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छाप धरा कफ प्रजदाश्शाए्काज (]] प्मटराइट का 2 | ४७ ज३ एच कि सी | ्ट) पष्ट खरड्ध | ८० ३७१:३/८ ०-

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वश | --6258२३-... प्रश्न संस्करण

गणपति छण्ण गुजर हारा श्षीलदमीनारायण प्रेछ, यनाश्य सिटी से झुद्वित |

920. -/ /[९?/75 /९552/ ८८

घूरय १॥) उपणा

महामण्डलके प्रधान पदधारिगण

-“-ञस/डभ्शिम्टस-+--त-+>«

प्रधान सभभापति!- ओआमान्‌ मदाराज्ा वद्दादुर दरभंगा। सभापति प्रातिनिधिस सा।- शोीमान्‌ महाराजा बहादुर कप्मीर | उपस'ापति प्रतिनिधिससाः श्रीमान्‌ गहाराज्ञाा वह्ठांदुर दीकमगढ़। प्रधान सन्नी प्रतिनिधि ससा- क्रीमान्‌ भानरेवल्न के, थी. सरंगए्वासी आयक्षर जमीनदार श्रीरंशम्‌ | सगथापति भनच्छी सं भा।-- श्रीमांन महाराजा बद्धाहुर गिद्धोड़ प्रधानाध्यत्तु,-- क्षीमान्‌ पण्डित रामचन्द्र नायक फालिया जमीचदार शानरेरी मेजिए्रेट, चनारल

घन्यान्य समाचार जाननेका पता-- जनरल सेक्रेटरी श्रीभारतपम्पेभ्रहापण्डछ, महामण्डठभवन, जगपसगंज, पनाण्य |

सूचना ध्रीभारतधर्म्म सहामएडलसे सम्पन्धयुक्त जाय्यमहिल्ाह्तितफारिणीमदा परिषद, भारय्यमद्दिला पत्िफ्ा, समाजद्दितकारी फोष, मदामण्डत्न मेगज्ीग ( अंग्रेजी ), निगमागमचन्द्रिकां, निभमागम बुकूडिपो, एरियन ब्यूरो, आय्य मछिलामद्दाविद्यालय, भ्रीविश्वताथश्नश्नपूर्णादानमाएडार, शास्रप्रकाश विभाग उपवेशफक मंहाविद्यालय प्यादि घिभागां से तथा प्लीमारतथम्म मषहामण्यख्तसे प्र प्यवद्दार फरने का पता+--

श्री कु 'सास्तधम्भेशलहालरुडल प्रधानकाय्योलथ, सद्दाधएरूलभदन ऊगदर्ग छ़, परधाश्ण।

भीधषिश्वनाथोी जयति फिश्वव्खीकल्पद्

अआ।चधुल्सबकट्यूलओआ थे

( पृष्ठसुण्डसम्बन्धीय विज्ञापन )

भोषिश्वनाथक्षी कृपासे इस वृद्दत्‌ अन्धरलका यह षछ्ट राणड प्रकाशित छुश्ा है। एस धर्मकारय्य्यमें अनेक दाधा रइनेपर भी अन्य प्रणेताफे साधु दद्देश्य ओए सत्पुरुषार्थ के फललले द्वी इतना शीघ्र यह्ठ खण्ड प्रफाशित द्ोसका | इस सगहमे दूस श्रध्याय प्रकाशित एए हैं। झागेके शध्याय भी प्रए्तुत हैं। लातव जण्डका छुपना भी शीघ्र प्रारम्भ होगा

विशेष धाशाज्षनक विषय यह है कि दया संस्कृत शिक्षित अध्यापक मण्ली, दया अंग्रेजी शिक्षित विद्यानगण, फ्रया धर्स्मानुरागी- जवेलाधाशण लज्ञनगण और दया हिन्दीप्रेमी स्वदेश॑द्वितेषिगण सभी एक्वाकय होकर एस घुद्दत ग्रम्थरलक्नी प्रशंसा फरते है ओर लाथद्दी साथ सभी इस प्रन्धरलफे पूर्णावयवर्मे प्रकाशित द्ोनेक्की ६उछ्धा प्ररटट फर्ते हैं। बहुतसे विद्वानोने जो अपनी शपनी अलग सम्मतियां भेजी हैं उनके घबुलार श्ध्यायोके न्‍्यूनाधिक करने और विषयोके पढ़ानेमे भी सहमत होना पड़ा है शोर संमुल्लाजोके क्रममें भी छुछ देश फेर फरना पड़ा है। अझय इस समुद्लालके समीक्षा लग्पन्धी अध्याय और पाक़ी हैं थे प्रछाशित फिये जायेगे और शन्यान्य प्रध्याय- समृद् श्रन्तिम दो लघुरलालोमे अ्रक्ाशित होगे। घएुतले बहुदर्शो सल्लनोफ्ी यह भी सम्मति है कि शन्‍्तमें एक या दो खएड शोर बढ़ाकर शाध्पात्मिफ कोप भी इसी मद्दान्‌ प्रन्धछे खाथ प्रक्काशित क्रिया जाय। उनकी यद्द भी लम्मति है कि हिन्‍्दीके लच लौघारण शब्द उस फोषमें द्ये जायें ओर जिन जिन भाध्यात्मिक शब्दौंके वर्णन इस छुद्दत्‌ प्रन्‍्थमें चुके हैं जोर आधेगे उनका फैचल एवाला भौर पृष्ठाड एत्यादि उव आध्यात्मिक शब्दोंके लामने दिया जाय और बाकी आध्यात्मिक शब्दोौका विस्तारित चर्णन भी उक्त फोषके खणर्डो में दिया जाय -भौर अपशिष्ट, शब्दौका साधारण चर्णन किया जाय। जतः पुले फोषका भी झबन्तिर कणडोएे समावेश करनेक्का विचार हो रद्दा है। ऐेला होने

( ४२)

पर यद्द चस्मफहपदुम घास्तवमें छिल्दीमाषामें चश्मेकल्पदुम दी वनक्षर मातृ- भाषाक्ी पुष्टि शोर शगतूर्ें सदातनघर्मछी ज्योतिरत अगानेमे पूरा सहायक बन सफेगा |

इस मद्दान ग्रन्थ के प्रधम दो सणडोके प्रछाशित करने तथा उनके छपानेके शनमग्तर जो जो शछुदिधाएँ शोर घनक्केश एए हैँ सो दूसरे खण्ठफे पिप्चापनमें प्रकाशित दो चुका दे | तीखरे जरडके प्रकाशित फरनेमे खुगमता ध्ीमती बड़ी महारानी साहेवा यक्षरामपुर क्वी उद्ारताले रही जिल्का पर्णन उक्त जण्डके विध्ञापमर् छतश्तापूर्व कफ प्रकाशित चुका दे। साथ ही साथ चतुर्थ सण्डके प्रखकाशित फरनेका भार भक्रीविश्वनाथश्रप्नपूर्णोादानमएण्डार पर छ्वी पड़ा था। भीविश्चनाथ फी कृपा से पच्चम खण्ड शोर यद् पछ्ठ खण्ड परमधार्प्रिका भारतघर्भलदमी खैरीगढ़राज्येश्वरी भीमती महारानी झुसथक्षुमारर देयी (0,8 9.7, प्र, (४०५-३७।०१७)४५) की झ्खीम ददारतासे प्रकाशित एशा रे जिसके लिये वे छिन्दू जातिके निकट धम्यधादाई हैँ | श्रीविश्वनाथ थीमती धाश्मिफा मद्दाराशीको दीर्घायु कर और उनको राजकुल-महिलाशोम धादशं धनाथ यही प्रार्थना दे

पूर्व नियमालुखार एस खण्छका भी स्वत्वाधिकार भ्रीभारतधस्ममद्दामएडल दे प्रधोन सब्चालकक पूज्यपाद धीशुरुदेयफ्ी आाज्वासे दरिद्रोक्की सद्दायताफे थर्थ धीविश्वनाथश्रप्नपूर्णादान मए्डारको शर्पेण किया ज़ाता है|

फाशीधाम | स्वासी विवेकानन्द्‌-- गंगा दशमी अध्यक्ष शास्त्रप्रकाश विभाग; सं० १६७७ पिक्रमी धीभारतघस्म॑मरहामण्डल्

& 9 बे हट जज दर 200

कक 2. पदक ही 4 मिट >>, 0.) ५> पंष्ठ खण्डकी विषय सूचो | पश्चदर ससुन्नास | वघिंपय साधाततरच

- सद्दामाया का शाधिंदेव रहस्य तथा उनकी परा झीर शपरा शक्तिका पीराणिफ लोक्िक्रशाषानुसार घर्णन ...

