पहचानी हुई शवले

श्रीराम शर्मा ८रामः

सेददै किः समय पर यह्‌ उपन्यास प्रकाशित नही कर प्राया, सके लिये लेखक एवं पाठका से क्षमा प्रार्थो हू घायही श्री जगदीश भारद्वाज कार्म ्रामारी जिनके सहयोग से यहे पर्तक भरापके

हायोमेदहै। --रजेश्र गोपत

उन पह्चानी इक्लों को जो" ˆ"

पदा कै उद ्रपरिचितक्त्रमे क्रि जहां श्मपना कोद मही, मधुकर एकाएक विस्मित वन गया क्रि कमरेके द्वार पर प्रति ही, एक युवा मुन्दरी ने उष टकोर दिया, श्रापक्विहै?" उस प्रपरत्याधित प्रन को सुन, मधुकर चकराया, क्षएभरकोसो गया उसने सहज माव से कह दिया, "जी !* वह सुन्दरी दवार पर टिक गवी श्रौर बोली, दस धर्मदाला के जमा- दारने प्रासे उक्तकमरे का किराया लिया, तो फिर मेरे पास टवा उसकी रसीद-वुक् पर भ्रापका नाम देखा मैने मधुकर कवि को कविताग्‌ पदीर्है, मली लगौ है। यह कहते हवये उसने प्रपनी उम सुन्दर दृष्टि को बाहर पड़ती वर्षा की दरदो परते दिया। मधुकर उप्र समय श्रनमना या, सर्दीषट र्ट्‌ थो, तौ इनी लिपि चदे कम्बल श्रो हए वा) उस श्रवस्या मे वद्‌ उस मुन्दरीकी शरोर देखत रह गया तमी उस सुन्दरी ने कटा, “प्रापतोक्लद्राये इम घर्मगालामे, भूमे तीन मास बीत गये श्रव वर्पाश्रारम्भदहौ गयी तौ नीचे जानाः ` पड़ेगा श्रव इस पड्ाड का मौसम गृलकर नदीं रदेमा ।' उसने मधुकर का श्रोर देखकर प्रन द्या, “प्राप इतनी देरमें श्राय, ्रप्त-मईमे श्रना चाहिए था।' "गमधुकर बोला ~ “इस्ते पूर्वं कभी पहा परनहींद्ाया! "दसं वारमी श्रा मया, देखा सयोय मिल गया!

वट्‌ युवती बोली, 'पदाडका आवास खर्चीलिी है 1 देखिए कने हु वर्मलाला ह, पर यहा शी किराया लिया जाता है + उसने फिर हतो ठीक ह, छे्लो की मेहा के समक्ष यट नगण्य है \ मधुकर वोला, ष्टुटय वाले कपड़ उवास्ते ६1 मुसाफिर कोः ते ६1 ~ वह्‌ सीः श्रपने स्वेत केनिल दति को निकाल कर सहज अपनी उन मकृर्‌ श्रीदो से युरकरा भो दी1 उसी ग्रवस्था मे ली, प्ते श्राप क्से - मथुकर ने कटा, "कानपुर से \ "श्रच्छा तो श्राप कानपुरके {वासी है 1 वह तो दहन्दी का ` गदु \ उस शरोर दी हल्दी के कवि ग्रौर लेखक तदा हते दै )' वह वोलीर्ैने एक दार दोटी श्रवस्या चं कानपुर देखा था कायद किसी सम्बन्धीः दे विवाह मे श्रपने घर मुलतान से पर्हुची थी, याद पडता है करि ततः भी मुके दादर उच्छा लगा था \' सचमुच, उस समय मघुकरको ठण्ड लग रही थी वह कम्बल कै श्रन्दर अ्रपने दोनों घोरे जोडेवेडा इत्र था 1 उसे इस भरकः देख, वह्‌ युवती दसी, ्रापक्ते; ठण्ड लग रदी दै वह्‌ बोला ही सर्दीतोदहि"' मधुकरने किर कटाःकम्बस्नः वारिव पडनी त्रारम्भ हुई, तो जा रही रहै यहं शकती तो मे वाजार जाता एक प्याला चाय--' म्रोह, मतो मूल दी मयी )' उसने मधुकर कौ श्रखोंने त्रप प्रसि उलकर कटाः नते स्टोव जलाया गरौर पानी रख दिया

भुलक्कड क्कि दवरश्रायी शरीर भूल गयी 1 श्र वैल्यि, मै : लासीद्रं \ मुकर ने भ्रातुर वन कर कटा, "नदी -नदी, श्राप बयो... '

निन्तु उस युवती मु्करा दिया, जाते-जाति भी हंस दि मधुकर के कमरे से लगा दूसरा कमस उसीका था वर्ह से

पहचानी हई सकें ११

कैः जलने का स्वर उसके कानोमेमीप्रारहाया तेशिनि एसी स्मय मथुक्रके शरीर में चेतना श्रायी, गर्भौ भी श्रनुमव हई -ग्रीर उस्ने श्रपना एक हाथ कम्बलसे निकाल कर तिर दुजवति हए श्रषनै- श्राप कहा--भ्रजीव नारी है। यह्‌ पजाविन है, चुनी है) वह्‌ बोला, यद युवतौ धद्विव श्रौर सुन्दरम है, चतुर ओर व्यावहारिकः यद्यपि द्वस प्रकार से धूं मौ उसका विव्रिध प्रान्तों की नार्यो परिखय दो चुका था, परन्तु जिस प्रकार उस श्रपरिचितं नारी ने श्राति ही, वातो का सिलसिला चेड, उसका परिचय तिया, मानौ वह्‌ रामी मधुकर भरोस दन्त श्रौर शमीति युवक के लिये श्रशोवृनीय 1 तो विस्मय का मिपय जरूर या ) अतएव बह भने भ्रापवयों

कु सुक मपा, ठर मी गया कदाचित उसका कारण यहं था कि उसने श्रवारों मे, लोगौ फो दन्तकयाग्रों मे सा श्रनेक वार्‌ पढ़ा प्रौर मुना था जि वहत सी श्रौरतें स्वय प्रादमी को मूं वनाने का प्रयली करती है ..श्रपने खूप का जातत फलतत है भौर उत श्रादमी कोन दीन का रती ह; दोर्जृषु का...

उसौ समय वह युवती एक दाव मे चाय का प्याला श्रीर द्ूषरे मे एक लू प्रौर नभकीन विष्कुट तेकर वर्हा भ्रा पर्ची वद्‌ हेमती हई बोली, “लीजिये भ्रापके भाग्यसे यही चाय मिल गी गहु तङ्हूमी घरकावनाहै, बाजार कानदीं)'

मधुक ने कहा--भरापने यह कष्ट बयो क्रिया वर्षा सकती, तो चला जाणा श्रािर वाजारतोमृकेजानाही या 1 त, न, प्राप रहने दीजिये"

युवती ने भेज पर सामान रख दिया बहा सै लोदते हये उतने कदा--्मभी श्रमी श्रातीहु भपनी चायति श्राती हू श्राप शुरू कौरिये यह दुनिवादारी की वाति छोड ।*

वह्‌ चली मयी, ठो मधुकर उस चाय की उठती माप का देणने लगा सचमुच उस सदी मे, जैमेः उस चाय के प्यति मही प्रण

तिमी श्रायि श्रीर < छन्द सभी दी त्विन्ता रहती \. यहा `

तक्यि के नीचे से सिः श्रौर सिगरेट जला कर पीने लगा) जव :

फेंका तो उसी के गुबार भसे “क्रिन ब्दो श्रापक्ता धः

कार लेकर करट 1, श्रौर तभी वह पिल!

