अस्तावना'

हषि की यह जीवनि प्रारम्भ॑ में आयसमाज के इतिहास

के द्वितीय खग्डरूप में लिखी गईपथी। अब ईसे प्रथक्‌ प्रकाशित-

किया जा रहां है। आशा है; इससे समय की एक बड़ी प्रावश्यकता पूर्ण होगी।

इस जीबनि के मुद्रित होने के समय में श्रस्वस्थ ही

रहा हूँ, इसके प्रफ देखने तथा मुद्रण के, निरीक्षण का

बोक चि० धीरेन्द्रकुमर १९ रहा है। अन्तिम दो परिच्छेद

उन्हीं द्वारा संग्रहीत हुए हैं। उन परिच्छेदों से पुस्तक की उपयोगिता बढ़ूँ गई है

इन्द्र

विषय-स्‌ची

0 ००0००००-००००५०

पहला परिच्छेद्‌--जन्म और वैराग्य ' दूसरा परिच्छेद--अमृत की तलाश तीसरा परिरछेद्‌- विद्या के स्रोत में स्नान चौथा परिच्छेद--खाण्डन बन पांचवां परिच्छेद --सुधार की प्रारम्मिक दशा छुठा परिच्छेद---सुधार की मध्यम दशा का प्रारम्भ सातवां परिच्छेद्--गंगा-तट पर सिंहनाद शआठवां परिच्छेदू--गढ़ से टकर भा परिच्छेद--उुधार को तीसरी दशा

पृष्ठ संख्या

२१० १६ र्६ ४१ छ्र८ (4. ह्ट्ष

दसवां रिच्छेद-- आयेसमाज की स्थापना-बम्बई प्रांत में प्रचार ६०

ग्यारहवां परिच्छेप--उत्तर दिशा में धर्म की गूँज बारहवां परिच्छेंद-- नियमों की दृढ़ नींव

तेरहवां परिच्छेद--आयंसमाज का विस्तार

चौदद्दयां परिच्छेदू--थ्यासोफो से सम्बन्ध

पन्द्रहवां परिच्छेद--राजपूताने में कार्य

सोलहवां परिच्छे दू--परोपकारिणी सभा का निर्माण सन्नहवां परिच्छेद्--जोवन का श्रन्तिम दृश्य अठ!रहवां परिच्छेदू--अ्रयसमाज का संगठन

जश्नीसवां परिच्छेद--स्वामी दयानन्द की महत्ता

बीसवां परिच्छेद--सत्याथंप्रकाश' के प्रति श्रद्ाज्अलियां

१०६ १२२ १३१ १४३. १६४ १७४ ५१७८ १६३ २०१ २२१

धुरुकुल कांभ | पहला पारच

(००-००) 0 4

जन्म ओर पधेराग्य

काठियावाड़ प्रान्त में मोरवी राज्य के टंकारा नामक छोदे ! ग्राम में अम्बाशंकर नाम का एक ओदीच्य ब्राह्मण रहता था १८८१ विक्रमी के पोष मास में उसके यहां एक बालक ने जन्म लिया। बालक का नाम मूलशंकर रखा गया। सन्‍्यास लेने पर इसी मूलशंकर का नाम दयानन्द हुआ अम्बाशंकर के यहां ओदीच्य ब्राह्षण होने पर भी भिक्षाप्रत्ति नहीं थी, लेन-देन का व्यवहार होता था; ओर रियासत की ओर से जमादारी भी प्राप्त प्री, जो तहसीलदारी के बराबर थी | इस प्रकार एक पुराने ढंग के सामान्य घर में दयानन्द का अन्म हुआ। यह जानने का कोई भी उपाय नहीं है कि दयानन्द के माता-पिता किस स्वभाव के थे। यह भी नहीं जाना जा सकता कि बालक मूलशंकर पर प्रभाव डालने वाले गुरुओं में से कोई ऐसा भी था, जिसे “असाधारण” कह सके। प्रारम्भिक जीवन की घटस्वाओं के बारे में इमें जो कुछ भी पता चलता है, स्वामी दयानन्द का अपना कथन ही उसका साधन है, दूसरा कोई

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नहीं गुजरातियों में सन्तान-प्रेम बहुत श्रधिक होता है। परम- हंस दयानन्द डरा करते थे कि 'कहीं मेरा परिचय पाकर सम्बन्धी लोग घेर बेठे ।! इस डर से वह अपने जीवन के प्रारम्भिक भांग का अधिक परिचय नहीं दिया करते थे। यदि उनके परि- वार और शेशवाबस्था के वृत्तान्त जानने का कोई साधन होता तो निःसन्देह हमें कई मनोरञ्ञक बाते जानने का अवसर मिंलता। संसार में आकरिमिक कुछ भी नहीं है। जिन घटनाओं को हम श्राकस्मिक कहते हैं, उन्हें समझने की शक्ति नहीं द्ोती या साधन नहीं होते शक्ति या साधन के अभाव से बाधित होकर हम अपने अज्ञान को आकस्मिक' शब्द के आवरण में छिपाने का यत्न करते हैं। दयानन्द के चित्त में जो जो विचार-तरंगें उत्पन्न हुई , जो-जो क्रान्तियां खड़ी हुईं, वह आकस्मिक नहीं थीं, तथापि हमें यह मान लेना चाहिए कि उनके कारणों पर पूरा प्रकाश डालने के साधनों का अभाव है हम नहीं जानते कि मूलशंकर के प्रारम्भिक गुरु कोन थे, श्रीर हमें यही ज्ञात है कि उसके खेल के साथी किस श्रेणी के थे ? यह जानने का कोई उपाय नहीं है कि दयानन्द में जो दृदता शोर निरभेयता थी, वह माता की ओर से प्राप्त हुई थी या पिता की और से श्रस्तु। जो नहीं जाना जा सकता, उसे छोड़ कर हम उसकी ओर दृष्टि डालते हैं जो जाना जा सकता है

आठवें वर्ष में मूलशंकर का यज्ञोपवीत संस्कार किया गया, ओर गायत्री, सन्ध्या, रुद्री आदि कृण्टस्थ क़राये गये प्रतीव होता है कि मूलशंकर को स्मरण-शक्ति प्रारम्भ से दी

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अच्छी थी। वह स्मरण-शक्ति प्रचार के दिनों में दयानन्द को प्रतिपक्षियों के लिये असह्य बना देती थी। प्रचार के काय में कई पंडितों की अपेक्षा वह ऋषि की अ्रधिक सहायता करती थी। मूल शंकर के पिता स्वभाव में कुछ रूखे ओर कड़े प्रतीतः होते हैं। सम्भव है, रियासत की ओर से उन्हें तहसीलदारी का काये सोॉंपा .. 9 जिसके प्रभाव से उनके स्वभाव में उप्रता आगई हो। उधर मूलशंकर की माता भ्रेममयी प्रतीत होती हैँ। बह बच्चे से वेसा ही लाड़ करती थीं, जेसा लाड़ प्रायः माताय किया करती हैँ। मुलशंकर के अन्य सम्बन्धियों के विषय में हम इतना ही जानते हैं कि उस का एक चचा था जो बहुत स्नेह करता था, ओर अपनी छीटी बहिन से भी बालक का बहुत प्रेम था