ब्रह्मशक्ति महामायादकी चार प्चस्थाप्रौफा चर्णुत

सप्ततती तथा सगवदगीताशे अनुसार परा और अपरा प्रसतिका वर्युन बा

वन्धमोक्तदायिनी झविद्या ओर विद्यासावका घणेन

मायासम्बन्धानुसार लगुणनिगंण ब्रह्ममावोका लक्षणनिद्‌श

मद्दामायाक्षे घिविध भाचालुसतार रझुशिस्थितिप्रलयलीलारहरुप चणुन

सप्तदाश निक्क शानभभियां के

त्रिश॒णतरत्त्व

शिमुणमयी प)्ररृतिक्ता लक्षण घणुन

तीनों शुणणोक्ता स्वरूप, परिणाम तथा फाय्यकलाप घर्णुन

प्रिशुणानुसार दान, तप, यध्ष कम, कछर्ता, भक्ति, श्रद्धा, उपासना, उपालफ, श्वान, बुद्धि घ्वति, प्रतिभा, पुरुषार्थ, भाननद, छुल्न ओर त्यागका लक्षण चर्णन

श्रिगुणाजुलार भयानक, रोचक और यथार्थ नामक त्रिधिध घचन, विधिध ऐपोराणिक भाषा तथा तच्रिषिध अ्रद्दद्वारों पा लक्तणघर्णन

जछचेतनात्मक जगतके प्रत्येक पदार्थ वधा भावोम तबिगुणफा लीलाधिलास घरुन

तीनो गुणोका पारणए्परिफ सम्पन्ध, लक्षण तथा विफाशक्रम पर्णोन

गणपरोत्ता तथा गुयाशुसार जीवगतिधिवेचन

घत्तुलार मायास्वरूप पर्णन

परष्ठ

१८६७-९६ ४१५

१४६७-- १६१० १६१०--१६१३

१६१०२--१&१७ १&६१४--१&६१६ १६१७---१६२१६

१६२०१-- १६२५ १६२७--१&७३२

१६३३-१६६७ १६३३-- १६३३

१६३४--१६४३८

१९६६३४---१६४७

१&६४८-- १६५०

१६५१--१&७&

१६६०--१६६२ १६६२०-- १६६५

( )

दिषप पुछु घिशुण्मेदाहुलआर उपाजना, विधिध छुचियां तथा भिमग्ुणांतीत

द्वोनेका उपायनिर्धा रण ... शी कप १&६५---१६६७ जिमादतत्त्व १६६८-१६६६ लाधनराशज्यमे भावक्की परमावश्यकता वरणुन शी . १&६८-- १६७० सश्टिदृ्शामें तथा परमात्माश्षे साथ भावक्ता सस्बन्ध घणुन १६७०--१६७१ घेदके काएडधयफे साथ भांवश्रयका सम्पन्धवण्णतन . ..- १६७१-- १६७३ भाषवैचित्याचुछार चित्तचृत्तियेचित्य तथा जीवजगसूमें

क्रियावेलितरय धुत... हर १६७३--१६७८६

कम, उपासना तथा ज्ञानयध्षम सावानुलार लिद्धितारतस्थ चुन १६७६--१६:१ सश्टिस्थितिप्रतयक्रियाके लाथ च्रिविधभ्ाव तथा शक्तिक्का

सम्बन्ध धुन हा का १६८२--१६८७ शुद़्भावफके आाधयलसे किस प्रक्तारले आध्यात्मिक उज्नति तथा

झजत्‌ घरत भी खंत्‌ बन सफती हे उसका एहस्प वणुन १&८४--१&&० कारणुन्रह्मके भावन्यातुसार काय्यंत्रह्मके प्रत्येक भन्ढमे

विभाधसस्वन्ध वरणुंस ... का का १६६०--१६६२ सुक्तिके साथ भावतत्वफ्ा सम्बन्ध चर्णुत्त ... शा १६६१--१६&३ कमंत्तत्त्द १५६६€६७४-५१०१७ कमात्पत्तिविध्यान तथा कम स्वझपवर्ण्न ... का १&६६४-- १६४६ कर्मके जेघच, ऐश, लप्॒ज नामक चिविच सेद्‌ तथा उच्लघे

प्रथक पृथक लक्तण॒वर्णु कर हा १६&७--१८६८६८ दामबीजरूपी संस्कारोक्का शिविध भेदवर्ण १६६७--६००४ तिधिध फर्मका घतियवहत रहएपवर्णन ... का २००५--२५० १७ सुक्तितत्त्व २०१८-२०६४ जीघमे सुमुच्चुभाषके उत्पन्न पोनेका फारण गा २०१८-२० १७ घुक्तिपद्वी या प्रतिष्ठा लाभका ऋ्रमवर्णुन ... २४०१६---५० २३ घुक्तिफे विषय धाोचीन पुरुषोका सन्देद्द निराकरण :४०२३--२०२७

कर्मापासनाशानभेदानुसार छुक्तिक्ता विधिध प्रकार भेद्वएँच._ २०२७--२०४० छुक्तिसे पुनः प्रत्यावत्तेन आदि शअर्वांचीन पुर्षोकी भनेफक

अखस्वद्ध युक्तियोका प्रमनिराकरण रे २०४१--२०५३ गायलप्तदराशतिक भूमियोके शद्ुसार सुक्तिका एदरूप निर्णय २०५३---२०६७ पष्ठ सझछुल्लास पुरुणाथे और चर्णाअ्रमसभीज्ञा २०६४-२०८४

पुरुषार्थ जलुएयफे साथ पर्णंचतुष्टयका ए्वाशाविक्त सम्यन्ध निर्णय *०« की से 5४०६७०--२०६६

(६ «४े ) घिषय पृष्ठ

सदातनघमेके जार पार्दोक्ता घणुन तथा छिंतीय पादरुपी विशेषधर्मक्ते प्रन्‍्तर्गंत वर्णाश्रमधमके लाथ जातीय

बीजरचाफा सम्बन्ध निशुय कर हम २०६७---२०६७६ वर्णाभ्रमधरम की साविभोम डपक्कारिता प्रद््शनवार्थ श्रीशम्भुगीतोक्त खऊपूच खिन्नवणुत कक २०६&६---२०७ ज्ीवक्की विविधगति, अभ्युद्य तथा निःश्रेयललाधनफएथम घर्णाध्रमधम की अननन्‍योपद्वारकाश्ति घोा्णन ... २०७४-२० ४९ पृथिषीफे यावत्तीय मनुष्य समाज्ञम चतुवेणयं तथा चतु्ेयणो का सम्पन्ध निदेश .. .#... ही हे २०८१-२० ४३ चतुर्षिष पुरुघार्थका लद्दय निर्णय २०८३-२०८७ दृशम समीक्षा २०८४--२११०६ दर्शनाक्ती मद्दिमा तथा र्वापाविष्ठ लप्तभेद्वरणंस गा २०८५-२०४०६ फारणकार्य झछूपसे सष्टिके सच चिभेद सप्तभेद््‌ पर्णुन ... २०८६-०२०६२ सप्तद्धानभूमि तथा लप्त अज्ञान भूमियोका वर्णन के २०६३-२०६७ सप्त दाशनिक्त शानभूमियामे छुम्तुत्ुकी उन्‍्ततिका क्रमचणन २०४&७-२१०२ दाशेनिक.विरोधाभासशक्लानिशाकरण.. २१०२-२१०६ झधघममध्यमोपत्तम अ्श्ञानसमियौफे लाथ पज्ायंतर लमणएत » दाशेतिक सिद्धान्तीका सम्पन्च घर्णुन कह २१०६-२१०७ सप्त प्श्नान भूसि तथा लप्त घ्वान भूमियाके प्रदशंक्त महाफाश . गोलकका पर्णन मा ही का २१०७--२१०७ धम्मेसम्प्रदाथ समीक्षा २११०-२१२७

श्रीखनातनधर्मका करपतरु की तरद्द लावंभौम स्घरूपचर्णंन_ २१११०--२११६ शानराज्यधिस्तारधर्णंव ए्रसज्मे पझच पुरुतफ्ोंका सस्पन्छ-

कथन प् बे शत २११७--२११७ घमंलस्प्रदाय, घर्मंपन्‍थ और घर्ममतोंके पृथक्‌ पृथक््‌ लक्षण

यर्णन के २११६--२१२० धर्मेलस्प्रदायों का वेदिक आधार तथा घिएतारित ध्वझप

धदाथरा ४: २१५००-२ १२३ सगण पञ»चोपासलनाफे ८एश्यघर्णु नप्रखधमे पञच सम्प्रदायों

का अभिष्न लदय निर्पण मल मा २१२०३--२१२७ धर्लेपन्‍ण सभीणा २१ शधध-११४४ धर्मेपच्थका! जत्तण वथा वत्पच्तिका कारण निर्णय... २१२५४८--२१२६

पप्तानः्दी पष्थक्षा संक्षिप्त रपिदहदास ही हल २१२७--२१३१

सिषय

फबीरपन्थफा संत्तिप्त इतिहाल

दादुपन्थका संत्षिपत इत्तिद्दाल ...

शाम िलभेट्टी पन्‍्थका संक्षिप्त इतिहास

पाऊउल पन्थका संक्षिप्त इतिप्ताख

गोरणापन्थफका! संक्षिप्त एइत्तिएांख

नानक पन्‍न्थका संत्तिप्त इतिहास

रामदाली पन्थफा संक्षिप्त इठिद्दस

ल्लिज्ञयत्॒ पन्‍्थफा संत्तिप्त एसिहास्

एधामीनारायण पन्धका संत्तिप्त एइतिदाल

दखनामी पन्थक्का संक्षिप्त इतिद्वाश्त

धरमसत समीक्षा

घर्मंमत लक्षण तथ्य सभी घर्ममतोका अन्तिम लक्ष्येकत्व यणुन कर हा दे

सनातनधम के उदार लिद्धान्तके भीतर ईलाएं, यहूदी, सु सल्न- मान, योद्ध, जेन आदि सभी धर्ममतों फा शनन्‍्तभाष ष््थन रा

घिशेषध्मराज्यम॑ विरशेधामास निराकरण

छुलख्मान धर्ममतके खाथ आयेघम फी भक्ति झूदि घिषयसे शाॉंशिफ एफसापघणुन

धार्यचर्मके साथ यहदी घमंमतफा भांशिफ सिद्धास्तलांमञज्ञ-

स्यवणुत

इसी प्रपार पार्सी धममतफे साथ झलिख्यान्त लामञ्नण्यक्ता घरणुन हा

जमातनपघमकफ्े साथ ईसाई धम्मंमतक्का शंशिफ छफिद्धान्त समन्वय नियय

लम्ांतमधरमफी सावभोम उदारताफा दिग्दुशेत

छ्छ २१३१--२१३३ २१३४--२११५ २२१३७--२१३६ २१३६--२१३७ २१३७--२ श८ २१२८--२११ ३८६ २१४०-७२ १४० २२४०--२१४२ २१४२--२१४३ २१४४३--२१७४७