9

पह्वानी हई शकले शदे

हई हंषती योनी, "वही सस्ती रीत है यह ! धन्यवाद दो भ्रौर पाक-साफहो जाध्रो। दस बति को सुनकर गघुकर मौ हेस दिया नात उसके मे मे धुभी

पर शारदाकरे समान वहु भी प्रस्तुत विषय को हत्के मावे टात गया।

उसी समय दारदा ने कहा, एक मासिक ~य मेँ भ्रापकी कहानी पदी यौ। वहुमुभे स्विकरलमीथी। एेसालगाङ्गि जसे किमीकी तस्वीर उतारी गयी हो भ्रापकृविता तो लिते हीर, पर कहानी भी लिते]

मधुकर ने कटा, “कदं नही सक्ता कि तुम किस कटानी की मात कट्ती हो लिसना तो मेरा नरा है, षन्धामोहै॥

शारदा ने भम्तिमि वात को पकडलिया प्रौर कहा, "्रापका यह धन्धा भी है ? सचमुच यड़ी ध्रजीववातहियहं कि धापर लोगौं कौ भावना का प्रदर्शन करके पसा कमि है ।' वहु बोली, "कठानी ची, एक शरणार्थी लडकी की विः वह्‌ कते गुण्ठोके यगुलमे गयी भरौ किसं प्रकार दुट करं भ्रायी, किन्तु यते बाहर भाकर भी क्षरण नही मिलती पतिने ध्रपनाया माँ-वापने। वहु दर-दरही भटकती किरती रही।

मधुकरने कहा, "हा एक एेसी कहानी लिली थी ।' बोला, “उत कहानी मे एक देसौ समस्या का चित्रणयाकिजो हमारे समाज के समक्ष मूर्त-ष्पसेभ्रागयीथौ समाज कौ मानत्तिक दरिद्रता का भ्रभिशाप बेचारी नारी को भुगतना पदाथा

शारदा ने सां भरी--ाँ दाब्रू] नारी को श्राज क्या, सदाेष्स इन्ताती समाज के समक्ष मुक्षना पदा है, उसकी वर्वर का सकार नना जेते दसनारी का नंसमिक कमंदहो याह {'

मधुकर नै वात मुनी तो उस युवा भौर सुन्दर शारदा की प्रोर देखा उस समय शारदा का मुहु भ्रपनी वातत कटने के खाथही दूरी श्रोरम्रुड गया था) तव भ्राषमान से षड़ठी हई बारिश चस्क-गयीथी \ ,

१४ पट्यानी हुः शवले

पिस ट्‌ फो टातत पररय दृशा पहा कौवाश्रपनी जारी प्रावाज से कविका कररहाथा दर्पा स्कीतौ चारो श्रोर निरतव्वता धी पेट पैः जिं शिषे पर वह्‌ स्थान था, तो वहां सै बाजार. भी ६९ था। उस पटाद पर कोवस्ती है, मकान, पैसा श्रामासि मी वदा नहीं मिलता धा श्रव - उस अन्त वातावरण मे, एकान्त कमरे मे जव वद्विढाये मवुकर फो चाय मिल गयी, शाने कौ लद्द मिल गया, तो.निगर्टका धुरर उद्धते हष उसे यहु देखकर शी श्रच्छा लगा विः उसके पास एकतप्णीप्रार्यटी वहु सषदती .र्वादनी' के शमान, वहू चमक रही ६1 विन्तु जव उस शारदा ने कहानी की पृष्ट भूमि पर श्रपनी श्रभिव्यक्तिप्रगटकीतो उक्त भावुक श्रीर कत्पना- घ्नोफ के सटी मधुकरफो तमाकिबषूरदसश्चारदाके मन्म भी कोर्ट यात ६... वहींरकाटा समाद, दसके मानसम मी पीडको श्राभास हौताद।

प्रीर उस प्रवस्थामें क्रि जयश्राप फी द्धौरटी सी वात कुनै के वाद शारदा श्र्रत्याछित ल्पे गम्भीरो गयी, फिर वर्ह सेठ कर चते पटी ।तोउमे चाय का प्याला उटाते देख एकाएक मधुकर्‌ ने श्रपने मन मे उट ग्रा वात ली--श्ारदा देवी सयोगकफी वात हैकि दस श्रपरिचित्त, स्थान पर तुम मिली तो सदाश्यता के साथ यहु चाथ"

विन्त इतना मुनक्रर तो वहं शारदा फुट पड़ी ष्टु मधुकर जौ, दस सदाणयता कादरूसरया नाम ही पापह।'

` श्रोह्‌, इतनी वदी वात्र कहु दी तुमने | ' मधुकरने उपे रोका श्रौर

दा-'तनिक वदरिये तो! श्रभी चली मते जाये, तुमने वात कही, तौ संकट मे पट्‌ गया। चायकी गर्मी ग्रीर लड फी मिठास पाकर जिस प्रकार श्रागारी चना, तो श्रव लगता दहै कि उसे कुद कड्वाहट भी श्रा गयी, जसे तती ... -वताद्मे षया श्राया तुम्हारे मने, को जीवन का गहय विचर्‌ उट श्राया ।' वह बोला, "देखिये, भै सराटित्यकः सवनाय कर तेता हू प्र जौवन का संपपं, उत्थान श्रौर परतन भी पग-पभ

गृदुचानी. हई शकलं १५

परश्रनुमव कर सकाहं तमी कृच लिक्ठ पाता ह] में षनिकनदीह, परावलम्बी हं 1 इसतिए जब एसी वात प्रत्ता हँ तो सचमुच ष्टी सिहर्य्व्ता हं उस कहानीकोरम ते ्रपनी देख पाता मधुकर की वात्र सुनते हये ही शारदा ने एक-एक कर सभी प्यते उठा लिये तभी उसने सहजं माव से मुस्कराया,^म(प तेवक है, भावनावादी ।' उकषने कहा--"परन्तु इस जीवनके श्रन्तराल मे क्रिसने कया दुपा रसा है, यह्‌ क्प सहन मे सममा जा सक्ताहै। उपेतो भगवान भो कठिताईसे देख पाता है ।' कते हये शारदा मुड गयी बेह्‌ श्रपने कमरे की तरफ वद्‌ गई उसी समय मधुकरने हाय की जली हुई सिगरेट फंक़ दी.वह्‌ उठकर तैयार होना वाहृता था उसके भ्रनिकाजो उदेश्य या, उको पुरा करैकेलिधेमौषमभी साफहोगयाया। उक्ते चाहम कि स्नान फरे श्रौर कपडे वदले, फिर शाम तक के लिवे बाहर जये, वहाँ कै जितने दशनीय स्थान है, उन्हे देपे ्रहृति का विराट स्प हेघता- खलता भ्रा श्रपनी शरस के सामने देख पाये किन्तु श्रषने उत लम्बे भ्रोग्राम को कार्यान्वितं करने की वात भूल मधुकर चारपाई पर सीधा षड गया उसे कम्बल भी ग्रच्छी तरह भ्रोढ लियाश्नौरत्तवमन मेश्राई हई बात फो ज्ञेकर वोला- जरूर इष शारदाकेमनपमे मो चुद्द्युषा है..-कीद रटम्य मराद ! कन्तु बहुरस्य क्यादै। यह जानने की उदगुस्ताको ते, मधुकर इतना उस विचारमेखोमयाकरि सचमुच उते इस वात का ध्यान महीं रहा कि उतत दिन उपे कईं वाति पूरी क्ररनी ह! उस पहाडका अविहा मागदेषवलेनाहै प्रकृति कै दर्घनि करने हु ऊंचाई से गिरते हृए करने देछते है। फलस्वरूप, इसके विपरीत उक्ते मन मे वार-वार पहु वात भ्रतीङ्ि ्मभी ारदाकैकमरेमे जयि श्रौर उप्ते जानने का प्रयत्न करे किं भाविर उसके मानस वा वह कंसा दाहाकारदैकिजो ते श्रान्योतित करता इई वहं भ्रव नभर से श्रई उसका पति

कीं उन्दी मेसेएक यट डेरा ्ैस्ती हो श्रौर यह रानि वाते को.--\

गया \ वाहर खडी सारदा कट्‌ रदी धी सुटावना मौसम जाया टै, उघ्यि घूम श्राद्ये, बाहर मे \' धुकर ते वात सुनी च्नीर एक इ्रशावादे के खमान उठ पड़ \ वः मरै लग गया \