एक ब्राह्मण के बालक को जसी प्रारम्भिक शिक्षा मिलनी चाहिए, वह मूलशंकर को भ्राप्त होती रही १४ वर्ष की आयु तक बह यजुवंद संहिता कण्ठसथ कर चुका था, व्याकरंण में भी उसका प्रवेश हो गया था। इतना पढ़-लिख लेने पर मूलशंकर के गुरुओं ने यह सम्मति बनाई कि अब वह इस योग्य हो गया है कि कुलक्रमागत धार्मिक कृत्यों में भी भाग लेने लगे। १८६७ विक्रमी की माघ वदी १४ को शिवरात्रि का ब्रत था। शायद ही कोई पुराने ढड्ग का हिन्दू घराना होगा, जहां यह ब्रत माना जाता हो शिषरात्रि की रात को शिव का अचेन होता है और लंघन करना पड़ता है। अन्न ओर नींद-दोनों का इकट्ठा दी लंघन अधिक पुण्यजनक समम्ा जाता है। अनुभवी लोग जानते हैं कि बालकों के लिए इनमें से एक चीज का लंघन भी

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संम्भव नहीं है; फिर जब दोनों का यत्न किया जाय तो केसा डराबना बन जाता है। मूलशंकर के सामने जब शिवरात्रि का ब्रत रखने का प्रस्ताव किया गया; तब वह पहले राजी नहीं हुआ। कोई खास लाभ दिखाई दिये बिना कोई बालक भूख श्र नींद से लड़ने को तेयार नहीं होता इन दो शत्रुओं से युद्ध करना तो जवानों भ्रोर बूढ़ों के लिए भी दुष्कर हे -- मूलशंकर तो अमी १४ साल का विद्यार्थी था। माता ने बालक की अनिच्छा में दो एक युक्तियां देकर सद्दायता की। 'लड़का श्रभी छोटा है, इसे दिन में चार बार खाने की आदत है, यह केसे भूखा रहेगा ? रात को यह अंधेरे से पहले ही सो जाता है, रात भर केसे ज़ागेगा ? हम कल्पना कर सकते हैं कि माता ने प्रेमवश होकर शेसी ही युक्तियां दी होंगी

तब पिंता ने बालक की कल्पना-शक्ति को अपना सहायक बनाने का यतन किया शिव का माहात्म्य सुनाया, शिवरात्रि की पुराणों में गाई हुई महिमा बताई ओर ख्वगे के सुन्दर दृश्य खंच कर कोमल प्रतिभा को उत्तेजित करने का यत्न किया यत्न में सफज्नता हुईं। मूलशंकर शिवरात्रि का ब्रत रखने के लिये तय्यार हो गया। नियत समय पर पुजारी और गृहस्थ लोग मन्दिर में पहुंच कर पूजा आदि कार्यों भें क्ग गये मूलशंकर अपने पिता के साथ बेठा हुआ सब कुछ देख ओर सुन रहा था उसका हृदय दिन में सुनी हुई कहानियों से पू्े था, विश्वास और श्रद्धा का अंकुर उत्पस्न

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हो गया था, आशा और सम्भावना से प्रेरित होकर वह ब्रत का पूरा पुण्य लूटने के लिये तेयार हो बेठा था

पूजन हो गया पुजारी ओर ग्ृहस्थ लोग जागरण के लिये बेठ गये धीरे-धीरे आंखें मुँदने लगीं, सिर झुकने लगे, लोग एक दूसरे के कन्घे या छाती पर सिर धरकर लुढ़कने लगे कुछ ही घण्टों में मन्दिर में सन्नाटा हो गया ओर जो लोग रात भर जग कर पुण्य लूटने का संकल्प किये बेठे थे, वे निद्रा देवी की सुखभयी गोद का आनन्द लेने लगे सब सो गए -- केवल एक भक्त जागता रहा वह भक्त बालक मूलशंकर था उसकी दृष्टि बराबर शिवलिंग पर गड़ी हुई थी बह उस अद्भुत शक्ति-सम्पन्न देवता की ओर चाव»री नजर से देख रहा था | देखता क्‍या है कि मन्दिर में सन्नांठा पाकर चूहे बिलों से निकल आये हैँ; मूर्ति के इद गिदे चावल आदि के जो दाने पड़े हैं, उन्हें खा रहे हैं, ओर बीच-बीच में ऊपर भी चढ़ जाते हैं मूलशंकर ने सोचा कि जो महादेव बड़े-बड़े दानवों के व्यतिक्रम को नहीं सह सकता ओर त्रिशूल लेकर उनका संद्दार करता है, वह इन मूसों को सिर पर चढ़ने से तो अवश्य रोकेगा। और कुछ नहीं तो सिर हिला कर ही उन्हें भगा देगा, परन्तु उसने आश्चय ओर विम्मय से देखा कि वह पत्थर पत्थर ही रहा, दिला जुला नहीं'। तब क्‍या यह पत्थर ही वह शिव है, जो केलाश पर निवास करता है; जिसमें संसार का संहार करने की शक्ति है, जिसके त्रिशुल की ज्योति से दानवों

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के कलेजे कांप जाते हैं ? वह कोई और द्वी शिव होगा -- इसमें ओर उसमें अवश्य भेद है ये सब विचार मूलशंकर के, तीत्र प्रतिभा से संस्कृत मन में उठने लगे! वह दिन में शिव-माहात्म्य सुन चुका था, उसे वह याद आने लगा, ओर जो कुछ देखा उसकी रोशनी में सुना हुआ महात्म्य निमल प्रतीत होने लगा

चिन्तित मूलशंकर ने शंका निवृत्त करने के लिए पिता को जगाया बिता के पास प्रतिभाशाली पुत्र के गहरे प्रश्नों का उत्तर कहां था ? वह जिज्ञासु की जिज्ञासा को ठप्त कर सका मूलशंकर निरुत्साहित होकर मन्दिर से घर चला आया ओर प्रेममयी मां से अपनी भूख की शिकायत की मैं तो पहले ही कहती थी कि तू भूखा रह सकेगा! -- इत्यादि बहुत सी बाते माता ने कही होंगी। माता ने पुत्र को पेट भर कर खिला दिया ओर बिस्तर पर सुला दिया

यदद घटना मूलशंकर के जीवन में मौलिक परिवतेन उत्पन्न करने का कारण हुई मूर्ति-पूजा पर से उसकी श्रद्धा उठ गई कई लोग आशंका किया करते हैं कि इतनी छोटी सी बात ओर वह भी इतनी छोटी सी अवस्था में -- इतना भारी परिणाम केसे उत्पन्न कर सकती थी ? अनुभव से देखा गया है कि ऐसी छोटी बातें छोटी अवस्था में ही इतना प्रभाव उत्पन्न करती हैं उस समय बालक की घुद्धि बड़ी नमे देती है उस पर छोटा सा भी आघात प्रतिक्रिया को उत्पन्न कर देता है। बढ़ी अचस्था में बुद्धि कठोर दो जाती है, प्रतिभा

