चाहे साथ जायें, पर क्रिया वाक्य के प्रारम्भमें बहुत कम आती है। परन्तु संस्कृत में जेसे हमने श्रभी देखा है, यह सब कुछ सम्मव है।

संस्कृत में 'विशेषण' तथा “क्रिया विशेषण' भी उन संज्ञा शब्दों वा क्रिया- पदों के पहले पीछे तथा मध्य में प्रयुक्त हो सकते हैं जिन्हें वे विशिष्ट करते हैं | क्रियापद को विशेषण और विशेष्य के बीच में रखकर हम उप्यक्त वाक्य को इस प्रकार पढ़ सकते हैं--हुणा श्रेढ्ठो रामो धर्मशां सबंबोपिद्गुण लड्कृतां परिणिनाय सीतवाम्‌। इसी प्रकार 57 ५: +शण का भी प्रयोग हो सकता है | जसे--अ्रद्याह ग्रह गमिष्यामि, या-अहं गहमतद्र गमिष्यासि”। परन्तु यह नियम प्रायः सबंगामी होता हुआ भी कुछ एक स्थलों में व्यमि- चरित हो जाता है। वहाँ क्रमविशेष का ही व्यवहार देखा जाता है। कथा _ का प्रास्म्भ “अस्ति' या “आ्रासीत्‌' क्रिया से होता है, जसे--अस्त्ययोध्यायां चूडामणिनाम च्त्रियः | पश्चयन्त विशेषण का प्रयोग संशाशब्दों से ठीक पहले (अव्यवहितपूब ) होना चाहिए श्रन्य विशेषण समानाधिकरण अथवा व्यधि- करण उसके बाद में सकते हैं | उदाहरणाथ--सव गुणसम्पन्नस्तस्य_सुत३ कस्य स्पृह्ं जनयति | इस वाक्य में 'सवगुणसम्पन्नःः 'तस्थ” का स्थान जहीं ले सकता। कह्या प्रकोष्ठ हम्यदिः काज्च्या मध्येभबन्धने”! (अमरकोषः) यहाँ 'मध्येभबन्धने! समरास इस क्रम का समर्थक है। पहले पष्ठयन्त 'इभ' का बन्धन के साथ समास होता है--इभस्थ बन्धनम्‌ इमबन्धचनम्‌, फिर मध्ये (विशेषण) का 'इभबन्धनम! के साथ समास होता है--मध्ये इभबन्धनम्‌ मध्येमबन्धनम्‌ ।” समानाधिकरण विशेषण के लिये अमर के '्यार्वासर्डमश्वा- भरणेऊमत्रे मूलवणिग्धने! इस बचन में 'मूलवशिग्धने! सुन्दर उदाहरण है। इसका विग्रह भी प्रकृत विषय की यथेष्ट समर्थना करता है--वरणिजों धन वरणिग्धनम्‌ , मूल तद्‌ वशिग्धनं चेति मूलबणिग्धनम्‌ , तस्मिन्‌ |

इसी प्रकार मालविकाम्निमित्र को टिप्ना:एुनादिगाशाररपतिनित्रत- हृदयस्या--यह प्रयोग भी उक्त क्रम का समथक है। हिन्दी का क्रम अन्तः- पुर की सारी ख््रियों में श्रासक्ति से हटे हुए. चित्तवाले काः--संस्कृत से विपरीत

न)