मधुकर संलानी तो था ही, फकरेमस्तभी या। वह गोरे र्ग का छरहरा जवान किसीके लिये भी प्राक्षण का विपय था कदाचित यही कारणथा क्रि जद किसी कवि-षम्मेलन मे कविता- काठ करते हृएु श्रषने मधुर स्वर का उच्चारण करता, तो दर्शक समाज स्तम्व पौर मूक वन जाता) इसत्तिये यह्‌ भी स्वाभाविकिधा कि समाज की युवतियौ उसने षेरती, हस्ताक्षर लेती भोर ससक कथिता पर साधुवाद देतीं।

किन्तु समाज से स्नेह भ्रीर प्रेरणा पाने वाला मधुकरभाग्य फा धनौ नहीथा 1 घरमेनमा-वाप ये, कोई प्रनयं ठेसा प्रात्मीय था क्रि जिसके भ्राकपंरा ते वह पित्‌-गह को श्रपना धर मानता फलस्वरूप, मधुकर प्रायः वाहर ही रहता श्रनेक नगरमे रहा दूसरे प्रान्तो मे रहा। इस प्रकार परिस्थितिवश्च वह सैलानी भौ वेना भौर प्रलमस्त मी। वह्‌ प्रादमौ अमी श्रविवारटितथा। नारी श्राकप॑एा उसको जहां प्रिये सगता, वहाँ श्रलम्य ब्रीर श्रद्भूत्त मी मद्री की उम धर्मद्यलामे कि जिका सम्बन्ध एक विशेष सम्प्रदायसे या, मधुकर जव ठहरमेके तिये स्यान पा गया तौ वहां पडोसके कमरे भं वसने वाली शारदा नाम की युक्तो उस उष्डेनगर ऽते एसी प्रतीत हूरक्रि जसे भ्रागको जगीढी

दिन भरके वाद दीयेवक्ते जव मधुकर श्रपने स्यानपर वीटा तौ ष्ठि देखकर श्रवस्य भ्रा कि इख घर्णलाला का रगीता

१८ प्ह्चाना हु धवय

तैनेजर श्रपने कमरे मे एक कीमती शाल श्रो वंठा धा श्रीर्‌ उसके पास ही शारदाभीथी कि जो विलखिलाती हृदं टस र्दी थी मधकर उस कमरे के समने से निकला, तो तमी मेजर ने उसे श्रावाज दी, वह्‌ लौट पड़ा

मैनेजर नै कहा--त्राद्ये, वापु साहूव ।'

मुकर कमरे मे प्रविष्ट हरा कुरी पर वठ गया मनैजर श्रीर्‌ शारदाकीग्रोर देखकर मुसकरा दिया 1 उम समय, उप्तकौ रयो ने एक वार फिर उत शारदा को समम्‌ तेना पसन्द वियाफिं जौ श्रपने कमरे श्राकर उप्त मंनेजरके पास वटी थी ययोकिः भ्रातः ही, जव मधुकर गह्रजारहाथा तो उस मैनेजरको देखकर उसके मनम यह्‌ वातश्रष्टुं किश्रादमी रेगीला है, रसिक है। उसकी जुत्फौ को कटाव, ग्रो मेसुरमा रौर मुह मे रखी पान की गिलौरी, तिस पर गतेमे पडीसोने की जंजीर, जो खासतौरसे कुरतेके उपरकर लीगयीथी,ये सभी दस वतिके. दोत्तक ये विः वह्‌ व्यक्ति सम्पन्न मी था शरीरः दिल-फेक तमाशा देखने ` वाला-मी { वैसे ग्रावु का प्रीद्‌।

सुकर की मुसकान कोदेख, वह मनेजर स्वयं भी मुस्रकराया श्रीरग्रपनी सुरमई राखो से दसा उसी श्रवस्या में उसने कहा-- श्रमी शारदा जीने वत्ताया कि श्राप कवि ह} कविता कस्ते आ।

मधुकर ने कहा, “जी हा, तुकवन्दी कर तेता हु

मनेजर ने कदा, तुक्रवन्दी ही सही हमसे ता प्रच्छ श्राप ।'

` मधूकरनेदेखा कि कमरा सजा है) जिस तस्त पर मैनेजर वैठा

दै, उप्र परर कीमदी कालोन विदाहि दीवासें परर चित्र टेमे ह, दरण श्रौरदेरकेसिरमी लगे इस ल्य मे उस कमरे को श्रौर उसके स्वामी को देख, मथुकर स्वयं रसिक भाव से भर गया

चहूवानी, हई शक्ते १६

रौर तमी संनेजर की बात सुनकर वोला--^्या नपी-तुची वात कही आपने इस दुनिया में सवर यही समस्ते समी किसी क्षी श्रमावसे प्रस्त रहतेर्है षः यह-कटतै हए उसने दाये ली इद्‌ सिगरेट मँ श्रन्तिमि कय खीचा भौर उषे चोटी देविल परस्ती पेणटर भे दौड दिया। ~ शारदा वौलो--“मघुकरजी, थाप यास्रोजौ का माना मूरनेतो दंग रह्‌ जये 1 मालका राग प्रलपते दै रोज दी सुबदटक्ते भ्रषना तानपूरा तेकर ठते है“

मयुक्ररने कहा--“मेने वह्‌ कमरे में रसा तानपुरा दैव िया। शस्त्री जी सितार भो वज्तिहै।' ~ मैगेजरने, जोङ्गि दास्त्री के नाम ते प्रसिद्ध था, वर्त कदा-- “वाद, शौक क्रियातो, प्रा नदी शिया कोई उस्ताद नही मिला। दस पर्वेत्त पर एेसा सदाय नदी दिखाई दिया 1"

मधुकर ने कटा--श्राप माग्यशाली है सुन्दर स्यान पर रहते ह, धृति दर्दान करेहि

दरदा बोनो--श्वास््ीजी वड़े उदार है, सम्पन ह+"

मधुकर ने कदा-हा क, वह तो दिखायी दैते ह।“

शास्व्रीजी यौ --"कविजो, बह स्थात प्रापकादै। किरषये की -चिन्तानकोज्यि 1 कोट कृष्ट हो, तो वेताद्येगा ।*

शारदा ते हस कर कदा--्े कविजी बडे श्रातघी हैँ युवह चाय की इच्छातियेवैढे रहै र्ग इरन पहुंवती, तो वर्पो कौ बुं दी गिनेते रहते ।'

द्यास्त्रीने मधुकर की शरोर देवकर कटा- कल सुबह मेरे साथ चत स्पीजिये 1"

मघुकरने कहा--श्रापकी ङृषा है ॥"

सास्वी बोचा--नी कल जरूर. बय शारदा जी, रा 51

सारदा नै कहा-्पेतो निव्यपीवीह्‌ 1 कलसी ˆ 7,

२२ पहचानी हई शक्लः जीवन पर श्रव ठण्ड चड़ गयी हैः! मैं पडी किये, स्नापने मोजन तो किया? . |

मधुकर ने कहा--जी हा, भोजन किया मान खुव घ्रूषा तीः भूव भी सुब लगीं

शारदा श्राय वड्‌ गयी ्रपने विस्तर पर पड़-पड़े ही, मधुकर नै सुना कि शारदा ने कमरा खोला है, वत्ती जलायौदहै प्रौर वह्‌ कृ गुनगूना रदी है वह किसी मक्त क्वि का कोरईपद गा रही दहै): उ्तका स्वर मीठा है, उसमे लोचदै, द्दह तमी उष्के मनमें श्राया कि वह्‌ स्वयं भी शारदा के पास जा पहुचे, उससे गाने के लिये कहै फिर वह भीं ग्रपनी कविता का लाप करे, भ्रौर उस्र पर्वतीय स्थानं मे किं जहाँ उस समय पणं निस्तव्धता थी,तो वह्‌ श्रपनी ऊंची प्रावाज को गुजादेगा। उप्त पर्वत पर्श्रनि का इससे श्रच्छा सयोग उसे श्रौर कव मिलेगा कि वह्‌ गये ्रौर उत्त सुन्दरी लारदाको भी ्रामन्वित करे}

किन्तु मधुन्नर क्वि था, गा सकता था, दूसरे को साते के लिये नहीं कट्‌ सकता था, यदि वह्‌ इतना न्यवहार-पदं होता, तो क्या उस रातके प्रहर मे, उत्त निःशब्द स्थान मे उस्र मुसकराती हुई शारदा को देख मचलते पटी की तरह श्रपने पर फड़फड़ाता श्रौर गुनगुना न, देता लेकिन उस्नेतोशारदासे यहुभी नदीं कहा किग्राग्नो, वैने। कुं अपनी कहौ, दूसरे की सुनो वह्‌ तो जपे निधिकार चावस उसकी ओर देवता रहा, देखता रहा 1

तभी मधुकर के मनमेंश्राया कि उठे, वत्ती बुफादे! कमरे का दरवाजा चन्द कर. दे ` परन्तु उसी समय शारदा उस कमरेके द्वार परफिरश्रा खडी हुई श्रीर वोली, "मधुकर जी, प्रादय श्रपको एक वात दिखा श्रापको वताज किं इस दुतिया करौ रीत क्या है... परतीतिक्याहै!