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अनुभवों के बोक से दब जाती है; ओर बहुत सी घटनाएँ जो बालक के हृदय में नई होने के कारण उत्तेजना उत्पन्न करती हैं, प्रोढ़ के हृदय में बार-बार देखी हुईं होने के कारण कुछ भी प्रभाव उत्पन्न नहीं करतीं इस घटना के पीछे सूर्तिपुजा से मूलशंकर की श्रद्धा उठ गई उसने चचा ओर माता की सिफारिश पर पिता से पूजापाठ के कार्यों से छुट्टी लेली ओर पठन-पाठन में जी लगा दिया। इस समय दो ऐसी घटनायें हुईं, जिन्होंने मूलशंकर के खच्छ दर्पण के समान हृदय पर स्थायी प्रतिबिम्ब छोड़ दिया। उन घटनाओं का वन चरित-नायक की अपनी भाषा में ही सुनाना उत्तम होगा ऋषि ने आत्म-चरित में उनका इसप्रकार वर्णन “किया है --- “मेरी १६ बरस की अवस्था के पीछे मेरी १४ बरस की बहिन थी, उसको हेजा हुआ, जिसका वृत्तान्त यों है। एक रात जबकि हम एक मित्र के घर नाच देखने गए हुए थे, तब अचानक नोकर ने आकर खबर दी कि उसे देजा हो गया हम सब तत्काल वहां से आए। वेय बुलाए गए, आओपषधि की, मगर कुछ फायदा हुआ चार घण्टों में उसका शरीर छूट गया में उसके बिछौने के पास दीवार से आ- सरा लेकर खड़ा था जन्म से लेकर इस समय तक मैंने 'पहिली बार मलुष्य को मरते देखा था इससे मेरे दिल को बड़ा कष्ट हुआ ओर मुझे! बहुत डर लगा, ओर मारे डर के सोचने लगा कि सारे मनुष्य इसी प्रकार मरेंगे, ओर ऐसे ही मैं सी मर जाऊंगा सोच-विचार में पड़ गया कि जितने

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जीव संसार में हैं उनमें से एक भी बचेगा, इससे कुछ ऐसः? उपाय करना चाहिए कि जिससे जन्म-मरण रूपी दुःख से यह जीव छूटे ओर मुक्त हो अर्थात्‌ इस समय मेरे चित्त में बेराग्य की जड़ जम गई।”

सब लोग रोने लगे, परन्तु वेराग्य की लहर में बद्दते हुए मूलशंकर की आंख से आंसू निकले। बालक मूलशंकर रोने की चिन्ता में नहीं था; वह सदा के लिये रोने से बचने का उपाय ढूंढ रहा था। इस घटना से मूलशंकर के हृदय में बेराग्य का अंकुर उत्पन्न हो गया।

दूसरी घटना का चरित-नायक ने इस प्रकार वशन किया हे--“जब मेरी अधस्था १६ वष की हुईं तब मुझ से अत्यन्त प्रेम करने वाले जो बड़े धर्मात्मा तथा विद्वान्‌ मेरे चचा थे, उनको हले ने घेरा। मरते समय उन्होंने मुके पास बुलाया, लोग उनकी नाड़ी देखने लगे, में भी पास ही बेठा हुआ था, मेरी ओर देखते द्वी उनकी शआंखों से आंसू बहने लगे मुके भी उससमय बहुत रोना आया, यहां तक कि रोते रोते मेरी आंखें फूल गई इतना रोना मुके पहले कभी आया था। उस दिन मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि में भी चाचाजी के सहश एक दिन मरने वाला हूँ।” तपे हुए लोहे पर चोट लगी। मूलशंकर का हृदय बहिन की म्त्यु के दृश्य से पदले ही नम हो चुका था; इस दूसरी चोट ने उसे पूरी तरद्द बेराग्य की ओर मुका दिया।

शिवलिग पर चूहों को कूदता हजारों लोग देखते हैं, परन्तु, उसे एक साधारण घटना समककर नजर अन्‍न्दाज कर जाते हैं'।

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बहिने और सम्बन्धी किसके नहीं मरते ? परन्तु बेराग्य सब को नहीं होता छोटी सी घटना से इतना बड़ा परिणाम निकालना हरेक बुद्धि के लिये सम्भव नहीं है, और असाधारण बुद्धि के लिए भी सदा छोटी बाब से बड़ा परिणाम निकालना असम्भव है। एक फल को गिरते देखकर प्रथ्वी की आकपण-शक्ति का अनुमान सब नहीं कर सकते; पोप की सवारी जाने कितने पादरियों ने देखी होगी, परन्तु ईधाई धर्म में सुधार की इच्छा सब के हृदय में उत्पन्न नहीं हुई विशेष प्रतिभाये ही विन्दु से विश्व का अनुमान कर सकती हैं। परन्तु आश्रय यह है कि बहुत प्रचण्ड अतिभाय भी हरेक विषय में या हर समय एक ही प्रकार से प्रभावित नहीं होती; बुद्धदेव ने रोगी या बूढ़ों को देखकर अमर होने का यत्न आरम्भ कर दिया परन्तु बहुत सी भोतिक घटनायें देखकर भी वज्ञानिक परीक्षण आरम्भ नहीं किये | न्यूटन ने छोटी सी बात से विज्ञान के बड़े बड़े सिद्धान्त निकाल लिये परन्तु बूढ़ों या मरतों को देखकर वैराग्यवान्‌ नहीं हुए। यह विचित्रता पूब के संस्कारों को सिद्ध करती.दै। पूर्व संस्कार ओर अद्भुत प्रतिभा यह दोनों मिलकर संसार में आश्वयंजनक काय कर सकते हैं। भगवान्‌ के अ्रभीष्ठ अंडे काये इन्हीं दो शक्तियों के मेल से हो सकते हैं। मूलशछर भी इन दोनों का समावेश था।

मूलशंकर के हृदय में यह विचार उत्पन्न होने लगा कि मुझे भी कभी मरना पड़ेगा। क्या इससे किसी प्रकार बच सकता हूँ ?” बह विद्वानों ओर बृद्धों से अमर होने के उपाय

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पूछने लगा। जब उसके माता-पिता को यह पता लगा तो वह उसे बांधने के लिये विवाह कर देने का संकल्प दृढ़ करने लेगे। विचारों का इन्द्र युद्ध होने लगा। मूलशंकर ने इस कारागार से बचने के लिये कभी काशीजी जाने का भ्रस्ताव किया ओर कभी पड़ोस में विद्याभयास समाप्त करने की बात उठाई उसके माता- पिता वेराग्य से डरते थे, इस कारण उनकी ओर से विवाह की शीघ्रता होने लगी। ऐसी दशाओं में माता-पिता अपनी अधीरता से प्रायः अपना काम बिगाड़ लिया करते हैं वह छूटने का यत्न करने वाली सनन्‍्तान को यथाशीघ्र बांधने का यत्न करते हैं यह अधीरता प्रायः दुःखान्त सिद्ध होती है। मुलशंकर के माता- 'पिता ने भी अपनी अधीरता से बिगड़ते काम को शीघ्र से शीघ्र “बिगाड़ दिया |

दूसरा पारच्छद

0 0००००----३0 हक

अम्रत की तलाश

मूलशंकर के जीवन में यह समय विषम परीक्षा का था। बह एक पहाड़ की ऐसी चोटी पर खड़ा था; जिसके एक श्रोर नीचे उतरने की शाही सड़क बनी हुई थी, ओर दूसरी ओर, जिस चोटी पर वह खड़ा था; उससे भी अधिक ऊंची