है | सावनामिक विशेषण और पष्ठयन्त विशेषणों में पष्ठयन्त विशेषणों का ही विशेष्य से अव्यवहित पर स्थान है--सवर्योपितां गुणेरलड्क्ृता। यही निर्दोष क्रम है, इसमें समाख रचना भी ज्ञापक हे--सवयोपिद्गुणालडक्ृता | योषित्‌ सवगुणालड्कृता' नहीं कह सकते। अथांत्‌ पष्टीसमास पहले होता है और कमधारय पीछे जब सावनामिक और गुणवाचक दो समानाधिकरण विशेषणु हों तो साव॑नामिक का स्थान पहला होता है ओर बाद में दूसरे का--चारूणि सवाण्यज्ञानि रमण्या: समास से यहाँ भी इ्ट क्रम का यथेष्ट समथन होता हैं-- चारुसवाद्धी स्चावंज्ञी' नहीं कह सकते समानाधिकरण होने पर भी सावनामिक विशेषण ही विशेष्य से अव्यवहितपूव रखा जाता है। परम स्वो घममोञत्य! इस विग्रह में 'परमस्वधम:' ऐसा समास होता है। 'स्वपरमघर्म:--- नहीं कह सकते | 'परमस्वधरम:” त्रिपदबहुब्रीहि समास है क्‍ कई वाक्यों में लोकिक वाक्य के अनुसार शब्दों का क्रम निश्चित सा प्रतीत होता है। जेसे--“अद्य सप्त वासरास्तस्थेतों गतस्य! | यहाँ वाक्य का प्रारम्भ अद्य' शब्द से होता है 'अद्य' के बाद व्यतीत-हुए समय को सूचित करने वाढे शब्द हैं, और इन शब्दों के बाद पुनः घष्ठयन्त विशेष्य, निपात, तथा पष्टयन्त विशेषण का प्रयोग किया गया है। इस प्रान्त की भाषा में इस वाक्य से मिलते जुलते शब्दों का क्रम ठीक इसी प्रकार का ही है इसी प्रान्त में कई श॒ताब्दियों तक संस्कृत बोलचाल की भाषा थी। यहीं से भारत के अन्य विभागों में संस्कृत का क्रमिक संचार हुआ इसी लिए वाक्यों को समानता का एक विशेष महत्त्व है। यह समानता ऊपर निर्दिष्ट किये गये क्रम विशेष का समथन करती है | इसी प्रकार 'तस्य सहर्ख॑ रजतसुद्राः सब्ति! इस वाक्य के स्थान में सहर्ल॑ रजतसुद्रास्तस्य सन्ति! अथवा-- सहसख्त॑ रजतमुद्रा$ रान्ति तत्यां इस प्रकार का न्यास व्यवहारानुकूल नहीं। “एपाडब्याति ते माता शिशो' के स्थान पर-शिशो माता एघाइड्याति' ऐसा कहने का प्रकार नहीं है। इसके अतिरिक्त कुछ शब्द ऐसे हैं जो वाक्य के और श्लोक-पाद के प्रारम्भ में प्रयुक्त नहीं किये जा सकते। इस प्रकार के कुछु एक निम्नस्थ अव्यय और अनव्यय शब्द उदाहरण रूप से दिये जाते हैं, जेंसे-च, चेत्‌, तु, पुनर , इति, खलु +, नाम तथा युष्मद्‌ और अस्मद्‌ के त्वा, मा आदि रूप | “च! संयोजक

' काव्यालझ्लारसूत्रह्डसति का “न पदादों खल्वादयः:”“--यह सूत्र भी हमारे कथन के अनुकूल है

( )

निपात है इसका प्रयोग उन शब्दों के अगन्तर किया जाता है जिन्हें यह परस्पर मिलाता है। अथवा परस्पर जोड़े गये शब्दों में से केवल अन्तिम शब्द के साथ ही इसका प्रयोग किया जाता है जेसे--ऋरामश्र लक्मणुश्र श्रथवा--- (रामी लच्मणश्र |

वाक्य में वा! की स्थिति भी च' के समान ही है। जेसे--नरः कुझ्जरो वा अ्रथवा नरो वा कुछ्लरों वा! व्यवहारानुसार है हम “कृष्ण चेन्नंस्थसि स्वग यास्यसि! के स्थान में 'चेत्‌ कृष्ण नंस्थसि स्वर्ग यास्यथसि! ऐसा नहीं कह सकते जहाँ नमस्ते! शब्द प्रयोग बिलकुल्न ठीक है वहाँ ते नमः? अत्यन्त अशुद्ध है | युप्मद्‌ और अस्मद्‌ के वेंकल्पिक त्वा, मा आदि प्रयोगों का “च, वा, हू, अह, ओर एव! के साथ वाकयों में प्रयोग नहीं कर सकते | एवं जहाँ (व चू मम॒ च्‌ मध्ये! व्यवहार के सवथा अनुकूल है, वहाँ ति मे मध्ये व्यवहार के ठीक प्रतिकूल है। इसी प्रकार हम 'तबेब' प्रयोग कर सकते हैं परन्तु 'त एवं' नहीं कह सकते | 'किल' और जात” वाक्य के प्रारूस में कदा- चित्‌ ही थाते हैं | एवं अहति किल कितब उपद्रवम! तथा “न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति” ये प्रयोग ठीक माने जाते हैं

लिक़ ओर वचन---हिन्दी शब्दों के संस्कृत पर्यायों के लिझ्ज का खनुमान छात्रों को हिन्दी वाख्यवहार से नहीं करना चाहिए संस्कृत में लिड् केवल मात्र अमभिषान-क्ोष तथा बृद्ध व्यवह्वार से जाना जाता है। व्या- करण के नियमों का लिड् निधरिण में कुछ बहुत उपयोग नहीं। अमभिषेय वस्तु का स्रीत्व वा पुष्य, तथा चेतनता वा जड़ता का शब्द के लिड्ग के साथ कोई सम्बन्ध नहीं

# बह्तुतः प्रत्येक सउुच्चीयमान पदार्थ के साथ समुच्चचय बाचक च! का प्रयोग न्यायप्राप्त हे, पर वक्ता आलस्थवश केवल अन्त में ही इसका प्रयोग करता है, अन्यत्र प्रायः उपेक्षा करता है। पर निश्चित ही 'च' की आवृत्ति का प्रकार बढ़िया है