मधुकर श्रष्मंजस में पडा गया. } सच्चाईयह्‌ थी कि वह्‌ प्राततः

पट्वानी हई शकं २३

ही उस नवयुवती कौ कि जिसको श्राय तीष तक नहीं पटूची होमौ, श्रार्चये श्रोर विस्मय भरो नदी सममनेलमाधा 1 प्रौरजव उने मेनेजर कैः पायर्वंठी पाया, ठव तौ उमका माया रनक ग्या जो किचित्‌ प्रनुराग उत्त गारदा कर प्रति उख मनमें पैदा टूग्रा था, वह कार कौ तरह उड़ गया अतएव, उने धारदा की वात मुनी, चौ वोना~-ष्या है ` “दं. 2"

शारदा नै कहा-"उच्थितौ { इसिये नही !*

मबुकरर उठा, बादर गया श्चारदाने कद्ध भ्रागे तते जाकर श्रेधरे मँ षट, उम द्द को ईुगित कसते हए कदा---“यहं वृद्ध है, मिवारी दै, जानते है, श्रव यह्‌ क्यो यदांश्रापड़ा है कम्बस्त राराव पी प्रायाहै। यह्‌कमीमी ईस प्रकार भ्राकर पड जाता ।'

मयुक्ररने कातो पद थरावपो धाया टै श्रमी तो यहश्राा थाप्नौरक्दरदायाकिनूखादै) ने एकश्रानादेदिया था 1"

शारदा वोनी--देखिये, वह एक प्राना मी पटर 1 यह्‌ प्रव से ही पडा रहेणा 1 यरा चे मुट्‌ जयेगा मिक्षार्मेजौ कुद पात्रा है, उसकी शराव पी प्रावादटै।+'

"राम~राम1* एकाएक मधुक्रने कहा ठो यह भिखारी तित कष्ट का रोगी दै + इसे शरीरम पीपधूताहै। यह तो स्वय दही श्रपने निय दुलान्त वना दै इस जीवन को मारदेनेप्रतुतादै।'

इतना सुनकर, शआरदा एकाएक मम्मीर वन गयी उषी श्रवह्या मे बोनी--्रापक्ना कहना मौ ययायं है ठेमी सवस्था मे पटी कटा जात्तादै। किन्तुं इत भिखारीके मनम ङा चन्वाप नया है, कोनाट्त दै, उक्ते क्या विसीनेदुनादैयादैपा है?"

शारदा जैसे एकर पहेली मधुर कै समक्ष रखदी। तो वह सी पर भुक्ता ट्ृश्रा वोता तो क्या"

किन्तु ्नाद्दानेग्रपनी बाठकोस्वयं दी कड दिया, पठती नटीं रटने दिया, "वाब ्रापए़त्तो पहिनी वारभ्राये हन डस स्यान्मे, प्रमति

यद्यपि यह वात प्रायःसमीपरलामूहोतीटै कि मन्य ष्पे में किक्ती को सममना प्रासान नहीं! सन्तु धर्मदाला का र्मनेजर जोक्रि ण्दास्प्री' कै नामने प्रसिद्ध था, उसके सम्पकं त्रं भराने वते वट्ठ कम व्यक्ति दघ वात को जानते ये करि उसका विकासक्टाँसे से हप्र 1 वह्‌ किस जात्िकाथा प्रर कहां तक्र पद़रा-लिखा था! उससे सम्ब- न्धित व्यक्तियों कोद्र दातका मी पत्ता नदींयाकि वह्‌ उस घर्मघाला में वैतन-मोमी मेनेजर या श्रयवा वास्तविकः मालिकः घा यदि उस स्यान काकौ श्रौर मालिक धा, तो वह्‌ कौन था, खोजिर्यौने इस वात कांएक यार मी पता नदी चला पाया भ्रौर यह स्पष्ट या,समी को दिलापी देना था कि वह्‌ स्वरी ग्रकेला था केवल एक नौकर उसे पाठया, जो उसकीसचेवामे लगाया 1 वटी उस धर्म॑शाता यें प्रापे हए आादमियो से किराया प्राप्त कत्ता या 1 ^ जव द्रमरे दिनं प्रातः में मधुकर उस्र शास्यी कै यहाँ पटरैवा, घो वह्‌

यदे देखकर चन्त दग्रा दकि शारदा पिते से वहां वटी यौ शास्व्री मयुकर कौ प्रतीक्षामे था।

तमी चाप प्रायी, मिठाई मी उसी खमय शारदा ने कहा" जव प्रपते कमरे से चली, तो श्रापक्वा कमरा वन्दथा1"

मधुकर ने कटा स्नानः करने गया था ।"

शारदा बोलती -- "जी नटी, श्रपसो रहेये 1 कमय प्रन्दरसे बन्द

था॥

२६ पहचानी हुई शक्लं

सुन्दर शास्त्री हेसा--'ग्रजी साहव, घ्राप समभते क्या रह, यहं ्चारदा देवी श्रापकी चौकीदार है, प्रत्येक गति-विधि पर निगाहं रखती है 1

मधुकर ने कहा--"यह्‌ तो प्रच्छा है।'

किन्तु ज्ञारदा ने ्रातुर वनकर कहा-- प्रतिः जल्दी उठती भूमने जाती हू शंस्तरौ भी जतेर्ह। श्रमी कु देर पूवं हम दोनों लौटे)

वात सीधी ग्रौरसाफथी कि जिने श्ननायास ही मधुकर के मन मे गुदगूदी पैदा कर दी1 वह्‌ पिद्धले दिनि की ग्रपेक्षा शौर श्रधिक विस्मय से मर गया! शास्त्री श्रीर्‌ उस शारदा का सम्बन्य क्या है, मानो एक यही विचार उसके मन को उदेलित करने लगा }

उसी समय चाय पीते हुए, शास्त्री ने ज्ञारदा को सम्बोधित किया, श्न वाब करो प्राज तुम भरने परे जाग्र ! तुम मी घूम प्राश्न 1 ` आारदा ने कहा--"दतनी दुर !* वह मधुकर की श्रोर देख कर त्रोली --"कहिये, चलेगे श्राप } कैम्पटी फल नामरहै, उस फरनेका 1 यहा से सात मील दूर !1'

मधुकर ने कहा- “तुम चलोगी, तो मै चलदुगा।'

शास्त्री ते कहा --'यह्‌ शारदा देवी गाती अच्छा है। श्राप कवि, यह गायिका, रास्ता मजे में कट जायगा ।'

देस कर शारदा ने कहा --्रव.गाया नहीं जाता

शओास्वी ने कहा --ुव गाया जाता मृ पता

नायका कायक्रम समाप्त हश्रा, तो मधुकर ने सिगरेट सुलगाया एक सिगरेट शोस्ी कौ भ्रोर मी वंढ गया किन्तु श्ञास्त्रीने कहा, भै पान खता हूं सिगरेट नहीं पता ।' वह्‌ चोला, “ग्रा श्राप घूम प्रादय 1. शाम को भोजन भी मेरे साथ कौजिये। तवे वताद्येमा . भ्रति की ` चुरम्य घाटी मं जाकर ्रापको क्यासूभा।शामकोगनिफ्नाभी