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चोटियां दिखाई दे रही थीं। बीहड़ जंगल था, कंटीली पग- डरणिडियां थीं, ओर नुकीले पत्थर थे। शाही सड़क पर होकर नीचे उतर आना बहुत सुगम था, परन्तु दूसरी ओर जाना जान को खतरे में डाज्नना था। सरल भागे मृत्यु-लोक को जाता है, उस पर अ्रनगिनत प्राणी बड़ी सरलता से चले जा रहे हैं। दुगेम मागे कहां का है ? क्‍या वह अमर-लोक का मारे है (“कह नहीं सकते कई लोग उस मार्ग पर चलना आरम्भ करके ऐसी उलमानों में फंसे कि इधर के ही रहे उधर के ही हुए। बहुत से लोग बीहड़ जंगल में कुछ कदम चल कर यह कहे हुए लोट आये, कि “बस, जाने दो, यह सब ढोंग है? राजमाग का उद्देश्य निश्चित है, दूसरी ओर जाना भअमन्धेरे में कूदने के समान है। विश्वासी जीव कहते हैं कि दूसरी ओर की चोर्टियों पर अमर-लोक है, परन्तु वह किसी ने देखा नहीं उद्देश्य संदिग्ध--माग विकट क्या इससे अधिक विषम समस्या भी हो सकती है

परन्तु मृलशंकर को इस विषम दशा में अधिक भटकना नहीं पड़ा। उसने इस प्रकार विचार किया “एक ओर राजमागे है, वह मृत्यु का रास्ता है। यह निश्चित है वह माग नीचे की ओर जाता है, यह भी निश्चित है | इस कारण वह द्वेय है| दूसरी ओर अमरता की सम्भावना है। नाश के निश्चय से बचाव की सम्भावना बहुत अच्छी है। यह विचार कर मूल- शंकर ने निश्चित मृत्यु की ओर ले जाने वाले राजमागे का एकदम त्याग कर दिया ओर सम्भावित अमर पद को तदक्लाश

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के लिए कमर कस ली। विवाह का भंमट देख कर उसने समझ लिया कि इस संसार का तिलिस्मी द्वार खुल गया है। यह तिलिस्मी द्वार हरेक युवा और युवती को अ्रपनी ओर बड़े वेग से खेंचता है। जहां द्वार के अन्द्र पांव धरा कि पीछे. के फिवाड़ स्वयं ही बन्द हो जाते हैं। पीछे लोटने के लिए सीधा रारता बिल्कुल बन्द हो जाता है | दयानन्द ने देखा कि द्वार खुल गया हे। उसमें एक पग रखने की देर है द्वार बन्द होते ही अमरलोक एक हल्का सा सपना रह जायगा - पेर जंजीरों में बंध जायंगे।

अमृत के प्यासे मूलशंकर ने, प्रेममय घर ओर सरल राजमार्ग को लात मार कर २१ वष की आयु में बीहड़ बन का रास्ता लिया। वह ज्येष्ट मास की एक सांक को घर से भाग खड़ा हुआ |

मूलशंकर १६०२ विक्रमी के ज्येष्ठ मास में घर से बाहर हुआ, ओर १६१७ विक्रमी के कातिक मास में दण्डीजी के पास अथुरा में पहुँचा। इस बीच के १४ वर्षों में उसने एक सच्चे जिज्ञासु का जीवन व्यतीत किया। घर से सम्बन्ध तोड़ दिया। घर छोड़ने के कुछ मास बाद केवल एक बार सिद्धपुर के मेले में एक बैरागी से पुत्र का समाचार पाकर मृलशंकर के पिता ने उसे आरा पकड़ा था। जब पिता ने कई सपाहियों के साथ आकर पकड़ लिया तब पिता के चरणों में झिर भुकाने के सिवा क्या चारा था पिता सिपाहियों के पहरे में रखकर मूल- शंकर को घर को ओर वापिस ले चले, परन्तु जिसे धुन समाई

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थी, वह अब केद में फंसने बाला था। रात के समय सिपाहियों को सोते देख मलशंकर फिर भांग निकला। दूसरा सारा दिन उसने एक बड़े पेड़ पर छिंप कर बिताया। पिता ऐसे बेमुरब्बत पुत्रसे निराश होकर घर वापिस चले गये, ओर मलशंकर ने अपना रास्ता लिया। इसके पीछे मलशंकर का घर घालों से कभी साक्षात्कार नहीं हुआ

मूलशंकर को एक ही धुन थी कि मृत्यु से छूटने का उपाय जाना जाय। उसे बताया गया था कि मृत्यु से छूटने का उपाय “योग! है। मूलशंकर योगी की तलाश में शहर, गांव ओर जंगल में भ्रमण करने लगा। पहले पहल तो नया होने के कारण उसे ठग साधुओं ने खूब लूटा | ठग ने रेशमी वस्त्र धरा लिये, परन्तु धीरे-धीरे कुछ विवेक होता गया, और वह जिज्लासु ठगों ओर सन्तों में भेद करने लगा।. घर से भागने पर पहला काम मूलशंकर ने यह किया था कि सामले नामक ग्राम में एक ब्रह्मचारी की प्रेरणा से दीक्षा लेकर अपना नाम शुद्धचेतन ब्रद्मयदारी रखा। बहुत समय तक जिल्नासु ने त्रह्मचारी रह कर भ्रमण किया परन्तु त्रद्मयारी को उस समय गुजरात में सन्यासियों की भांति बना-बनाया भोजन नहीं मिलता था, हाथ से बनाना पड़ता था। इससे शुद्धचेतन के पठन पाठन में बहुत विध्य होता था। उसने कई सन्यासियों से सन्‍्यास लेने का यत्न किया परन्तु थोड़ी आयु देख कर वह लोग संकोच करते रहे नमेंदा नदी के तट पर घूमते हुए उन्हें पूर्णानन्द सरस्वती नाम के विद्वान साधु के दशेन करने का

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अवसर मिला। उनसे भी शुद्धचेतन ने सनन्‍्यास देने की प्राथना की। पहले तो उन्होंने कुछ संकोच किया परन्तु और साधुओं की सिफारिश आने पर सन्‍्यास देना स्वीकार कर लिया | पूर्णानन्द सरस्वती से सन्‍्यास लेकर शुद्धचेतन स्वामी दयानन्द सरस्वती बन गया।

घर से निकल कर कुछ समय तक रवामी दयानन्द ने गुजरात में ही अ्रमण किया, वहां से बड़ोदा होते हुए चेतन मठ होकर नमंदा के तट पर चिरकाल तक भिन्न-भिन्न स्थानों में निवास किया नमेदा तट से आबू ठहर कर सं० १६१२ के कुम्भ पर स्वामी दयानन्द हरिद्वार आये ओर वहां के मठों ओर महन्तों की माया का पहली वार दिग्दशन किया हरिद्वार से आप हिमालय की ओर चल दिये ओर सच्चे योगी की तलाश में कठिन से कठिन चोटियों पर चढ़ कर, गुफाओं में घुस कर ओर घाटियां पार करके सच्चे जिज्नासु होने का परिचय दिया