जातु' कभी कभी वाक्य के आदि में भी आता है, इसमें अधष्टाध्यायी कं का जात्वपूवम ( ८१४७ ) सूत्र ज्ञापक है।

)

संस्कृत में एक ही व्यक्ति तथा वस्तु के वाचक शब्द भिन्‍न मिन्‍न लिंगों के हैं जेसे--तठः, तटी, तठ्म्‌, ( तीनों का अर्थ किनारा ही है ), परिग्रहृः, कलत्रमू, भागा (तीनों का अथ पत्नी ही है), युद्धम्‌ , आजिः (स्त्री०), सद्धरः (तीनों का अथ लड़ाई ही है )। कमी कभी एक ही शब्द कुछ थोड़े से अ्रथ भेद से भिन्न भिन्न लिड्लों में प्रयुक्त होता है। अरण्य (नपुं०) जड़ल का वाचक है, परन्तु अरण्यानी (स्री०) का अर्थ बड़ा जंगल है। सरस्‌ नपुसक्र० तालाब या छोटी मील होती है, पर सरसी स्री० एक बड़ी कील] सरस्वत्‌ पु समुद्र का नाम है, परन्तु सरस्वती स्री० एक नदी का | गोष्ठ नपु'० गौओं का बाड़ा, गोशाला होती है, परन्तु गोष्ठी ्ली० परिषद्‌ , समा। गन्घवह पु का अर्थ वायु! है, गन्धवहा ख्री० नासिका का नाम है। दुरोदर नपु»० का श्रथ जुआ है, दुरोदर पु जुआ खेलने वाले को कहते हैं। इसमें कोई श्राश्चर्य की बात नहीं कि एक ही वस्तु के मिन्न भिन्न नाम भिन्न मिन्न लिज्ञों के हों | पहले बता चुके हैं, अथवा जसे--तितउ पु ०, चालनी स्त्री० और परिपवन नपु ये सब चलनी के नाम हैं। रक्तुस नपु० और राक्षस पुँ० दोनों ही राक्षस के नाम हैं। किसी शब्द का लिख मालूम करने में कुछ एक इतव्‌ प्रत्यव भी सहायता करते हैं इनका परिचय व्याकरण पढने से ही हो सकता है। छात्रों को सूत्रात्मक पाशिनीय लिज्ञानुशासन अथवा इलोकबद्ध हृपब्ंधन कृत लिड्ानु शासन पढ़ना चाहिये ।&#& विशेषण विशेष्य फे अधीन होता है। जो विभक्ति, लिंग बचने विशेष्य के हों वे ही प्रायः विशेषणु के होते हैं। कुछ एक अजह॒ल्लिज्ञ शब्द हैं, जो विशेष्य चाहे किसी लिक्ष का हो, अपने लिंग को नहीं छोड़ते | उन्हें गे अ्भ्यासों के संकेतों में मिर्दिट कर दिया गया है। यहाँ केबल एक दो | महत्सरः सरसी गारादिलान्दीय्‌ -क्षीरस्वामी। दक्षिणापथे महन्ति सरांसि सरस्य उच्यन्ते-महामाप्य | # जसा भाष्यकार ने कहा दे लिझ् लोकाश्रित है। इसका विस्तृत तथा सम्यगज्ञान लोक से ही हो सकता है ओर अब जब कि संस्कृत व्यवहार की भाषा नहीं लिझ्ष-ज्ञान कोप से ओर साहित्य के पारायण से ही हो सकता है। स्थूणा सत्रीलिज्ज है, पर ग्हस्थूण नपु'० है ऊणा स्त्री० हे पर शशोर नपु है | इस विपय में व्याकरण शास्त्र में कोई विधान नहीं।