२९५४३४-२१५४५

२१४४--२१४५ २१४६--२१४८ २१४:८--८१ ७७ २१४०--२१५६१ २१४१--२११५४२५ २१४२--२१५३

९१४३--२१५४४ ६१७७--२१५५

आतत्सताू | शा प्री ष्ट तो रे नमक (रू पूल | 2 के विज >+ौ४ २०७३-८7 ८७-८::४७४६-..+४: )).4% -

पञ्मण समुछाल

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अजि तत्व | री एल 24782

श्रात्मतत्व और जीवचत्त्व नामक श्रध्यायोमें बह दिखाया जा चुका कि सायाके वभवसे ही ब्रह्मसाव और ईश्वरभाव इन छोनोंका पार्थक्य तथा बिशड्भाषकी लीलाका पिल्‍्तार अद्भुमवर्मे जाता है श्रीर जीवका जीवत्व भी मद्दामायाके कारणले ही प्रकट है। जगज्ञननी मद्दामायाको चेदान्तशास्र्म माया कहते हैँ। अस्तु, प्रायः तीनों सीमांसादर्शनोने एक्मत दो कर उनको माया नामसे दी अभिद्दित किया है। खांख्य शोर योगशार्ने उनको ही प्रकृति नामसे अभिद्वदित किया हे अन्यान्य शा्खोने उन्हींको शक्ति नामसे वर्णन फ्षिया है किस किस दर्शशशार्रने महामायाके स्वरूपकों किस प्रकारले पज्ञुभछ किया है इसको चरण कश्नेसे पहले दो पोराणिक गांधाएँ नीचे दी जाती हैं उच्च दोनों गाधाश्रोक्ते पाठ करनेसे पुराणकी शल्रोक्किक् वर्णनशेल्री 0 महामायाफ्ता छर्वोंपरि अधिदेध रहस्य तथा उनकी परा ओर अपरा शक्तिका लौकिकभाषा- पूर्ण बरणन प्रक्कट छोगा। पूज्यपाद महर्पियाँने एस शतिगद्दन दार्शनिक विषयफौ केसी सरल रीतिसे जिश्वछुश्नोंके हृद्यज्ञम करानेका यत्न किया है सो निस्नलिसित्त घरण्णनोसे प्रछकद है। पदला घिपय सुप्रसखिद्ध दिवीभागवत् अ्न्थर्म ऐसा कहा

गया है :--

१ए&८ श्रीषर्म फएपहुम

ब्रद्मोचास-- एकमेवाडह्ितीय॑ यदुऋह्म चेदा घद्न्ति जे सा किं त्व॑ वाध्प्पसी वा कि सन्देहं विनिवच्तेय नि।सशर्य मे मे चेत। प्रमवत्याविशज्लितम बिल्वेकत्वविचारेशस्मिन निमस् कुज्ञक॑ सना स्वसुखेनाएपि सन्देहं छेत्तुमहेसि सासकस पुण्ययोगाच्र मे प्राप्ता संगातिस्तव पादयों। भ्रोश्नझ्नाजीने कद्दा कि चेद एक अहछितीय ब्रह्मछा प्रतिपादत फरते हैं सो , धंद् प्र॒ह्ष ग्रापदी है वा वह ब्रह्म कोई और दे, इस मेरे लन्देहको निन्ुत्त फर। मेरा सशहू चित्त निस्लन्देद नद्दी हो खकता है, छित्व ओर एकत्वके विचारफे मेरा छुद्र मन निमश्न है| अपने मुखसे मेरा यद्द सन्देद्द आप निदवृत्त कर सफ्ती है। मैंने पुर्योके योगसे पापके जरुणौका सह पाया है। पुमामासि त्वे स्री वाशइसे वद्‌ विस्तरतों सस ज्ञात्वा$हं परसां शक्ति छुक्तः स्पा सचसागरात्‌ ॥| शते पएथड्ा सभा देवी विनयावनतेल च। उवाच वचन कच्णसावबया 'सगवती हि श्ा॥ देष्ियुधाच -- सदेकत्व॑ भेदोषस्ति सब्वेदेव ममास्य योष्सों सापइहसह योज्सों भेदोशस्ति सतिवेश्रसात आ्राप पुरुप हैं या स्त्री हे यह विस्तारपुथ्वंक कहे जिससे में परमा शक्तिका ज्ञान प्राप्त फरफे भवसागरले घुक्त हों ज्ञाकँ) इस प्रकार चिनयपृष्येफ नप्त प्रोफ़र शेने भगसचीसे ग्राथेता की, तव उन्त श्याध्या भगपतीसे सुस्धुर घाणीसे थ्राप्ा की ' हस पुराणोक्त क्षोकिक भापाफे अल्ठसार मनह्यामगव्यी-सम्बाइक्का एएस्य समभनके लिये यहांपर इतना फट देता बचित होगा कि एक त्रह्माएडफे सलमष्टि झ्तःकरणके शधिष्ठातृ-देव जह्मा है ओर परम ब्रह्मकी शक्तिको शास्ोर्से सगवसी भद्दामसाया करपो धर्णत किया है। एस दोसों प्यधिदेश खरपॉफा रहएस स्ित्तरं रखनेसे इस गाथापे रहत्यफो सलमभनेम सुगमता होगी भ्रीन्नह्माजीक्रे

आयातरच | ष्ध्ड्द 23३3 लनन्‍ने स++-_+_+>+9+ 5८००५ -+ ८-4२ + नल 3 ५२५99 ५००५-८५ 5523 >5 533८-33

प्रश्नक्ते उत्तरमें भगवती बोलीं, मेरा और व्रह्मका सदा एकत्व है, कभी भी कोई भेद्‌ नहीं है, जो वे हैं पद्दी में हूँ और जो में हूँ चद्दी वे हैं., केचल वुद्धिधिश्वमसे भेद प्रतीत द्वोता है। इन वचर्नोका तात्पय्थ यद है कि जैसे कोई घक्का फद्दे कि सुभमे और मेरी वक्तताशक्तिमें कोई भेद नहीं है क््योफि पक्तुताशकिक्रे अभाषसे वह वक्ता, वक्ता-शब्द्धाउय नहीं हो सकता, चद्तुतः उस चक्तार्मे ओर उसकी वक्तताशक्तिम॑ अमभेद है; ठीक उसी प्रकार “अहंममेतिवत्‌” ब्रह्म और अह्यशक्तिमे श्रभेद है। दोनों द्वी एक है, एक्क ही दो हैं आंवमोरन्तरं खत्म यो वेद सतिसान हि सा विछुक्त; तु संसारात छच्यते नाउम्र संशय: ॥| एकमेवाउकितीय वे ब्रह्म नित्य सनातनम दैतसार्व पुनयाति काल उात्पित्सुसंज्ञके यथा दीपस्तथोपाधेयोंगात्संजायते 'द्विधा छायेवादशमध्ये वा प्रातिब्िम्ब॑ तथावयो! ॥| इम दोनोंका जो सूदम अन्तर ज्ञानता है वही बुद्धिमान है और बची संसारसे मुक्त द्ोता है यह निःसन्देह है। पक अद्वधिवीय नित्य और सनातन ब्रह्म ही खष्टिकालमें द्वेत भावकों प्राप्त होते हैं। जैसे दीप उपाधिके द्वारा छायाके सम्बन्धसे प्रकाश अन्धकार झूपसे दो भावषमें प्रतीत होता है और जैसे काचमे प्रतिबिस्व दिखाई देता है वैसे ही हम दोनोकी प्रतीति द्ोती है ! भेद्‌ उत्पत्तिकाले वे सगोथे प्रसवत्यज | दृश्याद्श्यविनेदो5्य द्विधष्ये साते सब्वेधा ना5हं स्त्री पुरमोंश्रा5इहं क्लीव सगगर्स॑क्षये सर्ग साति विभेद्‌ स्थात्‌ काल्पितोज्यं ।धिया पुनः अह वुद्धिरहं श्रीक्र घ्वाति! कीर्ति! स्थानिस्तथा अद्धा सेधा दया लज्ञा जुधा दृष्णा तथा क्षमा दे ब्रह्मा | उत्पक्तिके समयमें खश्टिके अर्थ ही भेदप्रतीति होती है, यह एश्य और अच्श्यका विभेद्‌ छ्लेतमावषमें दी सब्ब॑था होता है। तात्पय्य यह है कि सश्टिदशामे ब्रह्म-श्र ब्रह्मशक्ति वैसे दी स्वतन्त्र।? रूपले प्रकट दोते हैं जैसे कि पत्कूता देते लमय वक्ता और वक्तृुताशक्ति अलग श्लग प्रतीत होती है और

१0४० शआजमवादफट्टुस 2नयत-----9-3य+033५०७७७ - ३५७:%+०५००७५- -कहक, |. रमाानया: हि कया 4५५०७ ००००३ ००० ामिकिकर "भरी वक्तवाके अच्त्म बक्तताशतच्ति 0 3३ भ्छ्े पं करीच वतन खिल कस्लि मे ख्रीनहीं हूँ, में पुरप नहीं हैँ, और क्लीच हूँ, केबल सणिकालमें दही बुद्धि थे च्््को रू | + हि 5०4 ध्् ब्स्म्गा है। सश्दिशाम मे ब॒ुक्धि है, से श्री हूं, घ्ति,