इस भ्रमण में दयानन्द ने कई सच्चे ओर भूठे योगियों के दृशन किये भूठे योगियों से उन्हें घृणा उत्पन्न हो जाती थी, और सच्चे योगियों से वह कुछ कुछ सीख ही लिया करते थे चाणोद कल्याणी में वास करते हुए आपका योगा- नन्‍द नाम के एक योगी से परिचय हुआ। देर तक स्वामी ने उनसे योग की क्रियायें सीखीं अहमदाबाद में दो ओर योगियों से उन्हें योगविद्या सीखने का अवसर मिला। इस प्रकार मिले हुए अवसरों से जिश्ञासु ने पूरा लाभ उठाया।

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हरिद्वार से टिहरी राज्य की ओर जाते हुए स्वामीजी को तनत्र ग्रन्थ देखने का अवसर मिला उन ग्रन्थों को देख कर आपके चित्त में इतनी घृणा हुई कि वह फिर अनेक नई व्याख्यायं सुनकर भी दूर नहीं हुईं टिहरी से विद्या और योग की धुन में मस्त स्वामी ने केदारघाट, रुद्रश्रयाग, सिद्धाश्रम आदि का भ्रमण करते हुए मठों ओर मन्दिरों की दुर्देशा को अच्छी तरह देखा तुँगनाथ की चोटी पर चढ़ते हुए उन्हें आशा थी कि ऊपर कुछ अच्छा दृश्य देखने को मिलेगा; वहां पहुँच कर भी देखा तो बेसा ही मन्दिर, बेसे ही पुजारी -- सब लीला मेंदान जेसी ही थी गुप्तकाशी का दौरा लगा कर श्री दयानन्द सरस्वती ओखी मठ में पहुंचे ओोखी मठ हिमालय का बड़ा प्रसिद्ध भठ है वहां की गुफाओं में जिज्ञासु ओर सच्चे महात्माओं की बहुत तलाश की, परन्तु वहां भी चरस ओर सुल्फे के धुएं से सब कुछ आच्छन्न ही दिखाई दिया।

यहां के एक महन्त ने स्वामीजी से बातचीत करके यह संकल्प किया कि उन्हें अपना मुख्य चेला बनाकर उत्तरा- धिकारी बनाये ऐसा भव्य ओर पठित शिष्य उसे कहां मिलता उसने अपना भाव दयानन्द के सामने प्रकाशित किया ओर यह भी बताया कि मठ के साथ द्रव्य की राशि भी कुछ कम नहीं है दयानन्द ने उत्तर दिया कि “यदि मुझे धन की .अभिलाषा होती तो में अपने बाप की सम्पत्ति को, जो तुम्हारे इस माल ओर दोलत से कहीं बढ़कर थी,

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छोड़ता |, फिर भी दयानन्द ने कहा कि जिस उद्देश्य से मेने घर छोड़ा, और सांसारिक ऐश्वयं से मुह समोड़ा, तुम उसके लिये यत्न कर रहे हो, और तुम्हें उसका ज्ञान है फिर तुम्हारे पास मेरा रहना किस प्रकार सम्भव है ।” यह सुनकर महन्त ने पूछा कि 'वह कोनसी बरतु है जिसकी तुम्हें खोज है और तुम इतना परिश्रम उठा रहे हो ९” दयानन्द ने उत्तर दिया कि "में सत्य योग-विद्या और मोक्ष की खोज में हूं श्रोर जब तक यह प्राप्त होंगे, तब तक बराबर देशवासियों की सेवा करता रहूँगा।!

मठ के महन्त के पास धन था, ऐश्वय था, परन्तु सत्य था; योग था ओर मोक्ष का उपाय था -- इस कारण वह जिल्लासु दयानन्द को बांध सका। ओखी मठ से जोशी मठ होते हुए आप बदरीनारायण गये। आपने सुन रखा था कि बदरीनारायण के आस-पास योगी रहा करते हैं। बदरीनारायण को योगियों से बिल्कुल शून्य पाकर योग के अभिलाषी द्यानन्द ने आसपास की चोटियों ओर गुफाओं में खोज करने का संकल्प किया। चारों ओर बर्फ पड़ी हुई थी। नदियों का पानी नुकीले पत्थरों में से दोकर बहता हुआ रास्तों को रोक रहा था। दयानन्द ने इन कठिनाइयों की पर्वाह करते हुए खोज जारी रखी। घूमते घूमते आप अलकनन्दा नदी के किनारे पहुंचे ओर उसे पार करने के लिये पानी में घुस गये। इसी नदी में किसी किसी ठिकाने घुटने तक जल था, और कहीं कहीं: गहराई बहुत अधिक थी। चोड़ाई कोई १० हाथ के लगभग होगी। पानी

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बफ के समान टंडा था, और बीच-बीच में नोकदार पत्थर ओर बफ के टुकड़े भीं बिखरे हुए थे। शरीर पर कपड़ा बहुत हल्का था, ओर पांब बिल्कुल नंगे थे। स्वामी दयानन्द की दशा बहुत ही शोजनीय होगई पानी के अन्दर कुछ समय के लिए तो वह बिल्कुल मदिित से हो गये, परन्तु थेये से अपने आपको बचाये रखा। किसी प्रकार पार तो हुए पर एक ओर सर्दी, दूसरी ओर भूख पांव पत्थरों से छिल गये थे, ओर लहू जारी हो गया था। आगे जाने की हिंम्मत रही -- परन्तु वहां ठहरकर रात बिताने में भी मृत्यु का सामना था। उस समय परमात्मा की कृपा से भक्त को सहायता मिली। दो पहाड़ी राही ऊपर निकले; यद्यपि वह पहाड़ी दयानन्द को साथ ले जा सके; तो भी कुछ ढारस बंध गया। थोड़ी देर सुस्ता कर स्वामी जी उठ खड़े हुए, ओर बसुधा तीथे पर कुछ विश्राम करके बदरीनारायण को लीट गये।

बदरीनारायण के आसपास योगी के दशन करने की अभिलाषा में निराश होकर जिज्ञासु ने स्थल की ओर मंह सोड़ा रामपुर, द्रोय सागर ओर मुरादाबाद होते हुए आप गढ्मुक्तेश्वर पहुँच गये। गंगा के किनारे घूम रहे थे। प्रवाह में बहता हुआ एक मुर्दा उन्हें दिखाई दिया। दयानन्द ने दृठ- योग प्रद्ीपिका श्रादि में शरीर के श्र/भ्यन्तर अंगों के सम्बन्ध में घहुत कुछ पढ़ रखा था। उसके सत्यासत्य निेय का उचित अवसर जानकर आप पानी में कूद पड़े और मुर्दे को किनारे पर खेंच लिया लाश किनारे पर रख कर चाकू से

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चीर फाड़ की तो उन ग्रथों में लिखे हुए शरीर-बगन को बहुत अशुद्ध पाया। असत्य से भरे हुए प्रन्थों का बोक उठाने से कोई लाभ देख कर दयानन्द ने उन सब को फाड़ कर गंगा-प्रवाह के अपेण कर दिया।