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अनूठे प्रयोगों की ओर छात्रों का ध्यान आकर्षित करना चाहते है ।४दहिता च॑ कृपणं परम” ( मनु० श्थ्ण॥ ) यहाँ विशेष्य 'दुह्विता' स््ीलिज्ज है ओर विशेषण 'कृपण' नपु'सक है। अग्निः पवित्र मां पुनात' (काशिका), त्रापः पवित्र परम प्रुथिव्याम! ( वाक्यपदीय में उद्घुत किसी शाखा का वचन ) | यहाँ पवित्र भिन्न लिज् ही नहीं, मिन्‍न वचन मी है। 'प्राणापाणों पवित्रे! (तै० सं० ३, ३, ४. )। प्रतिहारी ( प्रतीहारो ) स्री० शब्द द्वायाल पुरुष के लिए भी प्रयुक्त होता है ओर स्त्री द्वारपालिका के लिए भी। द्वारि द्वागस्थे प्रतीहारः प्रतीहायप्यनन्तरे! ( अमर )। इस वचन पर टीकाकार महेश्वर का कथन है--अ्रय॑ पु व्य क्तावपि स्त्रियाम | इसी प्रकार बन्दी' अथवा “बनिदः स्त्री० स्त्री अथवा पुरुष के लिये समान शब्द है। ये कैदी हैं- इमा बन्दयः, इमा बन्द्यः | जन पु » का प्रयोग रुत्री भी अपने लिए कर सकती है पुरुष भी। अयं जनः ( >इयं व्यक्ति: )। परिजन और परिवार--दोनों पुज्निक्ष हैं पर नौकर नौकरानियों के लिये एक समान प्रयुक्त होते हैं। 'शिवा! ( स्त्री० ) गीदड़ और गीदड़ी के लिए. एक समान प्रयुक्त होता है। अय॑ श्गालेडपि स्त्रीलिज्ञः-क्ीरस्वामी | होता! ऋत्विक्‌ू का पर्याय है, पर नित्य ख्रीलिड् में ही प्रयुक्त होता है। स्व! आत्मा अथ में एंलिज्ञ में ही प्रयुक्त होता है-जा स्वस्थ माय निःद्ति |

कुछ एक प्राचीन भाषाओं के समान संस्कृत में तीन वचन हैं हिन्दी के बहुबचन के लिये ( जहाँ दो व्यक्तियों या वच्तुओं का निदेश करना हो ) हम संस्कृत में बहुबचन का प्रयोग कर द्विबचन का ही प्रयोग करते हैं। जेसे- मेरा माई और में आज घर जार हिन्दी के इस वावय में जाना? क्रिया के कर्ता दो व्यक्ति हैं तो भी क्रियापद बहुबचन में प्रयुक्त हुश्ना है। पर संस्कृत में द्विवचन ही होगा-- मम श्रात[हं चाद्य गहं प्रति प्रयास्यावः ।! इसी प्रकार में थका इुआ हूँ, मेरे पाआ्नों आगे नहीं बढ़ते', उसकी आँखें दुखती हैं! इन वाक्‍्यों के सेस्कृतानुबाद में पाओं और आँखों के दो होने से द्विवचन ही प्रयक्त होगा--श्रान्तस्य मे चरणौ प्रसरतः | तस्य ब्विणी दुःख्यतः ।” इतना ही नहीं, किन्तु चन्नुस्‌ , श्रोत्र, वाहु, कर, चरण, स्तन आदि अनेक जन सम्बन्धी होने पर भी प्राय+ द्विवचन में ही प्रथ॒ुक्त होते हैं। इस विषय में वामन का वचन है--स्तनादीनां द्विलविशिष्टा जातिः प्रायेश | जैसे--इह स्थितानां नः श्रोत्रयोन मूछेति तूयनादः |! चारे। पश्यन्ति राजानश्रत्तुभ्यामितरे जना:। एक व्यक्ति

( )

चाहे वह राजा हो चाहे रह्ढे, अपने लिये 'अस्मद के बहबचन का प्रयोग कर सकता है, ओर दो का भी अपने लिये बहुवचन का प्रयोग शाख्र-संमत है जसे--/वयमिह परितुष्टा वल्‍्कलेस्त्व॑ दुकूले: ।! (मतृहरि)। यह एक कवि का राजा के प्रति वचन है। संस्कृत में कुछ एक शब्दों के एकवचनान्त प्रयोगको अच्छा समझा जाता है, चाहे श्रथ-बहुत्व विवक्षित हो। जेसे-“अज्ञा आत्मान कृतिन मन्यन्ते! ( मूर्ख अपने आपको विद्वान्‌ समभते हैं )। यहाँ 'अज्ञा आत्मनः कृतिनो मन्यन्ते! लौकिक व्यवहार के प्रतिकूल है। “मन्यन्ते सन्त- मात्मानमसन्तमपि विश्वुतम!--महामारत प्रजागर पं (३४।४५॥)। इसी प्रकार हम कहते हैं--'एवं वदन्‍्तस्ते स्वस्थ जाड्यमुदाहरन्ति” कि एवं बदन्तस्ते स्वेधा जाडयम्‌ , .............?