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डबल >> हट 5 ६० , - वन्य प्र काम गाथ हो जाती हैे। घलय हो ज्ानेपर 2] हि

५९ १। (्‌ः

ग़रा कहिपत थह सेद्‌ दोता शीणि, व्छूदि, धद्धा, सेचा, उथा, लज्ा, जुधा, तृष्णा तथा ज्षमा से फकाएन्त! शान्ति! पियासा' निद्रा तन्‍्द्रा जराज्जरा विद्याडविद्या स्ट्हा वाञ्छा शक्तिशा्शक्तिरेव वसा सज्जा त्वक्‌ चाउहई दइष्टियोगढता ऋता परा सध्या पश्यन्ती नाब्योड्ह िविधाओ था। कि नाउई पश्य लखारे सह्ियुत्त किसास्ते हि। सब्वेसेचा5दमित्य्व निश्चर्य विड्धि पद्मज !॥ ध्ान्ति, शान्ति, पिपासा, निद्रा, तन्द्रा, जरा, झजरा, विद्या, अविद्या, ए्पृद्दा, चाज्छा, शक्ति शोर अशक्ति में ही हूँ | में चला, मजा और त्वक्‌ हैँ, दृष्टि, अमृता ओर ऋता वाक्‌ , परा, मध्या ओर पश्यन्ती एवं थिधिध प्रकारकी नाडियां में दी हैँ देखो संसारमे मे प्या नहीं हूँ , सुझसे रहित पया है हे चर ! में द्वी सब हूँ इस प्रकार का निश्चय जानो | एलेसे निशेत रूपेचिंद्दीन॑ कि वदरद से तस्मादह जिधे ! जाशइस्मिन सर्ण वे वितता$लचस नूने संब्वषु देवेपु नामानासधरा हछहस मंवासि शाक्तिझपेण करोमे पराक्षमम गोरी ज्राह्मी तथा रोदी वाराही बैष्णची शिवा वारुणी चाउ्थ कोबेरसी मारखित्ी वासवी || मेरे इन मिश्थित रूपोले रह्चित फया है लो सुभले फ, हे ब्रह्मा ! इसी फाश्ण में एस संसारम प्यापक हैँ | सब ऐवताओम में नावारुपथरा हैँ ओर शक्तिकपसे पराक्रम फरती हूँ | गोरी ज्राझ्ी रोदी घाराही पैष्णघी शिवा घायणी फौयेरी नाणसिद्ठी शीर घासवी में ही हूँ | उत्पन्नेषु समसलेषु कार्य्येणु प्रचिशारी तान। करोमि सब्वेकाय्याणि निमित त॑ विधाय ने

भायासर्ध | १६०१

जज सन क्योफिस पाक किए रण यो कल.

जे शोल हाथा' बहादाज्यय ज्यादादवाकर।

सलेशानाथ दस काश प्रसवाने यथा तथा |

या त्यक्त चिध ! कून स्पान्दत या क्षम मवले।

जीवजाल संसारे निर्यो्ट छुवे त्वाथे काव्य झे उत्पक्ष दोनेपर इस उक्त झूपामें प्रवेश करके उन का्थ्योको ही निमित्त ऋरके सब काम करती हैँ | जल्‍मे शेत्य, आग्निम ओष्एय, सूथ्यम ज्योति शरीर चन्द्रमाम॑ प्विमझपा, इसी प्रकार जैसेमे तैसी में ही बन जाती हूं दे ब्रह्मा ! मेरे परित्याग करनपर खंसारमे जीबमात्र चेणा कऋरनेम भी अलमर्थ होजाते हे, यह में तुमको निश्चय झरूपसे ऋद्दती हूँ अशक्त। शक्घरों हन्ते देत्थाल (किल समयोजिकित; शक्ष्तिहीन! मर छले लोकश्लवालिद देलस ज्द्गहीन (विष्णहीय था चदानति जना। किल शाक्तिहीन यथा सर्व प्रददान्ति नराधसस पाॉलित) सखालिता 'सीत। शान्त! शच्रुवशंगत! ७५० (० कद 39. अ्च्पत्त्त प्राच्खप त्र्तल्ा पा प्य [हर स्द्र, क्या ज्प्‌ कध्यत | | मेरे छोड देनेपर शहर देत्यौको मारनमें छासमर्थ दे, संसार शक्तिहीन मनुष्यको अतिदु्य ता है। उस नराधमको मनुष्य शक्तिद्दीत दी कद्दते दे सद्रदोन था विष्णदीस नहीं कददते | पतित, फिसला छुश्ना, सीत, शास्त भोर शत्रु फे पशमें गया हुमा मनुष्य संलारम शशक्त कद्दा जाता है, अरुद्र नहीं कटद्दा जाता

नंडिद्धि छारणं शाकियथा त्व॑ं सिख्तत्ञुमि | मविता यदा यक्त! शकत्या ऋत्तो तदाणखिलमस यथा हरिस्तथा शम्सुस्तथेन्द्रोौषवष वचिमावखु;

शशी खरय्या यमरत्वर्टा चरूए। पवनस्लथा

धरा स्थिरा तदा धते शाक्तिय का यदा मवेत्‌। अन्यथा चेदशतक्ता स्थात परसाणोश्च धारणे ॥|

झतः शक्तिक्ों छी कारण जानो इसी दश्द्व तुम खझष्टि करनेफी इच्छा करते हो तो हब तुग शक्तिसे युक्त होगे तद सब संखारकी सरूष्टि कर लफोणे।

२१७०२ चाधमदकझरजपद्प।!

एसी तरह हरि हैं। शग्म इन्द्र अ्श्नि चन्द्र सूय्य यम त्व्ा चरुण और पधन भी पैले ही है। प्रशथिवी तथ स्थिर हो कर धारण करनेमे समर्थ होती है जब चष्द शक्तियुक्ता होती ऐै, थन्यधा एक परमाणुके धारण फरनेमे भी अशक्ता पोती

यथा शपस्तथा क्ृम्सोी ग्रेष्न्ये लत दिग्गजा:

मद्यक्ता वे ससमथाश्च स्वानि काय्याणे साधितु

जल एपेवामि सकल सहरा|ने विभावस

पवन स्तम्ससास्यतद्य यदटिच्लासि लथाचरम

तत््वानां चेच सदंपां कदाशपे कमलोड्भव !।

असता सावसनदेह! कत्तव्यो कदाचन ।॥|

इसी तरद्द शेप, कम ओर अन्य सब दिग्गज शक्तियुद्ा दो कर द्वी अपने

दाम्मोके साधन फरनेमे समथ होते द्े। यदि मे चेसा करने की इच्छा फरूं तो श्याज्ञ सब जलकफो पीजाऊं, शम्मिका खंदार फरले घोर पवनका स्तम्भन करलें। हे च्रह्मा ! प्खत्‌ झूप सब तत््वोका कदापि सावरझप सन्‍्देद् नहीं करणा चाप्विये |

कदाचित प्राशसाव; स्थात प्रध्दझासाव एवं वा

सात्पिण्ठेप कपालपु घदासावों सथा तथा

अद्याध्ज एॉथनी सास्ति कब गताते सिचारणे

सम्जाता हाते विज्ञया अस्पास्तु पराणवः

शाश्वत क्ञाणिक शून्य एित्यापनित्स सकतेकमस

अहड्गराडगश्रिस चेच सप्तसेदेव॑बक्तितस जैसे मत्पिएड ओर कपालाम घटाभाष द्वोता हे देसेद्दी तत््वौक्ा भी

प्रामभाव घोर कभी प्रध्यंसाभाव एशथ्ा करता दे। प्याज यहां पृथिदी नहीं दे पुथिषी कहां गई ऐसा विचारते द्वी पृथिदीके परमाणु उत्पन्न हो जाते हैं। यद्द जगत शाभ्दत, द्चणि कफ, हात्य, नित्य, पनित्य, सपतृदक ओर प्म पादिमे सिसफे: इस प्रफारसे सात भेदौसे घर्गन किया गया हे

गहाणाज ! महत्तत्वमहड्डगरस्तदल्ूवः

लत। सब्वाणे भताने रचयस्व यथा पुरा

व्रजन्तु स्वानि धिष्ण्याने [विरच्य निवसन्तु व!

सस्‍्वाने स्वाने काय्याणि छुब्वेन्तु दबभाविताः

मायादच्य | १६०६

शहाणेमा विधे | शक्ति छुझप३ चारूह्मासिनीम महासरस्वती रजोशुणयुता वराम्‌ है ब्रह्मा | महत्तत्वकी ऋहण करो ओझोर उससे उत्पन्न अदृडद्ारको भी पदुण करो तब जेस पृथ्वे समयमे थे चैसेही सब भूठोकी रजना कण्ते | तुम तीनों जाओ क्र अपने आपने सोक बना कर निवास करो एवं देवफे हारा भाषिद पोक्तर अपने अपने काय्योको करो छेन्नह्मा ! इल शक्तिको अद्ण करो, वह छुझूपा चारुद्यालिनी श्रेष्ठा ओर रजोशुणयुता सरस्थतीनाज्नी हे शवेतास्वरघरां एिवयए पिव्यभूषणभ्पिताम वचरासनससारूढं क्रीडाथ सहचारिणीम | एया सहचरी एित्य॑ साविष्पालेि वराजड्नना। साउ्वमंस्था विज्यालि मे सत्वा पूज्यतमां प्रियाम गच्छ त्वसनथा सार सत्यलोक बताशु ये वीजाचतुर्निध॑ सब्बे समुत्पादय साम्पतम॥ यद्द श्वेतास्बरघरा, दिव्या, दिव्यभूषणभूपिता, श्रेष्ठ आलनपर समारुदा और क्रीडाके लिये सहचारिणी छे। यह वराहइ्ना नित्य तुम्द्रारे सहचरी होगी, तुम इस मेरी विभूतिक्ों पृज्यतमा ओर प्रिया समभकर अपमान सत छरना। तुम श्लकों साथ लेकर शीघ्ष सत्पलोकको जाओ ओऔर बीज जो पघिधमान है उससे अब सब चतुर्विधा सष्टि उत्पन्न छरो लिज्ञकोशाओ जीवस्ने! साहिता। कम्मामिस्तथा चच्तन्ते सास्थिता। काले तान्कुझ त्व॑ थथा परा कालकस्मेस्वसावाख्ये; कारण! सकल॑ जगत स्वभावस्वगण॒णैयुत्त॑ पूृड्वेबत्सचराचरम' सासनीयरत्वया िए्णु) पूजनीयशा खब्बेदा सक्ततयुणप्रधानत्वादाधिकः श॒ब्बतः खदा' जीव और कस्मक्ते सहित लिइकोप कालमें विद्यमान हैं उनको पूथ्धधस उत्पन्न करों। काहा, कर्से और स्वभाव सलामफ फारणोंसे सचराचर सकल जगफफो पूर्व्दंघतू खभाव और खगुणोसे युक्त करों सत्त्पुणप्रधान दोनेन्दे कारण लिष्य बसे अधिक दे शोर लदा सब्बंदा तुम्हारे द्वारा माननीय और पृडमीय हैं

हर

१६०७ श्रीक्रम फल्पत्ु

रच कि

यदा थदा हे कायणे वो मविष्याति दुरत्यसस्‌

कारष्याति प्ावित्यां ने अवतार ददा हारे!

तिय्पेग्योनावथान्यञ्ञ साठयी तछुसाशित!

दामवानां विनाश वे कारिष्याति जनादम।)

मचो5्य ते सहायरश्च सत्रिष्याति सद्दावल!)

समुत्पाद्य सशन्सवोन धिहरस्ष ग्रणारुखस

जब जब तुम्दारा दुरत्यय फाय्ये होगा तव तब किष्सु पूथिचीम प्रवतार

भारश करेंगे। तिय्येग योनि अथवा मलुष्प शरीर धारण करके विष्णु दान- वबोका नाश करने | ये मद्दावलशाली शिव भी ठुम्द्वारे सहायक दोगे, तुस सब्र देवताश्रोकों उत्पक्ष करके यथेच्छ घचिह्दार करो

ब्राह्मणा! चजन्निया वेश्या नानासज्ष! स्मदक्षिणे!

याजिष्यन्ति विधानेन सब्बान्व! खुससाहिता:

मन्नासोचारणात्सव्दे मल्लेपु सकलेषु च्य।

सदा तृसाओ सनन्‍्तुष्या 'साविष्यध्द खुरा। फकिल

शिवश्षसाननीयों ने सब्जेधा वन्‍लसोग॒ुणा

पन्चकाय्थपु सब्बंयु प्रजनीय: प्रयल्लत।

ब्राह्मण क्षत्रिय श्रोर बेश्य, लमादवितचित्त होकर तुम स्वोफ्ा खद-

ज्षिण नाना यछोल्षे द्वारा विधिपूव्वेक्त यंजन करंणे। सच देवता लोग सफल यम मेरे नामोत्चारणले सदा ठप मोर सच्तुषठ होगे। तमागुणाधिष्टाता होनेसे शिव सब यश्ञ कार्य्योर्मि सब्बंधा माननीय भौर प्रयत्नपूर्व्यक पूजनीय हें

घदा पुन) खछुराणां वे सय॑ देत्याद्धविष्याति

शत्तयों मे तदोत्पन्ना हारिष्यमन्ति खुविश्रद्दा।

वाराही वैष्णबी गौरी नाराखिद्दी सदाशिवा।

एलताओआह5च्याओ काय्याएं कुर त्व॑ का्तलोहूच |

तवाक्षरसिस सब्ज बीजध्यानयुत सदा

जपन सद्याणि काय्योाएे कुछ त्वे कसलोझूज !

भायातरवच १६०५

जब फिर देवताशोको देत्य से भय द्ोगा सछ उस भयको खुण्द्र खिगम्रमए धारण फरके उ-पन्न हुई मेरे शक्तियों दरण करंगी। घारादी, कैष्णपी, गोरी, सारखिद्दी ओर रूदाशिवा पव॑ श्रन्पान्य शक्तियॉ उत्पन्न दौगी, दे ध्र्ठा! तुम अपने काय्वेका कर हैं ब्रह्मा! खदा बीज जौर ध्य नर्संयुक्त इस रचादाए मम्धफों जप फरते हुए तुम सच छाय्योंकों दर प्रन््राणामुत्तमोष्य वे त्वं जानीहि सछामते ! ! अदसे ले सदा भाय्ये! सब्येकासाथसिद्धमे इत्युत्त॒वा मां जगन्पाता हरिें प्राह्न शुनिस्मिता विष्णों ! ब्रज ग़ह्ााएेशा सहालचर्सी सनोहरास सदा चक्ष/रथले स्थाने साविता माउच्र सेशयः ऋडाथ ने सया दत्ता शाक्ति।! सब्योधदा शिवा महामते | रखलक ठुम मन्धोमे उत्तम मन्त्र जानो और तुम खथ फाम शोर श्र्थोक्ती सिद्धिके लिये सदा हृदयमे धारण कसे। ब्रह्माजी कछते हैँ फि पुकछो इस प्रकार कहकर जगनन्‍्माता मदह्ामाया पवित्र और मन्द मम्द्‌ छास्य करती एुई विष्णुणी आ्राणा करने लगीं, हे विष्ण |*जाश्ो हुस मनोहरा मएा दमीको ख्दण करो | मेने क्रीडाके लिये यद्द सब्चार्थंद्रा मढ्ल”पिणी शक्ति ठुमक्ो दी दे, ०द्द चुम्दा सदा चक्त.स्थलमे रहेगी यह निःसन्देह है त्वस्रेस सलावसम्तव्या साननीया सब्वेदा लब्मीनारायणाख्यो5य थोगो वे विहितो सग्रा जीवनाथ कला ग्रज्ञा देवानां सव्वेथा समा आविरोधेन सल्लेन बर्तितव्स ज्िमि। सदा | त्व॑ं वेधा। शिवस्त्वले देवा सदगुणसम्मवाः

सान्या एज्याश्व सर्व्चेप साविष्यान्ति ने संशय! इसका तुम अ्रप्तान मत करना, खदंदा इसका मान करना, मेगे यदलच्मीनारायण योग छिया है मैंने सर्वथा देवताशोके जीपनोर्थ पी यक्षोकी सष्टिफी ६. तुम तीनो रूदा विशेधरदित संगसे बर्ताव फरमा चाहिये। तुम, ब्रह्मा शोर शिव, ये तीनों मेरे शुणोसे उत्पत्न एुए देपता हैं ग्रतः सवो्के माननीय शोर पूजनीय मे यद्द निःसंदेद्द है

१६०६ जीघरगंकर्पद्ठुस |

मा नम ये विभद कारिज्यान्ति भानवा सूबचेतसः पमेश्य ले शाशिप्यसान्ति विभेदाज्ञापज सशसः यो हरि; भा शिवा साक्षात्‌ था शिव; स्वयं हरि एलसोजिद्आातिछम मरकाय 'स्वेज्ञर। तथ्य इहिणोः क्यों नाउनच्न काय्यों विचारणा अपरो गुणमेदोउएस्ति #णु विष्णो ! त्रवीसि ते जो मूढ़चित्त पुरुष एन तौनोमे भेद करगे ये उस भेदके करनेसे तण्फमे जावंगे, इसमें फोई संदेह नहीं है जो दरि हैं घेदी साक्षात्‌ शिव है झौर शो शिव हैं वेही स्वयं हरि हैं। इने दोनोमे जो भेद देखता है वध नरफमें जाता है। इसी तरह सहायाको भी जानना चाहिये, इसमें फोर विचार नहीं फर्ना चाहिये. देविष्णों) झौर भी सुणभेद है उलफो खुनों में तुमझो फहती ६। मुख्य: सत्त्वगुणस्तेःस्तु परमात्माविचिल्तने गौणत्वेजये परी ख्यातो रजोग्रुणतमोरुणो लक्षम्या सह विकारेषु नाना भेदेषु सब्वेदा रजोग्रुणयुतों भ्रूत्वा विहरस्वानया सह ॥| वाग्बीज कामराज साथाबीज तृतीयकम सम्त्रो5्य त्व॑ रम्माकानत ! महल! परमाथद!ः परमात्माके चिंतनमें तुझारा सत्त्वग्रुण मुण्य दोगा और सजोशुण तथा तमोगुण गौण रहेंगे। विभिक्ष प्रकारंफे विकारोर्मे रजोगुण्युक्त पोकर एस लद॒मी के खाथ सब्बंदा विद्वार करना। बाग्यीज फ्रामवीज प्योर तीखशा मायाघीज, इस मेरे दिये छुए परमार्थप्रद्‌ मंत्रफों दे रमाकानत ! अएण प्रो गहीत्वा जप ते नित्य विहरस्व यथासुखस ते सत्युभथं विष्णो-! कालप्रभव सयम्‌ ॥| घावदेष विहारो मे मविष्याति खुनिश्चया सहरिष्याम्घह सब्वे यदा बिश्वे चराचरम्‌ पचय्तो'जणि तदा नूतन मायि लीना भविष्य व्मक्तैब्यो5य सदा मन्‍्छ। कामदों मोक्षदस्तथा

मायातरदच १७६०७

एस संत्रको अदण फईरके नित्य इसका जप फये श्रोर यथेच्छ चिद्दार

करो, विष्णों | जवतक्ूत मेरा यद्द विद्वार रहेगा तुमको झत्युक्रा भय और फाजसे उत्पन्न स्य नहीं रहेगा, यह निःश्चयहि जब से एस चराचर सब

विश्यफा संदार कझंगी तुम लोग भी उस समय निश्चय दी सुझकग जीन दो आ्ोगे | यह कामप्रद और मोक्तप्रद मंत्र सदा जपना चाहिये। उद्बीयेन संयुक्त: केब्य। शुसलिच्छता कारायित्वाध्थ नेकुणठ चसलव्य पृरयोक्तस [ वघिहरस्व यथाकास चिंस्तसन्सा सलनातनोभ्‌ ग्रह्मोघ्ाच ! इत्यक्त्वा वाखुदेव सा जिणुणा प्रक्ृाते। परा निभेणा शह्वर॑ देवमवोचदस्त बच; देव्युचाच हे. # 5५% + हर गहाण हर गारा त्व भहायक्ाला सनाहराभ्‌ | क्रेलास ऋाराणित्वा विहरस्व यथासुखस सुख्यस्तमो गुएरते तु गाणा सत्त्वरजोयणां विहरासुरनाशाथ रजोगरणलमोगुणा तपस्तपूतुं तथा कतु स्मरण परसात्मतः ॥| शब् ! खत्त्वसुणः शान्तों ग्रद्दीतव्य/ सदाष्नघ | सब्वेथा जिगुणा यू्य ऋाएस्थित्यस्तकारका। शुभेच्छु व्यक्तिको इस मन्त्रफे खाथ उद्बीधक्ा संयोग करके तव श्सफो जञञपना चाहिये | है पुरुषोत्तम ! चैकुएठ वनवाफर वहां तुमको रद्दना चादिये श्रौर मुझ समातनी को स्मरण करते हुए यथेच्छ चिद्दार करना चाहिये प्रक्ताज्ीने फदा कि इस प्रकार विप्णुद्नों कददफर वह चिग़ुणा और निर्गुणा परा प्रकृति महामाया अम्तत समान वचन शिबवदेवले अप ऋश्ने लगीं मंष्ठा- मायाने नक्क्द्ा कि हे दर | सम इस गदा क्राह्ती सनोठ़्या सोरशाफों ग्रहण क््श्ने और कैलाल बनवा कर यशेच्छ चिद्ार करो. छुम्दारा सुख्यगृण तमो- गुण दोंगा और सत्व तथा रजोग्रुण गौण दागे। प्रखर्गेड़े नाशके अर्थ रजोश्ण पौर तमोगुण का व्यवद्दार करना, परन्तु तपस्या फरनेक्े लिये तथा परर्मा-

१६०८ धीचर्मकल्पद्ठम

समसाका स्मरण फरनेके लिये दे अ्रनघ शस्भो | सवा शान्त सरवग॒रण प्रहएण करना। खश्स्थिति और लय करनेवाले तुम तीनो त्रिगुणात्मक हो

एशिविहीन संसारे वस्तु नेवात्र कुजचित |

वस्तुमाज तु यद्रुश्यं ससारे जिग्ञुणं पि तत्‌

दृश्यं निगुणं लोके भूत॑ नो सेविष्याति

निग्ुण; परसात्लाञउ्सौं तु दश्यः/ कदाचम

सथ॒णा निशेणा चाहं समये शह्चरोक्तमा

सदा5ह कारणं शम्सो ! मच काय्ये कदाचन ॥|

इन सीना शुणोसे रहित इस खंखारमे कहीं सी कोर सी बचत नहों हे,

टश्यवस्तुमात्र इस संसारमें त्रिशुणात्मक हैं निर्गृण दृश्यचदतु इस संलारफमे एुई है और दोगी, परमात्मा निर्गुण हैं परन्तु वे कदापि दृश्य नद्दां हैं दे शहर | में समयानुलार सशण श्रोर भ्रष्ट निर्मणरूपा होती हूँ, हे शम्सो ! में सदा फारणरुपा हूँ, काय्सेरूपा कदापि नहीं हूँ

सग॒ुणा कारणत्वाओ निगुणा पुरुषान्तिके |

सहत्तत्वनहज्लारों गुणा। शब्दादयस्तथा

काय्येकारणरूपेण संसरन्‍्ते त्वहंर्निंशम्‌

सदुदभूतस्त्वहड्डारस्तेनाएई कारण शिवा

अहड्डगरथ्व से काय्य त्रियणोज्लो प्रातिष्ठितः

अहड़ूपरान्महत्तत्त्व वुद्धि। ला पारिकीणलिता

फारणकपा ऐोनेले सगुणा हैं। और परमपुरुषके निकट निर्गणरुपा हूँ

भएश्रप भपक्भार और शब्दादि गुण फाय्यंकारणरूपसे निरन्तर विस्तारफो क्राप्त पोल हैँ। खतले प्रददृद्वार उत्पन्न एआ है एस कारण में मद्॒ज़्रूपिणी उसका फारण ह। अदृद्वार मेरा कार्य्य है जो बिगशुणात्मक्त है, अहड्भारले'. मदुप्तत््व उत्पन्न छुआ जिसको बुद्धि कहते हैं। यहां श्रहंद्ञारले मद्दतत्त्वप्ती उत्पत्ति का रहृष्य यह हे कि यह अहड्लार अहंतत्व नहीं हे यह धहक्गार चह शएद्वार है कि जय एक शद्वितीय ब्रह्मसत्तासे सगुण छैतावंस्था प्रकट होनेके लिये प्रकतिपुरुषात्मक बह्मानन्दुप्रद्‌ श्दृहार प्रकट एशआ |

यायातप्व | १७6०८

महच्तरव हि काय्य स्थादहडक्लारों हि कारणम | तन्सात्राणि त्वहड्डारादत्यचन्ले सदेव हि कारण पश्चचृतानां तानि सब्नेससद्धचे | न्‍कर्मान्द्रियाणि पश्चेव पश्च ज्ञानान्द्रियाणि महाभृतानि पश्चच सन! पोडशमेव काय्य कारण चेच गणोड्स घोडशात्समकः मद्दतत्तत्व कार्य्य है प्ोर अरहड्डार कारण है, सदाददी श्रदृद्डारले तम्मात्राएँ उत्पन्त द्वोती हैं| थे तनन्‍्मात्राएँ सब जगतककी उत्पत्तिमें पश्चलभूतोन्नी कारणरूप हैं| पांच कस्मेन्द्रिय, पांच जझानेन्द्रिय पाँच मद्दाभूत ओर सोलएवबाँ मन, यद्द पोहशात्मक गण ( सम्तद्द ) कार्य्य भीर दार्ण है

प्रसात्मा पसातवादों काय्य ने कारणस | एवं समझव! शम्भा ! सब्वपासादिसस्समव ||

संज्षेपेण समा प्रोक्त। तव तत्न ससुद्भचः व्रजन्त्वद्य विमानन झ्ास्पाथ सल सत्तसा; ! स्मरणाइशन तुम्प॑ दास्पे5्ई विपस स्थिते स्मलेव्याउह सदा देवा। ! परसात्मा सनातन! ॥|

ते

उनममा। स्सरणरदद ऋकऋाचश्यासा ड्वरसशयस |

आदिपुरुष परमात्मा छाय्य हैं और कारण है। हे शंभो | इस प्रकारलते स्वौका आदिखर्गर्ण सम्भव होता है, वहां तारा भेने संच्षेपसे सप्तुक्नव कद्दाहै द्वे सप्तमो ! मेरे काय्यके लिये श्रसी विमानमें वेंठकर जाशझो, में विषम समय उपस्थित होने पर स्मरण फरनेसे तुमको दर्शन दूंगी। हे देवताओ ! खदा मेरा स्मरण करना ओऔओर सनातन परमात्माका भी रुमरण करना | दोनोके स्मरणसे निःसन्देह कार्य्य सिद्धि छोगी | ऊपर लिखित पौरा- शिक गाधाले महामायाका चेशानिक स्वरूप महुत कुछ प्रकट छोता है | श्रद्धि तीय निर्गृण ब्रह्म जब सगण दोते हैं तब शुणमयी उनकी शक्ति जो उन्हींसे प्रछू/ छोती हैँ उन्हीं का नाम सद्दामाया छे। प्व्यक्ताषस्थामे ब्रह्मशक्ति ब्रह्म मेंछी लीन रहती हैँ और व्यक्तात्नस्थार्ं उनकी अ्र्ममयी शक्ति उन्हींसे

१६१० धीधर्म कदपद्ुम

प्रकट दोकर उन्हींमे जगतकों खष्टि स्थिति और खयरझूपमें दिखाती हू प्तह्म अव्यक्त निष्किय और गुणातीत हैं ओर उनकी शक्ति महामाया उन्होंमे ब्य्मावकों प्राप्त करती हैं, जगत्रूप काय्यकों प्रकट करती हैं और त्रिगुण- : मयी हैं | मद्ामायाक्की विशुणात्मक तीन शक्तियाँही अह्मा विष्णु झोर महेशको तीन गुणौ से अलग अलग धअधीश्वर बना देती हैं | जहां तक दृश्य है, जद्दां तक त्िग्ग॒णका चैमव है जद्दां तक्क सृष्टि स्थिति लयका कार्य्य है, ये सब मद्दा- मायाक्षतद्दी हैं। शास्त्रकार्ने ब्रह्मशक्ति सदामायाकी जार अचरुधाएँ कहीं एँ, यथा-स्य गीता कटद्दा गया हैः-- तत्त्वज्ञा। पुरतों वोषहे जगच्छेयोडजमिलाषया | आतिगूढ रहस्ख तच्छाएुध्च सदत्रवीस्यदस वाझ्नोष्गोचरायथा से शक्तेमेंदा! क्रमेण ज्वार हारता: स्थृूलखद्सकारणमेदत;ः ॥| चतुशस्तु तुरीयः स्थाउज्ञानरूपो संशय: निश्चलों हि समाड़े मे सतत तिल्ठाने घुस या कारणरूपा से धतीया शाक्तिशसश्ति सा | चरह्मातिष्युसह्ेशाला जनामिन्नी सता परा ॥| बद्िलीमिस्थाश् खद्साया। साहाकोन ऋमस्त्विसे बध्याएडजनुराघानास्थातिनाशकरा सता! स्थुल्ना तु रृश्यसानेष्छ संखारेष्नन्तरूपतास कुष्चती चाप चाचिच्य व्याध्ोत्यप्पाखिल जगत इसे तु सप्तधा मिन्ना थोगिभिरेश्यते सदा दे तस्वप्ञानियो |! श्रापके सामने जगत्‌ कल्याण की शअमिलापासे में भत्यन्त गृढ़ रहस्य फद्दता हूँ उसे खुनिये नाणी छोर मनसे शगोचर जो मेरी शक्ति है उसके भेद क्रमशः चार कहे गये है, यथा:-स्थूल्त, खूदम, कारण और चौथा तुरीय | तुरीय शक्ति शानरझूपा है इसमे सन्देह नहीं यद्दी त॒रीया शक्ति निश्चल झपसे मेरे शड्ुम निरन्तर रहती हे | मेरी कारणझूपा तृतीया शक्ति ब्रह्मा विष्णु ओर महेश की जननी है ! छ्वितीया सूद्मशक्तिक्की सदायतासे ब्रह्मा विध्यु फोर महेश प्रह्मारडका सर्जन पालन और संदार किया करते हें झोर प्रथमा

भायातर | १&११

स्थूल् शक्ति इस दृश्यमान संज्ञारमे अन्त झूप बचाया करती है एवं सम्पूरों जगत्‌र्मे घिचित्रताफो उत्पद्ष करती छुई व्यापक रूपसे स्थित रहती है। योगि- गण एस शक्तिफो सप्तथा विभक्त देखते हें |

पूवरचंकथित इन शास्त्रीय सिद्धान्तोफा तात्पय्य यह हैं फि मिर्गुण प्रह्मम स्वरूपछानरूपा सश्चिदानन्द्मयभावप्रक्ाशिनी जो शअ्रक्नेत शक्ति सदा बनी रहती है चद्दी तुरीया शक्ति है। व्यक्त दशारमें जो द्वेतसावक्ो उत्पम्न फरती ओर ब्रह्मानन्दकी प्रभिष्यक्तिके अर्थ जो सगुण जगतको कारण बनती धंए्टी ब्रह्मा विष्णु महेशकी जननी कारणशक्ति है। इन्हीं कारणशक्तिझूपिया मए[मायाका स्थान मशिद्वीपम कल्पना करके खुप्रसिद्ध देवी सागवत गन्धने जो शपृव्च वर्णन किया है सो ऊपर प्रकाशित ही हो चुका है। महामाया का सूद्षम रूप भिगशुणचिलालका कारण है। वचेद्दी तीन शक्तियां मद्दामायाने ब्रह्मा घिष्णु झौर महेशकों दी हैँ जितका वर्णन भी ऊपरक्ी गाथामे झाचुका है | सूद्मशक्तिफ येद्दी तीव रूप अनन्त फ्राटि ब्रह्माएडमें अलग अलग रूप धारण करते एुए वक्ता श्रल्गग अलग ब्रह्माएडो तथा वक्त ब्रह्माएडोके अलग श्रल्लग गऔध पिण्डोर्म यथाक्रम खुष्टि, स्थिति श्रोर लयका कार्य खुसम्पन्न किया फरते हें यही महासरस्वती, सद्दालचमी श्रोर महाकाली कद्दाती हे मदामायाकी स्थूलशक्ति स्थूलजगतूर्म लात भेदोमे विभक्त है ऐसा पूज्यपाद मद्॒र्पियांका मत है | शक्तिका जलिभावभेद सूद्मशक्तिमे हे श्रोर शक्तिका सप्तथा भेद स्थलशक्तिमेँ विधमान है। मद्यामायाके खूदम भिगुणात्मफ घिभास किस प्रकार सश्टिम॑ सर्व॑व्यापक है सो अिगुण तत्व नामक अध्यायमें पिझाया जायगा महामायाके राज्यके सप्त विभाग केसे अतीनिद्रिय- तानमय राज्यतक्त विस्तृत है लो दर्शन शासत्र, शानयज्ञ श्रोर शजयोग श्ावि शध्यायाम - दिस्ताया गया हे। स्थूलप्रकृतिके ये सप्तविभाग खष्टिफे सूचमसे अ्रतिखदम और स्थूलसे अ्तिस्थूल अज्ञोमे विद्यमान हैं | इस संखारमे वैद्युतिफ श्क्छि ( ॥९॥)४० (90५४७॥' ) आदि जो शक्तियां प्रकट हे वे इन्हीं सप्त शश्फे अन्तर्गत हैं। ऐसी दी अनेक शक्तियां जो अच मनुष्यक्े सन्प्रुख अपरिशात है सो भपिष्यत्में प्रकट दो सकती है | मद्ामायाफ्री तुरीयाशक्ति घाक्‌ू मन झौर धुद्धिसे श्रगोचचर है श्रौर बद्द तत्तातीत परमतत्वरूपी स्वरूपमें दी विल्ाल दरती है | महामायाक्ती कारण शक्ति वाकू , मथ और त्रुद्धिस अगोचर ऐमेपर भी तत्पधामद्रारा मलुमेय है ब्रह्मा, विष्णु और मप्तेशकी शननी पोनेके काशण

१६१२ श्रोघमकल्पट्टम

मा केघल इन्हीं तीनों आ्रादिदेवौके साथ उनका कमी, कभी साक्षात्कार हो सकता है जैसा कि ऊपर लिखित पौराणिक गाथासे प्रकट है। मद्ामायाकी सूच्मशक्ति स्थूल प्रपश्षमय जगत्‌म बुद्धिगस्य होकर कास्येब्रह्मके खब कार्य्योको किया करती है. और मदामायाकी स्थूलशक्ति जगत॒के भीवर ओर बादइर परिव्याप्त है। जिस प्रकार शरीरके नख और रोस आदि शरीरमे रहकर भी शरीरखे अलग किये ज्ञा सकते हैँ उसी प्रकार महामायाक्की स्थूल्शक्ति जगत्से मिलकर तथा जगत अलगरझूप दिखाकर काय्ये करती हुई प्रतीत होती दै। कुछ छी हो ये चारों मद्दासायाके दी रुपाब्तर है ! एक ही ब्रह्मशक्ति पुनः छ्विघारूपको धारण करती है उसका शपूर्य घर्णन सप्तशतीगीताप इल प्रकारसे कद्दा गया है, किः-- + / * ४. + एवं सतवादियुक्तानां देवानां तत्न पाव्लेली स्नातुप्तन्‍्यायथों तोथे जाह॒ब्या छुपनन्दन ! 0 सा5ब्रवीत्तान्सुरान्छ छूमवाहिः सतूयतेज्च का शरीरकोशतश्ाउस्था। सखुदता5नश्रवीचिछिया || स्तोत्र मसेलतत क्रियते शुस्सदेत्यनिराकूले! ससमेले 3] कब & पे #5 देवे! ससेतले। सभरे निशुस्मेन पराजिते! | ही किक # 5. शरीरकोशाधत्तस्था। पाउवेत्या नि।रूताआम्बिका कौशिकीएलति समसस्‍्तेजु ततो लोकेबु गीयते + (३ तस्पां विनिगेतायास्तु कृष्णाउशूत्साआपि पाव्येती ऋालिकेाति ससाख्याता हिसमाचलकूता क्या सप्तशतीगीतामं चर्णंन है कि जब देवतागण असुरोसे भयभीत द्ोफर दैधराज्यकी पुन्रः प्रतिष्ठा तथा श्रसुराका बल नाश करानेक्ने अंथ भगवतीफे निषट उपस्थित हुए ओर स्तुति की, तो उनके स्तोत्रादिम निरत रएनेके समय हे राजन छुरथ | मगवती पार्वती भ्रीगंगाजीके जलमें स्वान करनेको पाई उच्त सुमन भगवतोीने देवताशसे कद्दा कि ठुम किसकी स्तुति करते द्वी इतना छहदते दी उन्हीं ममवतीके शरीर कोशसे एक अन्य सज्ललमयी भगवती उत्पन्न हुए और थे बोलीं | शुस्भ देत्यले निराक्तत और संग्राम निशुस्भ देत्यसे परा- ज्ञित समस्त देवगण यद्द मेरा ध्तोत्न पाठ कर रहे हैं। उन पायती भगघसीफे

भायातचर्घ. १७१३

शशीएफोशले असम्बिका निकली हैं इस कारणले ही खब संखारमें उन्तको फौशिप्फी फछदे हैं। उन अस्विक्का भगवतीके मिकलने पर वे पावेती भगवती फष्णा धो गए और फालिका उनका नाम प्रसिद्ध छुप्ना एवं द्विमालयमें विराजमान हुई | मदामायाके छिधासावापन्न होनेका यह लौकिफसाणासय घर्सान है। डन्‍्हीं दोनों भेदोंका लमाधिसापामय वर्णन श्रीमकतगवद्दीतामें एस प्रफारसे ऐः--

भासिरापो$नलो' वायु! खं मनो दुद्धिरिव

अहड़ुगर इतीस से सिन्ना प्रकृतिरश्रधां

अपरेष्यासितस्त्वन्यां प्रकृति विद्धि मे परां

जीवभूतां महाबाहो ! शथेद धाय्मेते जगत

भूमि, जल, अ्प्नि, वायु, आकाश, मन, दुद्धि शोर अहंकार इस प्रस्तारस्े मेरी अष्टप्रफारफी प्रकृति अपरा नाम्नी है। हे श्रजुन ! इस शअपरा प्रकृतिसे पृथक मेरी जीवभूता परापरकृति है' जिसने इस जगवकों धारण कर रकस्ता दे सग्ण ब्रह्मक्ी त्रियुणमयी प्रकृति गुणवेषस्यकों प्राप्त होनेके अन॑न्तर एन्द्रीं ऊपर कथित दो भावषोमें परिणत होती है एक चेतनमयी जीवभूता घनकर फ्मेप्रवाद उत्पन्न करती है, पाप पुएय सर्जन करती है, सुख एुःख स्वर्ण यरक आदि भोग प्रकट करती है और पनादि शनन्‍्त जीवप्रवाएका श्लोस यद्दाती रद्दती हे, यद्दी परा प्रति है झ्लोर दूसरी श्रपरा प्रकृति चतुर्विशत्ति तरघसयी जेसा कि सांज्यशासत्र मानता है, पश्चक्ोशमयी जैसा कि वेदान्तशास्त मानता है श्थवा श्रष्ठभेद्सयी जिस प्रकार कि गीताशाख्र मानता है, जरराज्य प्रकट करती है। लप्तशती गीताक्की वर्यात फी हुई पू््च कथित गाधारें मएा- मायादी व्यक्ताबध्थासस्वन्धीय इन्हीं दोनों प्रकृतिका दर्णान किया गया है एशेफि मनुष्य देवता आदि ऊब प्रकारक्ी जीवभृता सष्टिकी एकमात्र भरण- फर्ची प्रसिपालिनी अन्तर्यामिणी झौर ईश्वरी मद्यामाया ही हैं श्रीर जीवभूता सखश्टिसे ऊपर फथित इन दोनों भार्षोंका द्वी साक्षात्‌ सम्बन्ध है। जीव जगवूमें शक्तिफा कारणस्थत्न तो पराप्रकृति है ओर कारय्येश्थल 'पराप्रकृति दँ। एली फार्ण पून्वेकथित गाथामे देवताओके द्वारा पार्वतीदेदीकी स्तुसि फिये जानेपर एन्ट्रीके शरीरकोशसे कोशिकी देवीका श्राविर्भाव एुआ था पाब्वंतीदेद्ीष्टे स्थूज्षकोशसे उत्पन्न द्वोनेके कारण ये फोशिकी कद्दाऔ। परा और श्यपरा प्रस्षिका लम्पन्ध भी ऐला ही है। तदूनन्‍्तर फौशिफी देधीने प्पाधिर्ताव छोटे 5

१७१७ घीणम्पष्हपट्ठुम

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अख्यन और. कक “ओर... 6 सार ८. कर. हा 23.3 जमकर री... या पट ऑफर कक #.. डर" प्सीयवननमीकजीी के 20.4 कि... ] 3७-०3. फनी जे 733. अक+ फेननी बरी आय अट3 जम जतनग बम जरी कमी प>अआओ

पाव्यती देथीसे फदा फिये देघलागण मेरी एतुसि कर रहे हे | ८सा्तुतः शक्तिफा छाथाए सो झपण प्ररूृति दी है। पिया शक्तिफे स्थू्नतिकाशके जछुरोफा परा- प्रथ भी प्रसश्तद ६। इस फास्ण प्ोशिफी देवीका गौरीरेणी से ऐला कहना एएचा/फखिख है। एक विपानसे पृथ्वेफथित गाधाणा वैधानिक राहख्य रुपए दो पणा झप यदि यह शझ्ञ दो फिफाब्वंती देदीके फोशरसे फोशिकी देखीफ़ा शाफव्य ऐदे पाव्वेती देखीका रंग छरू्ण फों घोगया झोए मे काली फ़्यों धापयई। एस वेधाबिफ शंफाक्षा लमाधान यद है कि जीघप्रवाए्द प्रवाहरुपले सवादि छनवप्य है। जीवशूता पराप्रकृति मंद्ामाया ही उसका फार्ण है एस देशामिद् चरवका विस्तारित वर्णन जीवतत्व नामक अध्यायमें दोछुका है महुण्यक्ती आसिन्तंनीय जीवप्रधाद-उत्पश्चकारिणी और चिह्लड़श्नन्धिरपसे जऔीपरपविधायिनी पराप््कृतिले जब स्थूत्र प्रपश्चात्मक खष्टिं-स्थिति-लय-विधा- यिन्री अ्परा प्रकृतिकरा शआविर्ाब होता है तो पुनः स्थुल्लप्रपंचके साथ परा प्रछतिका बैसा सम्मस्ध नहीं रहता जैसा कि चिजड्ग्रन्धिके उदय होते खलय स्वधावसिद्धकपस रहता हैं। पश्चकोशमय, चतुर्विशति तत्वप्रवण ग्रथवा सग- य्टदीवाकथित अष्टतत्वन्नय स्थूत्र प्रपश्च प्रकट द्ोते दी परामकृति मद्दक्ाल्नी झुफ्ले जीवखशिके लयस्‍थान और खूब स्थूत् प्रपश्चक्षी साक्षीस्वरूप वन जाती हैं। वही तब महाकाली या महाकाल कहलाती हैं। पाव्य॑ती देवीके फोशसे फोशिकी देवीके प्रकट दोते द्वी उनका रंग कृष्ण होने श्रौर उनका नाम कालिका ऐजेका यही चैज्ञानिक समाधान है शपरा प्रकृति ही अपने शरीरमें इस घिराट प्रपश्धकों धारण करती हैँ और परा प्रकृति श्रपने स्थर्भावसे चिज्ञड- प्रण्थि उत्पन्न करके शीचसहि प्रकट कर देती हैं श्रोर लाक्षी रहती है प्र्योकद्ति 'शधापूष्यमकरएयत्‌'रूपिणी खध्ठि बारयार छुआ करती है। प्रनन्‍्त फोडिब्रह्माण्ट धरणत्ष होते है, स्णित रहते हैँ और समयपर महाफालीके मुख छयको भाप्त हे ६ं। एसी कारण शास्ोर्म महाफालको शमादि और प्नन्‍त छछा | सहाक्राषकी शक्ति सहाकाली जब इस स्थूत्त प्रपश्चकी अच्तमे प्रास कर ऐसी हैं लो स्थूड प्रपश्यफ्ा पत्ययस्थान चेद्ी हैं। महाकालीफे सन्‍्पुख यदद एशूह प्रपश्च उत्पन्न होता है, उन्हीं स्थित रदता हे और प्रन्तम उन्दींसे रायफो धांप्त पोता है। भेव्‌ एतना दी है क्लि म्रद्माकाल निर्विकार हैं और साक्षी झाप हें छोर उसकी शक्ति महाफाली सथूल प्रफऋके ऊाथ नृत्य फरनेदाली हैं देवता शोर देवीका किस प्रकार समषन्‍ध है सो ऋषि देवता गए पिठ्तरयथ तामद

मायात्तक्थ १&१५

अध्याय दिजाया गया है! शस्तु ख़ब रंग हौर सब छाया जिख स्ंगमे लयफो प्राप्त होते हैं घद्दी कृष्ण रंग है। सप्तवर्ण और सप्तद्ाया ये सब ही कृष्णवर्ण में लय दो आते हैं इली कारण कूष्णवर्ण वर्णसशिका प्रलयस्थान है | इसी द्वाश्ण मद्दाकालीका रंग कृष्ण हे, यही फरालवदनी फालीऐे सर्व्याव्दफक बुणक्ा तर्णरह्य हे। विदयाक्षी सहायताले ज्ञीव घुक दोता है। पिध्यारपिणी मधामाणा ही अ्विद्यासे उत्पन्न जीव-आवश्णफार फोषोफा प्रत्दय दप्फे तरघध्ामप्राध् ल्लौश- गणको मुक्ति प्रदान किया करती है भ्रधिद्या शीवफे पन्‍्धनका फारण है ओर विद्या जीवके मुक्तिका कारण है। शानजननी विद्या भौर अशानजझनथी झविद्या है। जिस प्रकार जगज्ज्योतिका प्रकाश ह॒गतको प्रकाशित फरता है परन्तु उस प्रकाशका अभाष द्वी धन्धकार कददल्ाता ऐै उसी प्रफार ब्र्मप्ररृति महामायाके श्रवस्थासेद्स ही चिष्ा श्ौर झविधाभाषव समझने योग्य हैं ब्रह्मशक्ति सद्दामावा जब हापनी दृष्टि श्रपने पतिक्की ओर रखती हैं तभी वे विद्या कद्दाती हैं परन्तु जब वे बहिमंखीन दो अपने पुरुषसे ्पनी दृष्टिको दृटाफर अपनी दइृश्िकी विपरीत गति कर डालती हैं शोर वहद्दिर खिनी हो परिणामिनी दोती हैं, स्वप्रतिविमुख उसी दशाका नाम श्रविद्या है। जबतक