गंगा-तट का भ्रमण करके स्वामीजी दक्षिण की ओर “जा निकले और बहुत दिनों तक नमेदा के तट पर धूमते रहे वहां बड़े-बड़े घने जंगल हैं। एक जंगल में आपका एक बड़े भालू से सामना हो गया। भालू को देखकर वह डरे नहीं, प्रत्थुत अपना सोंटा उठाकर उसकी ओर को बढ़ाया। सोंटे से डरकर चिघाड़ता हुआ वह भालू जंगल में भाग गया। एक बार घने जंगल में घूमते घुमते आपको रात हो गई अंधेरे में कहीं ठहरने का स्थान ढुंढते ढूंढते जंगल में कुछ कुटियां दिखाई दीं। पास जाने पर कोई जागता हुआ प्राणी मिला। तब रात भर आपने एक वृक्ष पर बेठकर गुजारी प्रातःकाल जब ग्रामवासियों ने एक सन्‍्यासी को देखा तो रात के कष्ट के लिये बहुत क्षमा मांगी ओर उचित आद्र-सत्कार किया

नमेदा के तट पर दयानन्द ने लगभग तीन वर्ष भ्रमण किया। अ्रमण में आपने सुना कि मथुरा में एक योगी ओर विद्वान दण्डी रहते हैँ योग ओर विद्या के अभिलाषी ने यह समाचार सुन॒ते ही मथुरा की ओर मंह मोड़ा ओर कार्तिक सुदी सं० १६७६ तदनुसार १४ नवम्बर १८६० के दिन मथुरा में स्वामी विरजानन्द जी का दरवाजा जा खटखटाया |

पन्द्रह वर्षों तक जिन्नासु द्यानन्द ने पहाड़ों ओर मेदानों

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को नाप डाला, इतने शारीरिक कष्ट सद्दे ओर तपश्चर्या की--यह सब किस लिये? सत्य-्योग ओर मोक्ष की प्राप्ति के लिये। परन्तु हिमालय की सर्दी में दिल की आग बुकी ओर गंगा नमेंदा के जलों ने ज्वाला को शान्त किया। अब जिश्नासु दण्डी स्वामी के द्वार पर बिद्या के स्रोत में हृदय का ताप बुझाने

पहुँचता हे--चलो पाठक | देखें कि उसे कहां तक सफलता प्राप्त होती हे

तीसरा पारिच्छेद ही 0(0००००-०---३0 कर विद्या के लोत में स्नान

यह स्वामी विरजानन्द जी कौन हैं पंजाब में कर्तारपुर के समीप गंगापुर नाम का एक ग्राम था, उसमें नारायणदत्त नाम का सारस्वत आाह्यण रहता था। दयानन्द के गुरु श्रीविरजानन्द दर्ण्दी ने उसी के घर जन्म लिया था। बचपन से ही बालक पर आपत्तियों का आक्रमण आरम्भ हुआ। वषे की आयु में चेचक ने चाम की आंखे शक्तिहीन कर दीं ओर 2१२वंं वैष में बालक के माता-पिता होनहार बच्चे को अनाथ छोड़कर परलोक सिधार गये। बालक के पालन-पोषण का बोर बड़े भाई के कन्धों पर पड़ा। बड़ा भाई साधारण दुनियादार भाइयों की भांति नासमक था। वह एक अन्घे ओर अतएवं अनुपयोगी भाई की पेट-पालना में कोई विशेष लाभ नहीं देखता था। भाई

शोर भावज की कृपा से तंग आकर शीघ्र ही बालक को घर छोड़ना पड़ा |

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घर से भागकर प्रतिभाशाली युबक ऋषिकेश ओर हरिद्वार पहुँचा ओर वर्षो' तक विद्याष्ययन तथा तपश्चर्या द्वारा अपनी झात्मा को संस्कृत करता रहा। हरिद्वार में ही स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती की दया से उसे सन्‍्यास मिला | सन्‍्यासी विरजानन्द विद्या की तलाश में हरिद्वार, कनखल, काशो, गया आदि में चिरकाल तक घूमते रद्दे ओर विद्वानों से व्याकरण तथा अन्य शाझ्रों का अध्ययन करते रहे। अम्रत के प्यासे ऋषि दयानन्द के गुरु बनने का अधिकार उसी तपस्वी को हो सकता था, जिसने एक उद्देश्य के लिये तपस्या की हो, किसी उत्तम पदा्थ की खोज में कोने कोने छान मारे हों। इस दृष्टि से देखें तो स्वामी बिरजा- नन्‍द जी ऋषि के गुरु बनने के पूणतया अधिकारी थे

विद्याध्ययन कर लेने पर दण्डीजी ने विद्याथियों को पढ़ाना आरम्म किया। उनके यश का विस्तार चारों ओर होने लगा; विशेषकर व्याकरण में उनका पाणिडत्य बहुत "ऊंचे दर्ज का समझा जाता था। उनके पाण्डित्य और मधुर श्लोक- गान से प्रसन्‍न होकर अलवर के राजा ने कुछ दिनों तक उन्हें अपने यहां रखा। राजा की प्राथना पर दण्डीजी यह शते करके अलवर गये थे कि प्रतिदिन राजा घण्टे तक अध्ययन किया करेगा। विलासी राजा अपने प्रण को निभा सका, परन्तु सनन्‍यासी ने अपना प्रण निभाया। जिस दिन राजा पढ़ने नहीं झाया, उससे अगले दिन दण्डी का श्रासन अलवर से उठ गया।

कुछ समय रजवाड़ों में बिताकर स्वा० विरजानन्द जी ने मथुरा में अपना आसन जमाया व्याकरण पढ़ने की

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इच्छा रखने वाले विद्यार्थी दूर देशों से -- यहां तक कि काशी से भी -- दण्डीजी के पास आते थे | व्याकरण में दण्डी जी का पारिडत्य श्रपूष होगया था इस समय उनके जीवन में एक विशेष परिवतेन करने वाली घटना घटित्न हुई पड़ोस में एक दक्षिणी पण्डित रहता था वह प्रतिदिन मूल अष्टाध्यायी का पाठ किया करता था दण्डीजी उस समय तक सिद्धान्त कौमुदी, मनोरमा ओर शेखर को द्वी व्याकरण का आदि ओर अन्त समभते थे मूल अ्रष्टाध्यायी का पाठ सुनकर मानों उनकी आंखे खुल गई उन्हें प्रतीत हुआ कि व्याकरण का ऋषि-निर्णीत क्रम कुछ ओर ही है अष्टाध्यायी के सूत्र-क्रम को देखते ही उनके हृदय में धारणा हो गई कि कोमुदीकार का बनाया हुआ क्रम अस्वाभाविक है ओर अष्टा- ध्यायी के महत्व को कम करने वाला है ! यह धारणा होते ही दण्डीजी ने दीक्षित के ग्रन्थों का ओर उनके साथ 'ही अन्य सब श्रर्वाचीन व्याकरण ग्रन्थों का त्याग कर दिया जनश्रुति हैं कि उनका यभुना में प्रवाह कर दिया। अष्टाध्यायी का क्रम दण्डी जी को इतना पसन्द आया कि उन्होंने अपने शिष्यों के पास जितने श्रर्वाचीन अन्थ थे वे सब फिकवा या जलवा दिये। अ्रष्टाध्यायी ओर महाभाष्य इन दो को हृदय के आसन पर बिठा लिया