कुछ एक शब्द ऐसे भी हैं, जिनका वचन व्यवहारानुसार निश्चित है। जसे--दार पु ( पत्नी ), अ्क्षत पु ( पूजा के काम में आनेवाले बिना हूटे चावल ), लाज पु० (खील, लावा) इत्यादि शब्द सदा बहुबचन में ही प्रयुक्त होते हैं | इनके अतिरिक्त कुछ खीलिंग शब्दों अ्रप्‌ (जल), सुमनस्‌ # ( फूल ), वर्षा ( बरसात ) का सदा बहुव्चन में ही प्रयोग होता है। अप्सरस्‌ स्री० ( अप्सरा ), सिकता ख्रो० ( रेत ) और समा सत्री० ( वष ) प्रायः बहु वचन में ही प्रयुक्त होते हैं, और कमी एकवचन मे भी व्यवह्नत होते हैं “जलोका' ( जोंक ) एक वचन और द्विवचन में भी प्रयुक्त होता है, पर

“जलौकस' ( जोंक ) बहुवचन में ही ()। गृह केवल पु में, [] पासु पु

>< यहाँ स्व! आत्मा! श्रथ में है। अतः घष्ठयेक दचन में प्रयोग उपपन्न है। आत्मीय अथ में समानाधिकरणुतया प्रयुक्त होने पर यथापेन्ष द्विवचन ओर बहुवचन में भी व्यवहार निर्दोव होगा--सा निनदन्ती स्वानि भाग्यानि बाला? ( शाकुन्तलम )।

# सुमनस्‌ (स्त्री०) मालती अ्रथ में एक वचन में भी प्रयुक्त होता है ( सुमना मालतो जातिः--श्रमर )। पुष्प अथथ में भी इसका कहीं एक बचन और दविवचन में प्रयोग मिलता है--विश्या श्मशानसुमना इत्र वजनीया? (मृच्छुकटिक) | “अप्रासातां सुमनसो! ( काशिका ) | अ्रमर तो पुष्प अथ में इसे नित्य बहुवचनान्त ही मानता है--आपः सुमनसो वर्षा;, स्त्रियः सुमनसः पुष्पम्‌। () स्त्रियां भूम्ति जलौकस;--अमर०

[ ] 'पांसव: करुमात्‌। पंसनीया भवन्ति! यास्‍्क्र की यह निरुक्ति इसमें

( छः )

धांना (स्री०) (मुने जो), वासोदशा ( वल्लाशल॒ल ), आवि-+( प्रसव वेदना ), सक्तु , अछु (प्राण), प्रजा, प्रकृति ( मन्त्रिमए्डल या प्रजावर्ग ), कश्मीर, तथा देशों के ऐसे नाम जो ज्षृत्रियों का निवास स्थान होने से बने हैं बहुबचन में प्रयुक्त होते हैं। हिन्दी का 'तुम' एकवचन ओर बहुवचन दोनों वचनों का काम देता है। यदि विवज्षित वचन क्रिया से सुचित हो, अथवा प्रकरण से वचन का निणय हो सक्के तो छात्रो को अनुवाद करते समय एक वचन का ही प्रयोग करना चाहिए। एवं “यह तुम्हारा कर्तव्य द्वै? इसका संस्कृत अनुवाद-- इदं ते कतृव्यम! होगा | इसी प्रकार--अध्यापक ने कहा तुम्हें शोर नहीं करना चाहिए? इसकी संस्कृत--“न ल्वया शब्दः कार्य इति गुरुः स्माह! इस प्रकार होनी चाहिये। (एकवचन ल्वौत्सर्गिकं बहुबचनं चार्थबहुत्त्वापेन्षम )।

कारक--प४ंस्कृत में छः कारक हैं | संज्ञा शब्द और क्रियापद के नाना- सम्बन्धों को ही कारक कहते हैं। इस सम्बन्ध को सूचित करने के लिये छुः विभक्तियाँ है इन छुः विभक्तियों के अतिरिक्त एक और विभक्ति है जिसे षष्ठी कहते हैँ | इससे प्रायः एक संशा शब्द का दूसरे संज्ञा शब्द से सम्बन्ध सूचित किया जाता है इन विभक्तियों से सदा कारकों का ही निर्देश नहीं होता, परन्तु ये विभक्तियाँ वाक्य में प्रति, सह, बिना, अन्तरा, अन्तरेण, ऋते आदि निपातों के योग से भी “नाम से परे प्रयुक्त होती हैं। इनके अतिरिक्त ये विभक्तियाँ नमः, स्वस्ति, स्वाह्, स्वथा, अलम्‌ आदि अव्ययों के योग से भी व्यवह्नत होती हैं। ऐसी अवस्था में इन्हें 'उपपद विभक्तियों? कहते हैं कारकों के विध्य में विस्तार पूवक वणन करने का यह उचित स्थान नहीं यहाँ हम संस्कृत वाग्यवह्ार की विशेषताओं का दिग्दर्शनमात्र ही कराते हुए हिन्दी वा संस्कृत भाषाश्रों के प्रचलित व्यवहारों में भेद दर्शाना चाहते हैं। किसी कारक विशेष के समझने के लिये अथवा विभक्तियों के शुद्ध प्रयोग के लिये छात्रों को हिन्दी या दूसरी बोल-चाल की भाषाश्रों की वाक्य रचना की सकी (पी पलककम पीली का. किस की लिल कह