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पहचानी हई रक्ते २७

्रोप्राम रहेगा + यह्‌ कहते हए शास्परी उठ खड़ा हा मघुकर्‌ भी उठ लिषा। `

जव वह्‌ श्रौर शारदा श्रपने कमरे की तरफ चले, तो तमी दयारदा नै वताया कि श्रव मेनेजर स्नान भोर मजन-पूजन करेगा वदं वोसी-- न्तो श्राप चले, केम्पटी प्रो पर 1*

म॒मृकरने कहा-- देखिये, तो श्राया ही इतिय हं कि यहा % स्यान देमू तुम चलोगी, तो ब्रामार भानूगा॥

दारदा गोली --प्रामार की क्या वात | हां, यह्‌ वनावटी वात क्या ! प्रापक साथमेराभी धूमना हो जयेगा ।' उसने कहा--श्माप वैषि, भं श्रमी जाती हूं 1 दूसरी धोती यदल श्राती

जव दरदा लौटी तो मधुकर ने प्रपना कमरा वन्द कर दिया। चट चल दिया उस समय शारदा एक सफरी श्रादमौ कै रूप मे उसके साथ घी। दैरोमे चप्पल की जगह किर्सामवकेजुतेये। कन्ये पर भोला 1 जव वे दोनो उस वस्ती से वाहर हृए्‌, सन वृक्षो प्रौर जन-दीन परय पर चते, तो तभी शारदाने कहा-कलसेही मेरे मनमे एक यत है कि श्राषने जल्दी ही मुके (तुम से सम्बोधित किया इससे सचमुच ही! मुभे परार्मीयता का प्रामास मिता ।'

मधुकर ने कहा-- “मै ग्रनादी हू, कुद श्रव्परावहारिक मी प्रम्यातत

कीवातहै, वैसे मुम तुम्दँ प्राप दही कहना चादियिथा।'

शारदा दसौ--श्राप के पा कह्ने के लिये ग्रौर कोई वात नही, क्या यह समसु कि प्रापको कहना है, तो उस की यह्‌ मूमिकादै! मेरामतदहैङिश्राप--'

एकाएक शारदा ची उठो किन्तु उखकी चीख सुनते ही, मधुकर स्ययं किकरतस्य-विमूढ बन गया 1 वद सारदा को पूरे वल के साय प्रपनी शोदश उल कर माग लिया, जिक्तका परिणाम महद्भा वह्‌

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२८ पहचानी हुई शकलं हर जाते ही एक पत्यर से टकरा गया दोनों शिर रये 1 एक-दुसरे के ऊपर भिर प३े। मधकर के .लिये सन्तोप की वातत यह्‌ हई किं शारदा चच गयी, किन्तु वह्‌ स्वयं चुटील्ला वने गया एक पत्थर से उसका किर टकरा गया माये से दुं मामूली सा खून भी निकल राया 1 यह देख शारदा ते श्रपनी साड़ी का पल्ला फाड़ दिया श्रौर उस्तकी पटी को मधृकर कै माये पर वाघते का प्रयलन किया तुरन्त मधुकर ने कहा--'मगवान की कृपा हुई कि तुम्हारा पैर शारदा बोली-- "भेरा विश्वास है कि वह्‌ सपि नहीं, भ्रजगर था। वहत भारी था 1 तुम उठते, तौ मेरा पैर." मधुकर वोला-- उस सापिनेतुम्हुं देखकर ही मुह खोला था) तुम्हास पैर उसके मुह्‌ पर पड़ जाने वाला था॥ रारदा ने सासि भरी-- ष्ट, मधूकर जी, वह्‌ मेरा पैर पकड लेता तव क्या छोडता !* तुरन्त ही उसने व्यस्त स्वरमे कहा--'पर हौता क्या ! मुभे पकडता श्रौर खा जाता पहन! यह श्रच्छा ही था श्रव मेरी मोततकीषड़ीतोश्राई थी, परन्तु ˆ“ उसी समय मबुकर ने श्रपना गरम हाय उस्तशारदाके हाथ प्र रखा श्रौर कटा -- "दसा व्यो सोचती हो इस जीवन को क्यों तुच्छं मानतो हो देखो श्रे तुम मुभे ^तुम' से सम्बोधित्तकरवुकीहो, तो उसी से सम्बोचित कये ` शारदा ने कहा - "तुमह कष्ट हृश्रा ) तुम्हारा सिर श्री चुटीला वन गया मधुकर खड़ा होकर बोला---्राननो चलँ मेरा घ्यान तुम्हारी साडो पर दै। वेकार ही तुमने नई साडी को फाड़ दिया) शारदा कटा ~ लगता है" हम शगुन देखकर नहीं चने मेरा. . तो उत्साह ही मन्द पड़ गथा +" ४) बीला-- न्तो लौरे ! फिर घर्मशञाला चले ।" ` शारदा वोली--"यह्‌ मी क्या श्रच्छा रहेगा वह्‌ सस्ती मी मजाकं `

पृह्चानी हुई शक्ते २९

करभा चसो, श्रव रागे बडे! शेष रास्ताभोपारकरे। वह्‌ स्थान सचमुच ही दकष॑नीय है पर्णं प्राकृतिक है 1* उप्त समय मधुकर के मन में वात पराई श्रीर बोला- णह, द्ारदा जी, यह मैनेजर भौ श्रजीव आदमी र्मे तौ एक दिनि का मूम्रा्रिहू उस पमंशालामे, पट बहमेरे प्रतिदौ शारदाने कहा--"मेरे मनमेवात्तथी किः तुम दसी प्रकार गर का प्रशन मुममे करोगे यदह स्वाभाविक मीहै। परन्तु ददना ही फं सकती कि यहु शास्मी नेक प्रादमी है।* वात सुनते ही भ्रातुर बनकर, मधुकर बोला-- भेरा यह्‌ तात्प नही फि वह्‌ चरित्र का सराव है। इससे मेरा कोह पम्बन्य नही मेदे मनभंतो वात भाई कि बेह्‌ बड़े ठठ से रहता है सर्वला लगता है। देलौ प्राज घायपरही..* शारदा बोली -रमुनेजर के पासपैषा है वह्‌ उदार 2 धर्मदा।लामे कोई पसा मुसाफिर भ्राता हैकिजो उसकी दृष्टिं श्रच्छादहो तो वह्‌ उसका स्वागरत करता है + तनी वात सुनकर मधुकर चुप रह गमा वह ददम सेकदम मिला कर चलं रहा या, परन्तु लगता यह था किं उसके मनमेंकोर्हभ्रौर वातमभौो यौ, जिते वहु कहु नहीपारहाथा। उसे मृहेमेलियेथा। तमी शारदा योली- मेरा श्रमी तक सासि न्हीका+ रसा लगता हैङ्गि वह्‌ सपर प्रजगर्‌.. मधुकर ने फिर एकाएक ही दयारदा का हाय पकड तिया भ्रौर कहा~ “इतना डर है ।' शारदा बोली --'स्वामाविक है !' उसने कहा - (तुम सायन होते, त्ते निश्ष्वयदही दां..' यहु सुनते ही मधुकर का स्वर एङाएक मारी हौ गया उतने कष्ा-'शारदा देवो, इस जिन्दमी की हाट मेँ जाने रितिने मिलते भौर चत जाते) कु तो सचमुच ही, इस जीवन के सच मेँ भराश्वरय, विस्मय _

अवार नदीं \ , इतना, सुनकर शारदा हं वया खुव, = = रचने दे!"