क्रिया-प्रतिक्रिया का सिद्धान्त संसार में सभी जगह पाया जाता है ।- पानी एक ओर को बह रहा है सामने पहाड़ की भारी चट्टान आजाती है | पानी उल्टे पांक

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भागता है। उसके उल्टे भागने का वेग आगे बढ़ने के वेग के अनुपात से होगा यदि पानी धीमी गति से आगे बढ़ रहा था तो धीमी चाल से ही पीछे को लौटेगा, परन्तु यदि जल का प्रवाह वेगवान्‌ था तो उल्टी ठोकर भी जोर की लगेगी दण्डीजी के विचार-प्रवाह में भी जोर की ठोकर लगी वह कोमुदी, मनोरमा और शेखर के प्रवाह में बड़े वेग से बह्दे जा रह्दे थे अ्रष्टाध्यायी का मूल सूत्र-क्रम सुनकर ओर उसका सरज्ञ सोन्दय देखकर प्रज्ञाचक्ष की आंखें खुल गई उन्हें भान होने लगा कि ऋषि-कृत व्याकरण का क्रम कोमुदी के घड़े हुए क्रम से बहुत उत्कृष्ट है इतना उत्तम होते हुए भी सूत्र-क्रम गुम क्‍यों हो गया व्याकरण का पठन-पाठन अ्रष्टाध्यायी के क्रम से क्‍यों नहीं होता कारण यही प्रतीत होता था कि भट्टोजिदीक्षित ने सिद्धान्त कौ- मुदी बना कर सूत्र-क्रम को पीछे फेंक दिया। इससे दण्डीजी का सारा असन्‍्तोष भट्टोजिदीजित पर केन्द्रित होगया अषछ्छाष्यायी ओर महाभाष्य से उनका प्रेस ज्यों-ज्यों बढ़ता जाता था भट्टोजिदीलित से त्यों-त्यों उन्हें घृणा होती जाती थी

धीरे-धीरे उनके हृदय में यह निश्चय-सा हो गया कि जब तक कोमुदी ओर उससे सम्बन्ध रखने वाले प्रन्थों का प्रचार नहीं रुक जाता तब तक व्याकरण की ऋषि-कृत पद्धति का उद्धार नहीं हो सकता यह विचार दण्डीजी के मन में समा गया, उनके दिल पर सबार हो गया यही विचार दिन का चिन्तन ओर रात का सपना हो गया एक थार

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जयपुर के राजा रामसिंह ने दण्डीजी को दरबार में बुलाकर अपने यशस्वी होने का उपाय पूछा। ऋषि-कृत ग्रन्थों के भक्त दण्डीजी ने उत्तर में यह आदेश किया कि एक बढ़ी सभा फरके देशभर के विद्वानों को एकत्र करो सभा में इस विषय पर शाख्राथं हो कि व्याकरण का ऋषि-कृत क्रम अच्छा है या कोमुदी का ? दण्डीजी ने कद्दा कि में उस सभा में सिद्ध करके दिखा दूगा कि ऋषि-कृत क्रम ठीक है ओर कोमुदी आदि ग्रन्थ अशुद्धियों से भरपूर हैं। दूसरे एक अवसर पर मथुरा के कलेक्टर मि० पोस्टली दण्डीजी से मिलने आये मि० पोस्टली ने सभ्यता के तौर पर पूछा कि आप क्‍या चाहते हैं, जो हम कर सके ? दण्डीजी ने उत्तर दिया कि यदि आप हमारी इच्छा पूरी किया चाहते हैं तो भट्टोजि दीक्षित के सब प्रन्थों को इकट्ठा करके जलवा दें ।' यह भी प्रसिद्ध है कि दण्डीजी दीक्षित के भ्रन्थों पर शिष्यों के हाथों से

जूते लगवाया करते थे

क्या यह उचित था अप्वाध्यायी या कोमुदी के संबन्ध में स्वतन्त्र सम्मति रखना दण्डीजी के लिये स्ंधा उचित था। यह उनका अधिकार था | ग्रन्थों की उपयोगिता तथा अनुपयोगिता के बिषय में स्वतन्त्र सम्मति रखने का बविंद्वानों को पूरा अधिकार है हम यह भी नहीं कह सकते कि उन की सम्मति निमूल थी श्रष्टाध्यायी की पद्धति का निर्माण पाणिनि मुनि ने किया है सूत्रों का क्रम अष्टाध्यायी का आजीवन है यदि क्रम की उपेक्षा कर दी जाय तो सूत्र व्यथे

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हैं। अनुशृत्ति असम्भव हो जाती है, 'पिप्रतिषेघे परं कार्य बिल्कुल व्यथे हो जाता है ओर पपूवत्राउसिद्धम' का कुछ बल ही नहीं रहता श्रष्टध्यायी के सूत्रों का इतना लघु-काय होना क्रम पर ही आश्रित है उसका सौन्दय, उसका गीरव, बहुत कुछ क्रम पर अवलम्बित है क्रम को छोड़ कर यदि सूत्रों को काये में लाया जाय, तो अनुवृत्ति के लिये स्मृति पर बोक डालना पड़ता है, 'पर॑ काय' श्रोर असिद्धि' का तो अनुमान मात्र लगाया जा सकता है यह कहा जा सकता है कि जो आदमी संस्कृत व्याकरण का विद्वान बनना चाहे, वह यदि सिद्धान्तकीमुदी को सादन्त पढ़ जाय तो भी सूत्रक्रम से परिचित हुए बिना वह सफलता प्राप्त नहीं कर सकेगा अष्टाध्यायी श्रोर उसके सूत्रों के क्रम का अ्रट्ट सम्बन्ध हे

मुनि विरजानन्द ने देखा कि लोग सिद्धान्त-कौमुदी को पढ़ कर सूत्रक्रम की उपेक्षा करते हैं | भट्टोजिदीक्षित के देखने में सरल परन्तु वस्तुतः दुगम ग्रन्थ ने ऋषि कृत व्या- करण का लोप कर दिया है उनकी अन्तरात्मा इससे खिन्न होकर प्रचलित पद्धति के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए खड़ी हो गई विद्रोह के समय प्रायः सीमा का उल्लंघन हो जाता है दण्डी जी के ध्योभ ने भी जब उग्र रूप धारण किया तब मर्यादा का खतिक्रमण कर दिया, इसमें सन्देद्द नहीं। ग्रन्थ को नदी में बहाने से कभी उसका तल्लोप नहीं हुआ ओर कभी जूतों या पांव के तले रोंदने से उसका प्रचार रुका हैं। परिशाम प्रायः

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उल्टा ही होता है। आज आरतभूमि में सिद्धान्त-कौमुदी की' छपी हुई प्रतियां दण्डीजी के समय की अपेक्षा बहुत अधिक हैं; परन्तु इसका यह तात्पय नहीं कि दण्डीजी का यत्न व्यथे गया जिस सत्य का अनुभव उन्होंने किया और अपने शिष्यों को कराया, उसे देश के एक बड़े भाग ने अंगीकार कर लिया हे आज सूत्रक्रम पर श्रद्धा रखने वाले विद्वानों की संख्या ओर मूल' अष्टाध्यायी की प्रकाशित प्रतियों की संख्या भी दण्डीजी के समय से बहुत अधिक है। सत्य ने अपना प्रभाव पेदा किया है, उसकी सहायता में यदि कहीं सीमा का उल्लंघन हो गया था, तो वह फल्न का महत्त्व देखते हुए अब विस्मरण करने योग्य है। जहां एक ओर तसका अनुकरण बिल्कुल त्याज्य हे, यहां दूसरी ओर बारम्बार उसे दोहरा कर शिकायत करना बुद्धिमत्ता में शामिल नहीं है।