शापक है। यहाँ निरुक्तकार वेद मे आये “ासुरे' पद की व्याख्या करते हुए प्रसंग से मूलभूत पांसु शब्द की व्युत्पत्ति करते हैं

+ इसमे ततोननन्‍तरमावीनां प्रादुभाव: यह चरक (शारीर० 4|३६) का बचन प्रमाण है |

» इसमें अमर का करम्मो दघिसक्तव:' यह बचन प्रमाण है। तथा छीर का धानाचूण सक्तवः स्यु/ यह भी |

जन

अजय अआं+गाक : आाएा क् 8 दिशः पपाठ पस्नेण वेगनिष्कस्पकेतुना ( रघु० १४।८४॥। )

( )

ओर नहीं देखना चाहिए। वास्तव में “कारक! वही नहीं जिसे हम क्रिया के व्यापार को देखकर समभते हैं, परन्तु कहाँ कौन सा कारक है इसका ज्ञान शिष्ठों अथवा प्रसिद्ध ग्रन्थकारों के व्यवहार से द्वी होता है ( विवज्चातः कारकारि भवन्ति | लौकिकी चेह विवद्धा प्रायोक्ती ), इसलिए, छात्रों का संस्कृत व्याकरण का ज्ञान, अथवा उनका अपनी बोल चाल की भाषा का व्यवहार उन्हें शुद्ध संस्कृत व्यवहार के ज्ञान के लिए, इतना उपयोगी नहीं जितना कि संस्कृत साहित्य का बुद्धिपूषक परिशीलन

संस्कृत में सब प्रकार के यान वा सवारियाँ जिनमें शरीर आदि के अंग, जिन्हें यान ( सवारी ) समझा जाता है--भी सम्मिलित हैं 'करण' माने जाते हैं। यद्यवि वे वस्तुगत्या निर्विवाद रूप से अधिकरण? हैं ग्रन्थकारों की ऐसी ही विवज्ञा है, जहों हिन्दी में हम कहते हैं--वह रथ में आता है! वहाँ संस्क्षत मैं--'स रथेनायाति' ऐसा ही कहने की शली है | जहाँ हिन्दी मैं हम कहते कहते है -जह कन्बे पर भार उठाता है। संस्कृत में हमें “उ स्कन्वेन भार वहति? यही कहना चाहिए रथादि की करणता ( कि अधिकरणता ) ही भगवान्‌ सूत्र-कार को अमिमत है, इसमें अध्टाध्यायी-गत अनेक सूत्र ही प्रमाण हैं-- धर्म करणम्‌। (३११०२), दाम्नीशसयुयुजस्तुतुद्सिसिचमिहपत- दशनहः करणे ( ३४२।१८२ ), चरति (४४८) वहन्त्यनेनेति बह्म शकटम्‌, पतत्युडडयंतेप्नेनेति पतत्र पक्षः | पतति गच्छुत्यनेनेति पर्ल वाहनम्‌ | शकटेन चरतीति शाकटिकः | हस्तिना चरतीति ह्ास्तिकः।” इस विषय में कुमार- सम्मब तथा किरात मैं से नीचे दी हुई पंक्तियों पर ध्यान देना चाहिए--बश्ा- प्सरोविश्रममस्डनानां सम्पादयित्री शिखरेविंभर्ति,....----( धात॒मतताम्‌ ),

मध्येन सा वेदिविलग्नमध्या वलित्रय॑ चार ब॒भार बाला |

गुणानुरागेण शिरोमिस्ह्यते नराधिपमल्यमिवास्थ शासनम्‌ ( किरात ),

गामधास्यत्कथं नागो मुणालमृदुभिः फरः ( कुमार ),

तथेति शेष्रामिव भर्त्राशामादाय मूर्थ्ना मदनः प्रतस्थे ( कुमार )। इन उदाहरणों से संस्कृत के व्यवहार की एकरूपता निश्चित होती दे

कहीं वस्तुसिद्ध करणत्व की उपेक्षा की जाती है, और साथ ही कारकत्व की भी | केवल सम्बन्ध मात्र की ही वेवज्षा होती दे अनुकामं तपयेथामिन्द्रावरुण राय आ? ( ऋ० १।१७॥२॥ )

| इस विषय पर हमारी कृति प्रस्तावतरज्धिणी में निबन्ध पढिये।

सील कननकल>नकनञरा 3 तक नन्‍र्य 77 प्पन्‍नतन्ह

( १० )

अहरहनयमानो गामश्व॑ पुरुष पशुम्‌

वेवस्वतो तृप्यति सुराया इब दुमंदी ( महाभाष्य )।

अमृतस्येव नावृप्यन्‌ प्रेत्ममाणा जनादनम्‌ ( उद्योगपब ९४।५१॥ )।

नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदथि:

अपां हि तृप्ताय वारिधारा स्वादु: सुगन्धि; स्वदते तुधारा (नंघथ ३।६३)