"वाह्‌ वाह \ क्य

पदचानी हुई भक्ते ३१

कन्तु तुल्त दी मुक्रने अ्रप्रतिन वनकर कटा गही, नतुम्हारी नेह, मन्य यदी है) मरे उावतुम्दादा कोड ग्रनिष्ट नही 1 वुम्ह्मरी भावना बौर श्रविकार मेरे खाय मिनते दषु मुरक्षिठ उसी समय एक पड़ा प्राया 1 द्यारदाने कटा, चदय उद्येय नीं रम "यक गवी 1 कम्बद्त, उन श्रजगरने भेरी शक्ति ग्रौरघटादी दस षद्यर परवैठसं)' देम कर मधुकररवोता--वहां नवद्‌ बदरा सप पत्यरङे नीचे सेनिक्लाया। वड़ा चालाक भा, वहां दपा वडा था। की राहमौर कीताकर्मेथा 1 देखा लिक्रारभ्रा रहा, तो तुरन्त मुट्‌ बाहर निवाल केरश्रामेग्रामया॥' शारदा वोनी, "प्रव उत्का जिन करो 1 दाते कृष्पन दा दत्रादै1क्टतो एक हुवा, निक्त गयी मेरे समूचे मानष को भकमोरगयी। + ,मघुकरनेकहा, "पुमे ही जोत्रन में भ्रन्य मोड़ पत्तर, वे टन्घान फो ऊर उठा जतेर्है, नीचे भिर जति स्वस हीथारदाकेमूहृने निच्ना, श्वा उषे स्क... हराम {' यदकृत हपु उनने्रगना मुहु मयुर के कन्ये षर्व दिपा। उक्त अ्रवश््रारम दी उनने किर कद्‌ा- "मवुङ्र्जी, लोग कहते हक्रियह्‌ जीवन वहा मस्रदैमुगमदै, मैदा नही मानती मै शो इवे नितान्त वियम मानरी हूं मानौ श्रननाने मयुककरके मुहु वे तिङता, ष्टी, यद... शारदा ने श्रपना छिरच्डाङर, मनुङर कौ भ्रोर देवते हृ कटा - शायद नही; जषट्र { यदीव्दयदहैष मधुक्नेक्टा--ठेानदीदहै।" फिर प्रापदी वोता, हा, टा, कदा तो {* उने कहु, ^परन्तु हेमना व्रिचार समी कं चियै नरी तौ कै निवे है1 तुम क्या हो, यह वत्राप्नो, भ्रयना

पह्चानी हुई शकले

३२ परिचयदो, तोम श्रपनी राय निर्धारित करू 1

शारदा ते कहा--श्रर्थात्ति कंसी नारौहु। विवाहित हं इसलिये लडकी तोह नही, पर वैवाहिक जीवन पाकर भमी केसी वनीह

जसे श्रनजाने ही, मधुकर के मुह से निकल पड़ा हा यही !1'

रौर, तुम मौ वही हो मधुकरजी, जो ओर लोग है दिखता है, समूल नहीं हो 1" यह्‌ कहते हुये शारदा बोली, श्यराग्नो चलं तमी चलते हए उसने कहा श्रमी वात तो चली कि संस्कार श्रौर संयोग जीवन में वहूतवडा काम करते है सोम मी उसे मानती भै तुम्हारी भावना समती हूः 1 धीरज रखो, तुम म्तिहो, तोश्रममें नहीं रखुगी, समी कुं वता दूगी।

तिन्तुजो वातत मधुकर के मन में पहले भूल से उठी घौ, जव वह्‌ किनारे पर प्रा लगी, स्पष्ट होने लगी, तो तभी वह्‌ वोला-- न्न, न, मुभे गतत मत समो, शास्दा देवी ! सके कोई श्रम नहीं ।'

शारदा वोलो-मेभी कदती हूं किमेरे मन में कोई दुख नही दुभावि नहीं ! क्योकि मैने सम. लिया है, कि इस जीवन की हाट मे सोदे किये जति है! किसो वस्तुक दाम श्रचिक उरते है, किसीके कम 1 समभ लीजिये, मेरे दाम कमरे खगीदसे मी कम}

मानो क्षुन्ध वनकर, मधुकर वोला-- (कसी वात करती हो क्या चच्चीचनीहो)'

लेकिन शारदाके मनम तो इस समय से कोई चमकदैदा री गयी ह, उसे पौड़ामिलौहो। उसीसे प्रभावित होकर वह्‌ यौ सी--नहीं वादु, मै बच्ची या श्नन्नान होती, तो ठीक थी पर श्रव जवान हं, मै जीवन की भरो दोपहरी मे खडी ह,

पहचानी हई शक्ल ३३

सो समौ कुट सममन मँ समयं हूं जितना सफर तय किया उस चास्तविक्ता की समक श्राई, भ्रव जितना सेय है, उते भी देततेने के लिये ्रस्वुत मेरे जीवन में तुम षया सोजनेषी चात सोच-सममः सक्ते हो यहतो स्वय जानो पर द्रतना वह देतीहूं कि मेरे पास कहने फो बुध नही दहै जोक है, वह भी वृषा दै, भेरी दृष्टि हो शठा प्रर वेकारहो गया ह"

मघुकरने सांस मरी भ्रौर छोड दी उसी श्रवस्या मे उसने कहा ~ "यही किस्सा मवके सायै! शायदमेरे साय भमी।'

उषी समपयात्राका लक्ष्य सामने भ्रा गया)

रातकेसन्नटि मे, जव करि मसूरी शहरी प्रायः सौ चुका या, घह समय सचमुच हौ स्मरणीय वनकर रह गया कि नब वाह्र चारिशहोरहीधौ भौर श्रते कमरेमेर्वंठा प्रा शास्त्री मावातिरेक भं एक सितार पर मूरदास का पद उच्चारणकर रहाया। "वाहु दुडये जातो, दीन जान के मोप, हदय से जव जाप्नोगे. तव जादूगा तोय 1" गानि कै साथ शास्यीकी म्रा मर श्राई थी, वे रपे उसके मालौ पर निकले भराई" युवक मधुकर सोच नदी सक्ताथाकि वहु छ्ौकीन-मिजाज शास्त मूरदासकेपद को गाते हए दसं प्रकार से पड़ेमा उसके लिये भ्ाश्चयं का धौर कौतुकूका विषम यहे भी

(क पास वैठी दुई जञारदो भो रो बादजववे लोग उठे, तो वहसे चलते इए कर कहा मसूरी स॒मे श्रापका {मिलन ये वरदान हो गया , गया 1 उसी समय शास्नीने करट "यह्‌ शारदा दुखी हु मानसिक खूप से र्ण है\' मधुकर ने शारदा की त्रोर देखा, उसने कठा --ष्ट्म दोनो तौ श्राज साथ-साथ रहै) जानि किस-किस विपय पर चोलते र्दे द्न यारदाजी के मानसं +

1 शारदाजी का

1 एकाकी हि

पर

क्या रते) ; लजा शया जास्ती का वह ग्माक्षेप ते उसी के लिये था \ श्रत्व वह्‌ वोल नहीं पाया) जञास्त्री मी

चात के ग्रन्तराल मर उतरकर खो गया

शास्त्री योला--्देविये कसी वात है, श्राप टौ कौ वात रै श्रौर लौट श्यी 1 आरा

रास्ता पार करके

एक-दूसरे के जीवन नही उतरे, एक-टूखरे कौ समने '

प्रयत्न नदीं कर सके \ ग्राद्चय

मयुकरने कहा---“लास्तीी घं अरग्पाहारिक ई} मूख 1 यह सो सक्ता कि स्वतः दी दीनता की सावना सतेभरा ऋ)

दतती वोत सुनकर भी, दास्त्री दसा नही, वह्‌ जपने स्वमा

पहचानी हई शवले ३१

विपरीत वना हुश्रा जैसे पत्थर हो गया उसी श्रवस्या बोला-- कवि जी, प्राप मावनावादी है परवुढ है) परन्तु जितत भादा की वात माष करते ह, वाद्ये, कया वह्‌ सरल दै, 'समभ्नने योग्य है परती पर चलने वाता इन्सान प्राकार के तारे भिने, चन्द्रमाकौ भ्रामा का वणन करे, मे इसे मान्य नही देखता } श्राप युवकर्हैतो धृद्ध काम कीनिये। समय की हीनता पर प्राघात कीजिये। इन्सान क्तिनि प्रन्धेरेमे है, देसे जाकर देखिये उसकी पीडा समभि वरन करने कै साथ ग्याबहारिक भी बनिये श्रापने ऋोपडी प्रौर किसान की कवितां सुनायी मुभे सचमुव बहू ग्रच्छी नगी ।'

मधुकर ने कटा--"वास्वौ जी, मै श्रपनी कमजोरी पहचानता हं मानतादहूंकि इन्सानके जीवन परतैरना श्रौर वात दहै, उसमे प्रविष्ट होना श्रौर वाति दै भलार्मे भ्रमो कितना चला हू ।'

शास्वरी मुस्कराया, फिचित देखा उसी समय उसने दरार के पास गरडीदारदाकी श्रोर देखा उसने कहा--^द्स शारदादेदौ की एकवडी कहानी है। कठोर है भं उपे वताता, परन्तु शारदा स्वयं हौ प्रपनी वति कटै, भं इसी को श्रेयस्कर मानता 1"

शारदा नेका, मेरेपासक्यादहै! हौ, क्ठनेको क्या 1'

किन्तु शास्वीने जहे शारदा की वात नही सुनी, वह प्रपनी वात को लिये बोलः--दस युवती के साय एक इन्सान ने, उसके समज ने न्याय नही कवा) मनेतो इसशारदा को देखकर समा है किहुभारा समाज, हमारेदेश का इन्सान सचमुच ही नकटा है, कलंकित दहै , मानवीय भावनासे परे है!"

मुकर वोला-- "यह तो पुरानी वात है। इस देदा फादन्सन जिक्तेवेमसे घमं ओर स्ृतिकां नारा छ्माता है, तो उषी भरतुपात मे प्रधमं श्रौर भ्रमानवीय मावो मरह इष धरती के शन्त नै गरी क्तो स्वाप, व्ण है"

शास्त्रीने कारी गो म्राप रगे मधुकर ल्‌ा--"जी, कदो ¶दिन रहा शास्त्रीने कहा--"चा तो श्रौ सिय + मधुकर चोला 'श्रापसे परिचय हुता ट, तो फिर कभी आ्आाऊगा समय देर तक सक सदूमा 1 स््रीने शास्दा की रोर देखकर कटा _-ष्तो श्राज की कृपा

उसी समया पजगरके मुद्‌ सै जाने से वची तुम ते वची \" छत्रदा ने कहा ~ मधुकर ने कहा तो लिमित्त मात्र धा 1" उरसाह-माव से शास्त्री दूसरी शक्ति थी 1 वरी-पथ-परद्न करती... अम्हाई लीग्रौर चुटको वजार 1 मधुकर दोला --्रच्छा, श्रव राज्ञा दे श्राप श्राराम करं 1 उस समश वारिद वन्द दो गी थी 1 मधुकर श्रौर लारदा वहाँ से चल दिये) मकु कट क। कपर" पर्हिनि पडता था, वह्‌ रक गधा प्रौर योला--श्वारदाजी , वैढठोमी नहीं \' श्य्ाप प्राराम कीज्यि

ध्यदी कटा जायगा ' जीर तो नहीं, बचाने वाला कोर्ग्रोर था) मै ते कह्‌ा--वेक 1 वेक्षक ! वचाने वाली थी..." यह्‌ कहते इए उसने

शास्दाने कठा 1 श्राज भक भी

गवी हू \

थका मधुकर मी या, परन्तु शास्त्री श्रीरशारदा के गानि सुनकर

नव-जीवन प्राप्त हुता वह्‌ सुन्दर ग्रौर सुहावन प्रहर श्रव वह्‌ सुगमता नही पा सकेगा \ कपडे उतार कर वहं चारपाई परः पड गया ग्रौर गया 1 लेकिन जव सुवह्‌ इई” शरीर मधुकर समय परः नहीं उठ सः तो दिन चदु शारदा स्वंय चस ञ्नोर श्राई, देखा दरवाजा

था} मधुकर चारपाई पर पड़्ए \ पास पहुचते दी, श्यारदां

पहुचानी हई शक्ल ३७

कहा - क्या प्राज उठने का विचार नहीं देखो कितना दिन चद्‌ गया

मधुकर ने श्रेगदाई लौ श्रौर प्रपनी सुन्दर भरी भो से घमीष खदरी ्ारदाको देल कर बोला, '्देरमे सोपा था, तो जाग नहीं सका वेमे भी कल भ्रमण क्यातो श्राज श्राराम करना होगा फिरेभ्राने बाति कल मे सफर ` उसने कटदा-- वटो शारदा देवौ ! रतिर तुम्हारी ही वात पर प्रटका रहा शास्तीने ठीक दही कहा, हम दोनों ने कलं लम्बा सफर कियः, परस्पर देसे, वोले, साय वंठ कर खाया, प्रन तुर मेरा पता चला भौर मुभे तुम्हारा वसे याद तो पड़ता है कि तुमने वतायाथा कि पतिदेव भी यहां साथये। वै लौद गये उनकी दुकान का हूर्जा होता था ।' बहु उठ कर वठ भया भ्रौर कहने लगा--्तेकिन कल शास्म नेजो गरु वताया, वह्‌ तो विलक्रुल हौ विपरीतथा। विस्मय सेभराथा जिते सुनकर मै लज्जित्त हृभ्रा सचमुच, यह्‌ मेरे लिये भी विचारणीय वन गया कि्राखिर हेम फंसे इमान 1 हम मेँ सामाजिक भावना का कितना विकास दृष्रा है रात मनेतो सममाकि मै शून्यहू जे इस दुनियादारी के व्यव्हार से श्रनभिज्ञ श्रतएव, मिन्दाहू. दरदा देवी}

श्लार्दा ने खडे-खडे ही मवुकर की लम्बी वात सुनी यह उसने भी धनुमव किया किं यह्‌ मधुकर रात भें म्रधिक नही सोया सुवह्‌ श्मानि परसोपादै) वह्‌ भ्रषने प्राप बोली, यह भी ग्रनीव श्रादमौदहै। प्रसौकरिकदहै 1

मौ मघुकर वोला--श्रामो्ेढोन {वठो 1

शारदाने उस श्रोर देखा श्रौर हें कर कहा-- कल वुमन मुभे गोद ते उठा लिया था उस प्रजगर से बचनेकेलिघे। तो श्रव ष्या मुभे मुम्दारे पासं वैषने मे संकोच होता है लो, वैठ जाती हं यह कते हुए बहु मधुकर को चारपाई पर गपी

उतत समय भ्रासमान साफ था धुप निकली यौ + कन्दु भमी

-रजाई देखकर उसने कडा -- लगते रै \ वि

मे पडे हए डोरे कलात्मकं

9 सघुकर वोला- मे तुमसे कहा नरी प्यार पानि काश्च "ओह, वड़े भाग्यवान्‌ है" श्रा

|' मधुकर वोला-- नुभूति श्रौरः सद्भावन्‌! प्रा

तो किमे कोई नदीं दै। वसर

विकारी वन गया है, श्राप

वाजारसे खरीदी दै\

हौ, सभी को नदीं \ यह: प्तकी,तो वह भी

गयी \ पडी-- "कटो न, प्यार

द्ारदा {दिलण्िला पड चोली _--.मघुकरजी, यह दुनिय

1 कविता करने

-- नारी कामन.

श्राकर ने तुमसे जं मेरे लये स्मरणीय

|

क्रे लिये नहीदटै'

पहचानी हृं शकले ३६

सौल कर देखने की स्तु है 1 इस धरती पर वंठ कर दिमागकेषटस्नो यन्द नही रसै जा सकते

मधुकर ने कदा--शप्रमी तो मेरो यही म्रवस्या है! कल को कया हो, नही जानता! ्राजतो इमौ को ईदवरीय देन मानता हू प्रनु- पम देखता हं ।* वह्‌ दोला-'रातकेःदो वजे होगे उष ममयकरिमेरी भ्रां सुल 1 मै इस कमरे से याहर गया ग्रौर देख भ्राया कि मेरे सामने वटी हई सारदा देवी क्या कर रही थौ किस प्रकार उसतदृरेकीतेवा भेतन्पमथी।'

“प्रोह ! तो देख भ्राये वुम ! चोरो से गे प्रौरलौटश्राये।" रारदा ने कहा -"कम्बर्त, रात मे जाने कहा से प्रा मरा। मुभे जगा दिया1 श्रौर सचमुच उसने ठीर ही श्रिया 1 उसके पेटमें ददं था। ठावेवनिने रोटी के सूते दुक्डेउसेदेदियेये उन्ही कौ चदा गया। क्ल उसे पीने को नही मिली, वेचारेके पेटमें दर्दहो गया।'

मधुकर मुत्तकराया--श्रौर तुम उसे कभी-कभी पीनिको पते मी देती हो रात गरम गूदद से उसका पेट सक्ती हृई कह रहौ यो, मेरे पात बयो नही प्राया मुके क्यो नही पैते ले गया ।'

शारदा ने सांस भरी! वात्र | कमी-कमी उतेष॑तदेती हं! नुम सहज मेँ समफोगे नहीं कि उसके मानष मे मरी पीडया रतनी गहरी दै, प्रवाहं दै! जवसे शरारती गुण्डो ने उको सद्की उटाई श्रौर मार कर पहाड़ी कीषाटीमेफेकदी, तो यह दूढातमीसे विक्षिप्त है, कातरश्रौरद्ःखी वनाद सुनतीहु कि गोवमे दसका एक भाई, वह इसकी जमीन हडप चुका है। श्रतएव, भ्रव इसका नृपरदैनकटीठ्किानादै।*

` मधुकर बोला -षवद्धकी पृत्री को मगाने कौ बातत तो तुमने कदी, पृरबहमारमी दी गयी, इठना श्रव सुनकर, मेँ सहन मे सममः नहीं पाता कि श्रादमौ कितना निष्ठुररहै, कठोर दै

दरदा ने का-'ययपि उस्न सादा प्रन कषषटेयेन कोई तेवर,

पहचानी हई शक्ल

पर इसे भरोसा है कि वह्‌ जानवरों हारा खाई गयी लाश इसकी लडकी कीथी॥'

मधकर बोला--'जो हो, वह ग्रमासुपीय कमं था कूर श्रौर जंगली- पतसे मरा था) उसने कहा---न्लेकिन अरव इस वृढका क्या सिल- सिला है! रात तुमने उसका पेट सेका। चायका प्याला सी बनाकर दिया

शारदा ने कहा--'ट्व रखा था उसे कुछ देना भी था 1

"तुम सचमुच ही दयालु हो, शारदा देवी {* मुकर नै उसकी ग्रोर देखकर कहा--"ास्व्री ने निस वात पर मेरे कान पकड, मीटरी भिडकी दी, वोलो-- क्या श्रव मै उसका सुधार कर्‌ सकरुणा तुम श्रवसर दोगी कि तुम्हारा परिचय प्राप्त करू ।' यह्‌ कहते दए स्वतः हौ मधुकर संस भरी श्रौर वाहुर की ग्रौरदेखा उसी श्रवस्था में वह न्यस्त भावसे योला--"मेरे कटने का ग्रथ यह तोक्दापिनहींकिर किसी योग्य हं विन्दं परवस्थाग्रं मे सहायक वन सक्रुगा 1 परन्तु जितना भी सद्‌- भावनापृरं व्यवहार मँ तुमसेपासकाहु, यहां से लौट कर उसे भ्व्य ही श्रपने साथले जाऊंगा 1" यह्‌ कहते हुए उस्ने रजाई के ग्न्दर हाथ किया वह हथ ्रनायासर हा लारदा के परपर चला गया 1 वह॒ उस वैर को पकड़ कर वाल'-- "वड़े ठण्डे पैर ह, तुम्हारे ! कटी अन्यच से भ्रायी हो ।'

रजाईके ्रन्दरही शारदा ने श्रपना पैर पदे हृटा लिया श्रौर. उस्ने मधुकर के हाय पर प्रपना हाथ रखकर कहा --"एक ही वात्त है मेरा षर रण्डा है, तुम्हारा हाय 1 वह्‌ वोली--“मधुकेर जी, मेरे पांस ेसा करु नदी दै, जो गोप्य हो 1 यदि कुच थोडा सा है भी, तो उसे वताना क्या श्रच्छाह। वहीं समभिये कि इस धर्मशाला मे श्रापके समान मै मी गृ्ाफिर हु हौं इतना कहना फिर भी पसन्द करती हू कि शास्त को श्राप जिस्च रूपमे दैसते ह, वास्तव मे वह्‌ व॑सा नहीं है लोग दस इस ध्मश्ञाला का मैनेजर समते ई, परन्तु वास्तव मे मालिक यही है

पटचानी हई रक्ते

भ्राजक यहा मरखाक्तिर नहीं 1 बनद्रह्‌ दिन पूवं यहाँभे। सूव चट्ल- पत थी, कोलाहल धा मैने यह्‌ समकः लियादटैकिः दस धास््ी

पाक्त पर्याप्त धन था, परन्तु उक्र एक वदा माग यहं द्रमरो (गो नेद कर चुरा है श्रगेनों कै सभय एक सेठ ने यह मकान वनवाया या वह्‌ देर तकर यर्दा बीमारी कौ श्रवस्या में रहा यही मरा यह्‌ क्षस्व उसका कारिन्दा या ! सेवारत था! बट्‌ यह्‌ मकान दत दास्व्री कौदे गथा॥

मधुरुरने कहा "ने कल्पना तो शो थी कि शास्त्री नौकर नहीं है। परन्तु उस म्रकान को इसने पर्मशाता का र्पवयोदेदिपा?ः

घारदा योली-- “कोई श्रनतर मही पदता 1 इस मकान फे नितनेः कमरेहैवे किरापि परर कम उस्तेर्ह क्मोेसामभीहोतादै कि शाकी मुप्तमेंहौलोगोंकफोव्हरादेताहै।

मुकर मुसकराया - "यह पवंतीय स्यान ह। यहां निर्धन नहीं भ्रायेगा, पैगे वाला हवासोरी के लिये इस स्वास््यप्रद स्थान परर रहना पसन्द परेगा 1' वह्‌ योला--"उसकी पल्ली नहीं दै ? कोट बच्चा ?"

शारदा ने रना्केप्रन्दर ही, फिर मधुकर कै हाय पर श्रपनाहाय रखा, उसे पकड़ लिया उसने श्रपने स्वर पर जोर देकर कहा-- "वाद कटानी यड है, तीखी मी है मेने कदा न, यह दास्य कुद जो ऊपरदै, वसा प्रन्दर नहीं इसी षाड पर दस दास्य ने विवाह कियाधा। सुनती हं कि यह्‌ श्रपनी पत्नी को बद्र प्यार फरता धा 1 पद्‌ सव स्वयं श्ास्धी ने मुभे कहा 1 परन्तु वही सुन्दर पलन द्मे दगा दे गमी, कौ जमीदारके साय मागर गयौ 1 उसमुन्देर नायै का फोटो प्रव भमी शास्थी के कमरे लगा है तुम हंसोभे यह सुनकर कि यदे व्यवित उस चिप्र पर कमी-कमौ माला चढ़ाता है, उसके समक्ष धूप जलाकर रपता दै +"

मधुकर ने सांस भरौ--नादान शास्त्री ! इसका पूरा नाम क्या

है?"

४२ पहुचानी हुई शक्ल

शुन्दनलात {' शारदाने कहा--एक वारर्मैने भी यह्‌ कहा, तो यह्‌ शास्त्री वौला-- यह्‌ मेरे मन कौ श्रास्था दै वह्‌ जिसके साथ ययी वह्‌ उसके रूप कौ प्यार करता होगा, परन्तु तो उस्नारी की भ्ात्मा को प्यार क्सताहुं।'

“प्रोह } नित्तान्त रहस्यवादी ! प्रर तुम्दारा क्या ?" एकाएक मधृकर ने प्रदन किया--^्तो तुमसे इस स्वरी का कंसे परिचय हो नता ¢.

शारद ने रजाईके श्रन्दर मधुकर का पकड़ा हुश्रा हाय छोड दिया श्रीर्‌ ग्रपते दोनों हाय वाहुर