अस्तु ऐसे दर्डी विरजानन्द जी थे, जिनके द्वार पर कार्तिक सुदी सं० १६१७ ( १७ नवम्बर १८६० ) के दिन स्वामी दयानन्द सरस्वती ने जाकर आवाज दी | परिचय हो जाने पर दण्डीजी ने पूछा कि क्या कुछ व्याकरण पढ़ा है ९! दयानन्द ने उत्तर, दिया कि 'सारस्वत पढ़ा हूँ'। इस पर आज्ञा हुई कि पहले सब अनाष ग्रंथ यमुना में बहा आओ, तब आए ग्रन्थ पढ़ने के. अधिकारी हो सकोगे दयानन्द ने आज्ञा का पालन किया और योग्य शुरु के चरणों में बेठकर विद्यामत-पान का यत्ना आरम्भ किया |

स्वामीजी का विद्यार्थीजीवन श्रनुकरणीय था प्रातः

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काल उठ कर नित्य क्रिया से निबृत्त होकर पहले गुरु के लिये नदी से जल लाते थे, फिर अपने सन्ध्योपासन के पीछे पढ़ने में लग जाते थे प्रातः काल कुछ चने चबा लेते थे; जो उन्हें ढुर्गा खत्री की कृपा से श्राप्त होते थें। मथुरा के बहुत से विद्यार्थियों के भोजन का प्रबन्ध बाबा अ्रमरलाल जोशी की ओर से था, स्वामी जी के भोजन का प्रबन्ध भी वहीं पर था। रात्रि में भी सोने से पहले वह कुछ कुछ अभ्यास किया करते थे, जिसके लिए तेल का मासिक खचे।) ला० गोवर्धन सर्राफ से प्राप्त होता था। इसीअ्रकार उदार महानुभावों की सद्दायता से आवश्यकतायें पूरी हो जाती थीं और शिष्य को गुरु-सेवा करते हुए विद्याध्ययन करने का खुला अवसर मिलता था | दण्डीजी का स्वभाव उग्र था। कभी कभी बहुत नाराज हो जाते थे। शिष्यों के हाथों पर लाठी भी जमा देते थे। एक बार स्वामीजी की भी वारी गई | कहते हैं कि लाठी की उस चोट का निशान स्वामीजी के हाथ पर मरण पयेन्त बना रहा, जिसे देख कर वह गुरु के उपकारों का स्मरण किया करते थे | 'एक बा( छोटे से अपराध पर ड्योढ़ी बन्द कर दी गईं तब योग्य शिष्य ने दो हितेषियों से सिफारिश कराई। सिफारिश से सन्‍्तुष्ट होकर गुरु ने शिष्य को क्षमा कर दिया स्वामी दयानन्द का जीवन पूरे यति का जीवन था। जिस दिन से यह जिश्ञासु बने, उस दिन से मन वाणी ओर कर्म से ब्रह्मयचारी रहने का कठोर ब्रत धारण किया विद्यार्थी जोवन में दयातन्द ने पृण्ण ब्रह्मचारी रहने का

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उद्योग किया। एक दिन की घटना है कि आप नदी के तट पर सन्ध्या कर रहे थे। ध्यान खुला तो क्या देखते हैं कि एक युवती चरणों का स्पश कर रही है। चरणस्पशंं भक्ति से था, परन्तु पूणो ब्रह्मचारी ने उतने खीस्पश को भी पाप समझा ओर कई दिनों तक एकान्त में जाकर निराहार ब्रत द्वारा हृदय को शुद्ध किया

दण्डीजी से स्वामी ने अष्टाध्यायी, महाभाष्य आदि व्याक- रण ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य आपे प्रन्थों का भी अध्ययन किया। इससे यह सममभना चाहिये कि आप ने गुरु से केवल भ्रन्थों की विद्या ही प्राप्त की; उस प्रंथ विद्या से कहीं बढ़ कर वह भाव थे, जो उन्हें गुरु से प्राप्त हुए। आधुनिक या अर्वाचीन ग्रन्थों को छोड़कर प्राचीन श्राषे ग्रन्थों में श्रद्धा, मृर्ति-पूजा आदि कुरी- तियों से वेराग्य, और कठोर संयम -- इन सबके लिये योगी दयानन्द गुरु का आभारी था |

विद्याध्ययन समाप्त हुआ रीति के अनुसार शिष्य कुछ लॉगों की भेंट लेकर गुरु के चरणों में उपस्थित हुआ ओर निवे- दन करने लगा कि महाराज मेरे पास ओर कुछ नहीं है जो भेंट करू; इस कारण केवल आध सेर लॉग लेकर उपस्थित हुआ हूँ गुरु ने कहा --“में तुमसे ऐसी चीज मांगूंगा जो तेरे पास उपस्थित है ।” दयानन्द के बद्धांजलि होने पर गुरु ने आदेश किया ( बड़े दुःख की बात है कि गुरु के उस समय के शब्द यथाथ रूप में प्राप्त नहीं होते! जीवन-चरित्र लिखने वालों ने -णदडी जी के वाक्य अपनी-अपनी रुचि के अनुसार घड़े हैँ।

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पं? लेखशमजी के सम्पादित किए जीवन चरित्र में जो शब्द्‌ दिए गये हैं वह बहुत कुछ स्वाभाविक हैं। यह कहा जा सकता है. कि यदि दण्डीजी ने ठीक वह शब्द नहीं कह्टे थे तो कम से कम भावाथे वही होगा। वहां दण्डीजी के निम्नलिखित शब्द दिये गये हैं )

“देश का उपकार करो। सत्‌ शाझ््रों का उद्धार करो। मत-मतान्तरों की भ्रविद्या को मिटाओ और वेद्किध्म फेलाओ |” दयानन्द ने आदेश को अंगीकाएर किया। अन्त में आशीर्वाद देते हुए दस्डीजी ने ओर भी कहा--मनुष्य-कृत ग्रन्थों में पर- मेश्वर ओर ऋषियों की निन्‍्दा है ओर ऋषिकृत प्रन्थों में नहीं, इस कसोटी को हाथ से छोड़ना

इस अमूल्य उपदेश को शिरोधाये करके श्री दयानन्द संन्यासी गुरू के द्वार से विदा हुए जो वस्तु प॑वेत की चोटी पर, बन की गहराई में, नदियों के प्रवाह में श्रोर महन्तों के डेरों में ढंढी, पर मिली, वह अमृत के प्यासे दयानन्द्‌ को मथुरापुरी में दंडी विरजानन्द के चरणों में मिली। वह वस्तु विद्या ओर विवेक- बुद्धि थी उस वस्तु को पाकर, ब्रह्मचय के तेज से तेजस्वी त्रह्म- चारी संसार-त्षेत्र में प्रवेश करता है| पाठक | चलिये हम देखें कि बह केसा संसार-क्षेत्र