घष्ठी का ही व्यवहार शिष्ट सम्मत है। इसमें 'पूरणगुणसुहिताथंसदव्यय तव्यसमानाधिकरणेन-- यह सत्र ज्ञापफक है। सुहिताथ ( न्तृप्ताथक ) सुबन्त के साथ षख्बन्त का समास नहीं होता ऐसा कहा है। सुरा, अमृत काष्ठट, अप ( जल ) आदि के करण- तुतीयान्त होते हुए शषिकोी षष्ठी का कोई अवकाश ही नहीं था तो निबेध व्यर्थ था। इससे ज्ञापित होता है कि सत्रकार को यहाँ पष्ठी इष्ट है। ऐसा ही पू्ण” शब्द के प्रयोग में देखा जाता है--ओदनस्थ पूर्णाश्छात्रा बिकुबंते (काशिका) दासी घृटमपां पुणे पयस्थेत्‌ प्रेतवत्यदा ( मनु० ११॥१८३॥ ) नर. _ शराव . सल्िलस्थ .. पुणप, ( अर्थशात्र ) ( )। तसस्‍्येय॑ प्रथ्वी सवा वित्तत्य पुणा स्थात्‌ (तै० उ० २।८। |) अपामझली परयित्रा_ (श्राश्वलायन गह्म १(२०॥)। स्निग्धद्रवपेशलाना- मन्‍नविशेषाणा भिन्नाभाजन परिपूर्ण इृत्वा' ( तन्त्राख्यायिका, मित्रसम्प्राष्ति कथा )। के

प्र।छ (मारना या चोट लगाना ) के “कर्म को कम नहीं समझता जाता, इसके विपरीत इसे अधिकरण माना जाता है | जेसे--“ऋषिप्रभावान्मयि नान्तकोडपि प्रभुः प्रहतु किमुतान्यहिंखा” ( रघुबंश ) 5 ऋषियों की दवी शक्ति के कारण यमराज भी मुझ पर प्रह्र नहीं कर सकता, श्रन्य हिंसक शुओओं का तो कहना ही क्‍्या। “आार्तत्राणाय वः शर्त्र प्रहतु मनागसि' ( शाकुन्तलनाठकम्‌ ) > तुम्हारा हथियार पीड़ितों को रक्षा के लिए. है न, कि नियराधियों के मारने के लिये | परन्तु ऐसे स्बंदा नहीं होता जब कभी किसी अंग विशेष जिसे चोट पहँँचाई जाय--का उल्लेख हो, तब वह व्यक्ति जिसका वह अंग हो “कर्म”! समझा जाता है और अंग अधिकरण जसे-- उसने मेरी छाती पर डंडे से प्रहार किया>-स मा लगुडेन वच्तुसि प्राहरतू। जब प्र+ह का प्रयोग फेंकने श्रथ में होता है, तब जिसपर श्त्र फेंका जाता है, उसमें चतुर्थी आती है जेसे--इन्द्रो इत्राय बच्र प्राहरतु! (>प्राहिणोत्‌ )

हिन्दी में हम “गुणों में अपने समान कन्या से तू विवाह कर! ऐसा कहते

की,

हैं। पंसन्‍्तु संसक्षत में 'गुणेरात्मसद्शी कम्यामुद्दहे/ ऐसे यहाँ गुण को हेतु» मानकर उसमें ततीया हुई है। हिन्दी का अनुरोध करके गुण! को अधिकरण मानकर 'शुशेष्वात्मसह्शी कन्यामुद्ृदे:ः ऐसा नहीं कह सकते परन्तु जब हम इव' का प्रयोग करते हैं, तब हम संस्कत में भी गुण” को अधिकरण मानकर उसमें सप्तमी का प्रयोग करते हैं। जेसे--समुद्र इबं गाम्मीयें स्थेये हिम- वानिव ( रामायण ) | यहाँ हमारा वाग्व्यवह्र हिन्दी के साथ एक हो जाता है। हिन्दी में कोई व्यक्ति किसी ओर व्यक्ति से किसी विषय में विशेषता रखता है, ऐसा कहने का ढंग है। परन्तु संस्कृत में 'किसी कारण से' विशेषता रखता है ऐसा कहते हैं। जेसे--स वीणावादनेन मामतिशेते_ ( वह वीणा के बजाने में मुझ से बढ़ गया है )। इसी प्रकार--सा श्रियमपि रूपेणातिक्रामति ( वह उुन्दरता में लक्ष्मी से भी बढ़-चढ़कर है )। ओजस्वितया परिहीयते शब्या: ( तेज में बह इन्द्राणी से कम नहीं )।

जहाँ हिन्दी में यह कहा जाता है कि महाराज दशरथ के कौसल्या से राम पेदा हुश्रा, वहाँ संस्क्ृत में इस भाव को प्रगट करने के लिए अपना ही ढंग है | जेसेः:--श्रीदशरथात्कौसल्यायां रामो जातः ( कौसल्या में तालव्य शश? का प्रयोग अशुद्ध है )।

अहष्टदुःखो धर्मात्मा सबभतप्रियंवदः

मयि जातो दशरथात्कथमुब्छेन बतयेत्‌। ( रामायण )

स्मरण रहे कि पत्नी को सन्‍्तानोत्त्ति की क्रिया में सदा ही अ्रषिकरण माना जाता दे इसी बात को कहने का एक और भी ढंग है, यथा-- “दशरथेन कौसल्याया रामी जनित:।? यहाँ जन्‌ का णिच्सहित प्रयोग है। अब धाठु सकमक हो गई है | इस प्रयोग मे भी पत्नी ( कौसल्या ) अधि- करण कारक ही है। (और “दशरथ' अनुक्त कता है। उसमें ततीया हुई है ) जहों जनन क्रिया ( उसन्न होता है, हुआ,होगा ) शब्द से भी कही गई हो, पर गम्यमान हो-वहाँ भी पत्नीकी अधिकरणता बनी रहती है।

से--सुदक्षिणाया तनय॑ यवाचे ( रघुबंश ) यहाँ सुदक्षिणायां जनिष्यमाणम'

ऐसा अर्थ है।

हिन्दी में जहाँ के लिये' शब्दों का प्रयोग करते हैं. वहाँ सब जगह संस्कृत में चतुर्थी का प्रयोग नहीं हो सकता “अ्रप्युपहासस्थ समयोज्यम! ( क्‍या यह समय उपहास करने के लिये है ! ) पुनः “प्रारेभ्योअपि प्रिया सीता

( १२ )

रामस्थासीन्महात्मनः” (सीता महात्मा राम के किये प्राणों से भी अधिक प्रिय थी। ) नेष भारो मम यह मेरे लिये बोकल ( भारी ) नहीं। तथा-- कि दूरं व्यवसायिनाम -व्यवसायियों ( उद्योगी पुरुषों ) के लिये दूर क्‍या कुछ है। पुनः नूतन एप पुरुषावतारों यस्य मगवान्‌ भुगुनन्दनो5पि वीर ब्| यह कोई नया ही पुरुष का अवतार है जिप्तके लिये भगवान्‌ परशुराम भी वीर नहीं हैं। इन सब उदाहरणों में यद्यपि हिन्दी में 'के लिये! का प्रयोग किया गया है, फिर मो 'तादथ्य! ( एक वस्तु दूसरी वस्तु के लिये है ) सम्बन्ध के होने से धस्कृत में हिन्दी 'के लिये! के स्थान में चतुर्थी का प्रयोग नहीं हो सकता

से! के स्थान में पत्चमी का प्रयोग तब तक नहीं कर सकते, जब तक अपादान! ( एथक करण ) का भाव हो उदाहरणार्थ--मैं तुझे कितने समय से दूढ़ रहा हूँ। का वेला त्वामन्वेपयामि ।! यहाँ वेला अवधि नहीं है, अन्वेषण-क्रिया से व्याप्त काल है, अश्रतः अत्यन्त संयोग में द्वितीया हुई है | मुनियों के वस्र वृत्तों की शाखाओं से लठक रहे हैं इतच्तशाखास्ववलम्बनते यतीना वासांसि।! यहाँ स्पष्ट ही वृत्गन-शाखा अपादान कारक नहीं, किन्तु वस्यों का अवलम्बन क्रिया द्वारा आधार होने से अधिकरण कारक ही है | श्रतः सप्तमी ही उचित है मुझसे रामायण की कथा को समझो (जेसे ) में (इसे ) कहता 'निबोध में कथयतः कथा रामायणीम यहाँ भी नियमपूवक अध्ययन के होने से, आाख्याता ( कहने वाला ) अपादान नहीं है, इसलिए, पञ्चमी का प्रयोग नहीं किया गया। इसी प्रकार 'इदानीमहमागन्तुकानां श्रुत्वा पुरुष- विशेषकातूद्लनागदो<5त्मीमारज्जमिनीम! ( चारुदत्त अड्ढू ) में आगनन्‍्तुका- नाम! में पष्ठी हुई राजा देवत्वमापन्ना भरतस्य यथाश्रुतम! (रा० )। और 'इंत शुभ्रुम घीराणाम! ( यजुः ) में भो।

कभी चाहे अपांदान! का भाव स्पष्ट भी क्‍यों हो, फिर भी हम उसकी उपेक्षा कर दूसरे कारक (कर्त्ता, कम, ) की कल्पना करते हैं जंसे--स प्राणान्‌ मुमोच +-( उसने प्राण छोड़ दिये) अथवा--“तं प्राण: